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E20 BIOFUEL: किसानों, उपभोक्ताओं और पर्यावरण को 20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की चुकानी होगी बड़ी कीमत? जानें...

गांव जंक्शन, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 06 Sep 2025 05:55 PM IST
सार

20 फीसदी इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ई20) के अनुकूल वाहनों के नहीं होने, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय चिंताएं इस जैव ईंधन की राह में बाधा बन सकती हैं।100% इथेनॉल इकोनॉमी भी अंततः आयात की ओर ही ले जाएगी। इसीलिए, उपभोक्ताओं की चिंताओं का समाधान, पुराने वाहनों के लिए किफायती विकल्प और फसलों के उपयोग में संतुलन बनाए रखना होगा।

20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को तेल आयात कम करने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को तेल आयात कम करने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। - फोटो : गांव जंक्शन

विस्तार

भारत का बायोफ्यूल अभियान, विशेष रूप से ई20 (20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) पर्यावरण संरक्षण और तेल आयात में कमी के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन, वाहनों के ई20 के अनुकूल नहीं होने और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां इस जैव ईंधन की राह में बाधा बन रही हैं।

सरकार जैव ईंधन (बायोफ्यूल) के रूप में इथेनॉल को पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी मानती है। भारत ने हाल में अपने लक्ष्य से पांच साल पहले 20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ई20) का लक्ष्य हासिल कर लिया है। यह कदम पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सरकार का कहना है कि वर्ष 2014 से इथेनॉल मिश्रण ने 6.98 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम किया है और 1.36 लाख करोड़ रुपये (15.5 अरब डॉलर) की विदेशी मुद्रा बचाई है। लेकिन, इथेनॉल उत्पादन के लिए फसलों के उपयोग और पुराने वाहनों की इस ईंधन के लिए अनुकूलता जैसे मुद्दे चुनौतियां पेश कर रहे हैं। 

20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से अरबों की बचत
भारत का बायोफ्यूल अभियान, विशेष रूप से ई20 (20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल), ने कार्बन उत्सर्जन और तेल आयात में अरबों की बचत की है। लेकिन, वाहन मालिकों और खाद्य नीति विशेषज्ञों के बीच इस जैव ईंधन की दक्षता और इसके उत्पादन में अनाजों के उपयोग के चलते खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ रही हैं।

दिल्ली स्थित थिंक टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के अनुसार, भारत में सड़क परिवहन से कार्बन उत्सर्जन 2050 तक लगभग दोगुना हो जाएगा। इंडियन फेडरेशन ऑफ ग्रीन एनर्जी के संदीप थेंग ने कहा कि बढ़ती ईंधन मांग को देखते हुए, इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर्यावरण संरक्षण के लिए जरूरी है। वहीं, सरकार का मानना है कि यह कदम तेल आयात को कम करने और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने में गेमचेंजर है।

वाहन मालिकों की ई20 को लेकर चिंताएं
ई20 ईंधन के उपयोग से वाहन मालिकों में कई चिंताएं हैं। ऑटोकार इंडिया के संपादक होर्मज्द सोराबजी ने बीबीसी को बताया कि इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में कम ऊर्जा घनत्व होता है और यह अधिक संक्षारक (कोरोसिव) है, जिससे माइलेज कम हो सकता है और वाहन के पुर्जों को नुकसान का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि, होंडा जैसी कुछ कंपनियां वर्ष 2009 से ई20 अनुकूल सामग्री का उपयोग कर रही हैं, लेकिन भारत की सड़कों पर मौजूद कई पुराने वाहन ई20 के लिए अनुकूल नहीं हैं। सोशल मीडिया पर उपभोक्ता अक्सर कम माइलेज की शिकायत करते हैं। बीमाकर्ताओं का भी कहना है कि मानक बीमा पॉलिसी में गैर-अनुकूल ईंधन से होने वाले नुकसान को कवर नहीं किया जाता और अतिरिक्त पॉलिसी लेने पर भी दावे खारिज हो सकते हैं। 

सरकार ने चिंताओं को बताया निराधार
पेट्रोलियम मंत्रालय ने इन चिंताओं को "ज्यादातर निराधार" बताया है। मंत्रालय का कहना है कि इंजन ट्यूनिंग और ई20 अनुकूल सामग्री से माइलेज की कमी को कम किया जा सकता है। पुराने वाहनों में कुछ पुर्जों को बदलना सस्ता और नियमित सर्विसिंग के दौरान आसान है। मारुति सुजुकी 6,000 रुपये तक का ई20 सामग्री किट और बजाज 100 रुपये का फ्यूल क्लीनर पेश कर रहे हैं। फिर भी, कई वाहन मालिक नाखुश हैं, क्योंकि पेट्रोल पंपों पर ई20 के अलावा अन्य विकल्प उपलब्ध नहीं हैं। 

खाद्य सुरक्षा और फसलों पर प्रभाव
इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ना और मक्का जैसी फसलों का उपयोग होता है, जिससे खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। वर्ष 2025 में भारत को ई20 की जरूरतों के लिए 10 अरब लीटर इथेनॉल की आवश्यकता होगी, जो 2050 तक 20 अरब लीटर तक पहुंच सकती है। वर्तमान में, भारत का 40% इथेनॉल गन्ने से बनता है, जो पानी की अधिक खपत वाली फसल है।

वर्ष 2024 में, भारत दशकों बाद मक्का का शुद्ध आयातक बन गया, क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हुआ। बेंगलुरु स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर स्टडी ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड पॉलिसी (सीएसटीईपी) की शोधकर्ता रम्या नटराजन ने बीबीसी को बताया कि मक्का का यह उपयोग पोल्ट्री क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है, क्योंकि पशु चारे की लागत बढ़ रही है।

इसके अलावा, खाद्य निगम ने इस साल इथेनॉल उत्पादन के लिए 52 लाख टन चावल आवंटित किया, जो गरीबों के लिए सब्सिडी पर दिया जाता है। खेती क्षेत्र के विशेषज्ञ देविंदर शर्मा इसे "कुछ वर्षों में कृषि आपदा" की चेतावनी के रूप में देखते हैं। वह कहते हैं, 25 करोड़ भूखे लोगों वाले देश में भोजन को ईंधन के लिए इस्तेमाल करना उचित नहीं है।

सीएसटीईपी के अनुसार, वर्ष 2030 तक मक्का और गन्ने से 50-50 अनुपात में इथेनॉल की मांग पूरी करने के लिए 80 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि की जरूरत होगी। यदि किसान चावल या गेहूं की जगह मक्का उगाएंगे, तो यह टिकाऊ हो सकता है, लेकिन तिलहन और दालों जैसी अन्य फसलों की कमी चिंता का विषय है।

नीतिगत चुनौतियां और भविष्य की योजनाएं
वर्ष 2021 में, नीति आयोग की एक रिपोर्ट ने ई20 वाहनों के लिए कर लाभ और ई20 ईंधन की कम कीमत की सिफारिश की थी, लेकिन सरकार ने इन सुझावों को लागू नहीं किया। पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना है कि पहले इथेनॉल पेट्रोल से सस्ता था, लेकिन अब इसकी खरीद लागत बढ़ गई है।

रम्या नटराजन का मानना है कि 10% इथेनॉल मिश्रण (ई10) अधिक आदर्श होता। हालांकि, सरकार ई20 से आगे बढ़कर ई25, ई27 और ई30 की ओर बढ़ने की योजना बना रही है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने कहा कि यह प्रक्रिया चरणबद्ध और सावधानीपूर्वक अंजाम दी जाएगी।

सरकार को उपभोक्ताओं की चिंताओं का समाधान करना, पुराने वाहनों के लिए किफायती विकल्प प्रदान करना, और फसलों के उपयोग में संतुलन बनाए रखना होगा। यह अभियान भारत को हरित ऊर्जा की दिशा में बढ़ा रहा है, लेकिन दीर्घकालिक सफलता के लिए सावधानीपूर्वक नीतियां और टिकाऊ उपाय आवश्यक हैं।