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पैराक्वाट कीटनाशक पर टकराव तेज: कंपनियां बता रहीं सस्ता विकल्प, किसान संगठन पूर्ण प्रतिबंध पर अड़े

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 26 May 2026 08:44 PM IST
सार

आंध्र प्रदेश में पैराक्वाट पर अस्थायी प्रतिबंध के बाद देशभर में विवाद तेज हो गया है। कंपनियां इसे किसानों के लिए सस्ता विकल्प बता रही हैं, जबकि किसान संगठन इसे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक मानते हुए पूर्ण प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं।

फसल में कीटनाशक का छिड़काव करते हुए किसान
फसल में कीटनाशक का छिड़काव करते हुए किसान - फोटो : गांव जंक्शन (प्रतीकात्मक)

विस्तार

देश में खरपतवारनाशी पैराक्वाट डाइक्लोराइड को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। Andhra Pradesh सरकार द्वारा इस रसायन पर 60 दिन का अस्थायी प्रतिबंध लगाए जाने के बाद एग्रोकेमिकल कंपनियां और किसान संगठन आमने-सामने आ गए हैं।

उद्योग संगठनों का कहना है कि अचानक प्रतिबंध लगाने से किसानों की लागत बढ़ेगी और खेती प्रभावित होगी। वहीं, किसान संगठनों का तर्क है कि यह रसायन मानव स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है, इसलिए इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

CropLife India के चेयरमैन Ankur Aggarwal ने कहा कि किसानों की समस्याओं का समाधान किसी एक रसायन पर रोक लगाने से नहीं होगा। उनके अनुसार, पैराक्वाट कम लागत में खरपतवार नियंत्रण का प्रभावी साधन है और इसके हटने से किसानों को महंगे विकल्प अपनाने पड़ सकते हैं।

इसी तरह Pesticides Manufacturers and Formulators Association of India (PMFAI) ने भी केंद्र सरकार से अपील की है कि इस मामले में निर्णय लेते समय “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जाए। संगठन का कहना है कि अत्यधिक सख्ती से घरेलू एग्रोकेमिकल उद्योग पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

दूसरी ओर, किसान संगठनों ने पैराक्वाट को लेकर गंभीर चिंताएं जताई हैं। Kisan Mahapanchayat के राष्ट्रीय अध्यक्ष Rampal Jat ने इस रसायन पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की है। उनका कहना है कि फसलों को जल्दी सुखाने के लिए इसके उपयोग से अनाज में रासायनिक अवशेष रहने का खतरा बढ़ जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।

पैराक्वाट एक तेज असर वाला शाकनाशी है, जिसका इस्तेमाल खेतों में खरपतवार नियंत्रण और फसल सुखाने के लिए किया जाता है। हालांकि, इसके दुरुपयोग और जहरीले प्रभावों को लेकर लंबे समय से विवाद बना हुआ है। कई मामलों में इसके सेवन से आत्महत्या की घटनाएं भी सामने आई हैं, जिससे इसे लेकर चिंताएं और बढ़ी हैं।

यह विवाद नया नहीं है। Madhya Pradesh में भी पहले मूंग की फसल में रासायनिक अवशेषों को लेकर विवाद हुआ था। वहीं, दुनिया के कई देशों में इस रसायन पर पहले से प्रतिबंध लागू है। अब सवाल यह है कि किसानों की लागत और उत्पादकता को ध्यान में रखते हुए पैराक्वाट को जारी रखा जाए या स्वास्थ्य और पर्यावरण के जोखिमों को देखते हुए इस पर सख्त रोक लगाई जाए।