Home Start Up Technique Where Is The Qwhere Is The Qr Code Digital Payment Has Increased In Rural Areas What Are Its Benefits And How Manyr Code Digital Payment Has Increased In Rural Areas What Are Its Benefits And How Many

गूंज रहा नया डायलॉग, कहां है क्यूआर कोड?: ग्रामीण इलाकों में बढ़ा डिजिटल पेमेंट, इसके क्या और कितने फायदे?

Himanshu Mishra
Updated Sun, 17 Dec 2023 09:28 AM IST
सार

मशहूर टेलीविजन शो सीआईडी का डायलॉग - 'कुछ तो गड़बड़ है दया' - आपको याद ही होगा। मिस्टर इंडिया फिल्म के विलेन के रूप में अमरीश पुरी के 'मोगैम्बो खुश हुआ' को भी आप नहीं भूले होंगे। ऐसे डायलॉग बहुत हैं, जो जुबान पर ऐसे चढ़े कि उतरने का नाम नहीं लेते। अब डिजिटल जिंदगी में नए डायलॉग जुबान पर चढ़ रहे हैं। कैशलेस होते शहरों से गांवों तक अब एक ही डायलॉग गूंज रहा है - क्यूआर कोड कहां है?

गांवों में तेजी से बढ़ रहा डिजिटल पेमेंट
गांवों में तेजी से बढ़ रहा डिजिटल पेमेंट - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में 22 गांवों के बीच हाजीपुर इकलौता बाजार है। इन सभी गांवों के लोग इसी बाजार में खरीदारी करने आते हैं। हाजीपुर के बाजार के बीचोबीच एक किराना की दुकान है। दुकान पर भारी भीड़ लगी हुई है। बुजुर्ग, महिलाएं, युवा हर कोई सामान खरीदने के लिए खड़ा है।

कतार में 50 साल के मोती कुमार भी हैं। मोती ने घर के लिए तेल, चायपत्ती और कुछ अन्य जरूरी सामान खरीदा। दुकानदार ने इसके बदले कुल 293 रुपये मांगे। मोती ने झट से अपने कुर्ते से स्मार्टफोन निकाला और दुकानदार के काउंटर पर लगे पेटीएम के क्यूआर कोड को स्मार्टफोन से स्कैन करके 293 रुपये का भुगतान कर दिया। मोती अकेले ऐसे शख्स नहीं हैं।

सरसौली गांव के धर्मेंद्र ने भी इसी तरह मोबाइल से दुकानदार को 63 रुपये का भुगतान किया। टूर ट्रैवेल्स का काम करने वाले धर्मेंद्र दिनभर में 5,000 से 10,000 रुपये का लेनदेन ऑनलाइन करते हैं। ग्राहक भी आमतौर पर उन्हें मोबाइल से भुगतान कर देते हैं।  दुकानों से लेकर ठेलों और सड़क किनारे सब्जी विक्रेताओं के पास भी डिजिटल पेमेंट क्यूआर कोड की पट्टी मौजूद रहती है।

आलू, प्याज, टमाटर सहित अन्य सब्जियां बेच रहीं मालती देवी की उम्र करीब 40 साल होगी। सब्जियों के ठीक ऊपर क्यूआर कोड की पट्टी रखी हुई थी। यह क्यूआर कोड एक यूपीआई पेमेंट एप का था। कितने लोग ऑनलाइन पेमेंट करते हैं? मालती देवी से यह सवाल पूछने पर जवाब तुरंत मिलता है - आजकल तो सभै एही से पइसा देत हउवे (आजकल सभी लोग इसी से पैसा देते हैं)। हमारा दूसरा सवाल था कि इससे आपको दिक्कत तो नहीं होती? फिर जवाब मिलता है, ‘जब केहू पइसा भेजेला त इ भोपू बजे लगेला। बाद में, हमार लइका जोड़ घटा लेला’ (जब कोई पैसा भेजता है तो स्पीकर पर आवाज आती है। बाद में, मेरा बेटा हिसाब कर लेता है)।

 
गढ़ा जा रहा नया शब्दकोश
यूपीआई, डिजिटल पेमेंट, कैशलेस और मनी ट्रांसफर जैसे शब्दों को मिलाकर अब एक नया शब्दकोश गढ़ा जा रहा है। तेज गति के इंटरनेट से लैस स्मार्टफोन ने बहुत-सारी चीजों को महज एक क्लिक की दूरी पर लाकर खड़ा कर दिया है। एक बड़ा बदलाव कैशलेस डिजिटल पेमेंट के रूप में ग्रामीण क्षेत्रों में भी देखने को मिल रहा है।

फोन-पे, पेटीएम, गूगल-पे, अमेजॉन-पे और मोबिक्विक जैसे दर्जनों एप्लीकेशन्स (एप्स) अब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं। अब छुट्टे के लिए नोकझोक की जरूरत नहीं पड़ती और हार्ड कैश लेकर चलने की जरूरत भी सिमट रही है। हाजीपुर बाजार में कुछ सामान लेने आए भैयालाल कहते हैं, परदेस से पैसे भेजने और प्राप्त करने में पहले से अधिक सहूलियत हो गई है। शहरों में पढ़ने गए बच्चों को पैसे भेजने हों, तो बस एक क्लिक में काम हो जाता है।

लाइन में लगने की जरूरत नहीं पड़ती प्रयागराज के बहरिया के महेश दत्त की उम्र 75 साल की है। वह कहते हैं, जब युवा थे तो मुंबई की एक फैक्ट्री में काम करते थे। उन दिनों मनीऑर्डर के जरिए घर पैसे भेजे जाते थे। इसमें कई बार 15 से 20 दिन लग जाते थे। अब एक मिनट में उनका बेटा चेन्नई से पैसे भेज देता है। यही नहीं, जरूरत पड़ने पर वह खुद भी कहीं भी पैसे का भुगतान कर देते हैं।

यह सुविधा काफी अच्छी है। वाराणसी के चंद्र प्रकाश पेशे से अधिवक्ता हैं। वह कहते हैं, मुझे बैंक गए हुए दो साल से ज्यादा समय हो गया है। अब बैंक जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। सारे काम मोबाइल से हो जाते हैं। सारा ट्रांजेक्शन मोबाइल से कर लेते हैं। कभी नकद की जरूरत पड़ी, तो एटीएम से निकाल लेते हैं। बैंक पासबुक अपडेट कराने से लेकर लेनदेन तक सब कुछ डिजिटल हो चुका है। पैसे के लेनदेन में कोई दिक्कत आती है, तो कस्टमर केयर सर्विस से बात कर लेते हैं और समस्या दूर हो जाती है।

 
लेकिन कुछ मुश्किलें भी हैं...
मथुरा के बरसाना के माखन कहते हैं, यूपीआई से लेनदेन आसान है। लेकिन, फर्जीवाड़े का डर भी रहता है। कई बार बैंक से पैसा कट जाता है और सामने वाले के खाते में भी नहीं पहुंचता। कानपुर के बिठूर में जूते-चप्पल की दुकान चलाने वाले प्रदीप शर्मा कहते हैं, कई बार इंटरनेट स्लो रहता है और ऑनलाइन भुगतान के समय पैसा फंस जाता है।
 
किस माध्यम से कितना डिजिटल लेनदेन  (%)
भीम यूपीआई  51.98
पीपीआई 7.44
आईएमपीएस   5.27
एनईएफटी 4.57
डेबिट कार्ड 4.46
इंटरनेट बैंकिंग 4.41
एनएसीएच 4.34
एनईटीसी    2.76
मोबाइल बैंकिंग 1.62
एईपीएस   1.43
क्लोस्ड लूप वॉलेट 0.41
आरटीजीएस  0.24
यूएसएसडी 00
अन्य  8.52
  
(नोट : वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक की तरफ से इन्हीं माध्यमों को स्वीकृति दी गई है।)

 
पहाड़ों पर यूपीआई से हो रहा भुगतान
पहाड़ों पर यूपीआई से हो रहा भुगतान - फोटो : सोशल मीडिया
लगातार बढ़ रहा डिजिटल भुगतान
डिजिटल के बढ़ते कदमों ने भारत के ग्रामीण इलाकों में नई क्रांति ला दी है। अगस्त 2016 में नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) ने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) लॉन्च किया। यूपीआई के आने से डिजिटल पेमेंट एप से बैंक खाते को लिंक करना और उसके ऑपरेट करना आसान हो गया। लोग अब अपने मोबाइल से ही वित्तीय लेनदेन करने लगे।

शहर ही नहीं, गांवों में भी लोग खूब ऑनलाइन लेनदेन कर रहे हैं। आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं। वित्तीय वर्ष 2016-17 में यूपीआई लेनदेन 1.8 करोड़ था, जो वित्तीय वर्ष 2023-24 में 20 नवंबर तक 9,611 करोड़ तक पहुंच चुका है। पिछले वित्तीय वर्ष यानी 2022-23 में 13,334 करोड़ रुपये का डिजिटल ट्रांजेक्शन हुआ था।

 
न्यू डेवलपमेंट बैंक, अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम, विश्व बैंक की  निवेश समिति सदस्य डॉ. सबीन कपासी कहती हैं, 'यूपीआई से भुगतान की प्रक्रिया 2016 से शुरू हुई और 2021 में इसमें जबरदस्त इजाफा देखने को मिला। तब यूपीआई से 22 अरब का लेनदेन हुआ। आंकड़ों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 217 अरब तक पहुंच जाएगा। मतलब, 2018 के मुकाबले इसमें 122% की वृद्धि हो जाएगी। यूपीआई जैसा टूल दिखाता है कि कैसे तेजी से होता तकनीकी विकास किसी देश को बड़े स्तर पर बदल सकता है और उसकी आर्थिक वृद्धि की ताकत बन सकता है।'

 
वेल्थ रेडिफाइन के सह-संस्थापक सौम्य सरकार कहते हैं, 'भारत के टियर-2 और टियर-3 जिलों में यूपीआई को अपनाने के मामले में अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिल रही है। आंकड़े बताते हैं कि यूपीआई लेनदेन के साथ-साथ रुपे क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड की मांग भी इन जगहों पर बढ़ गई है। FY24 की दूसरी तिमाही में रूपे क्रेडिट कार्ड की मांग में 37 प्रतिशत वृद्धि देखी गई, जो पिछली तिमाही के 23 प्रतिशत से अधिक है। जुलाई-सितंबर तिमाही के दौरान रुपे कार्ड की सबसे अधिक मांग वाले शीर्ष 10 शहर जयपुर, मेरठ, सूरत, नागपुर, रांची, रायपुर, वाराणसी, इंदौर, कानपुर और झांसी थे। यह देश में डिजिटल भुगतान की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।'

 
पे-मी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और संस्थापक महेश शुक्ला के अनुसार, 'एनपीसीआई के अनुसार, साल 2022 में, यूपीआई का कुल लेनदेन मूल्य 125.94 लाख करोड़ रुपये था, जो 2021 के मुकाबले 1.75 गुना अधिक है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि देश के ग्रामीण इलाकों में सबसे ज्यादा स्मार्टफोन खरीदे जा रहे हैं और अब इंटरनेट की व्यवस्था भी बेहतर होने लगी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि आने वाले दिनों में ग्रामीण इलाकों से डिजिटल लेनदेन के क्षेत्र में बड़ी क्रांति होगी। इसका सीधा फायदा देश की अर्थव्यवस्था को मिलेगा और हम पांच ही नहीं, बल्कि सात ट्रिलियन डॉलर जीडीपी के लक्ष्य तक आसानी से पहुंच सकते हैं।'