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जीन बैंक : जलवायु परिवर्तन सहित भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए पुराने बीजों को सहेजने की तकनीक

मनीष मिश्र Published by: Manish Mishra Updated Mon, 20 Nov 2023 11:27 AM IST
सार

पुराने बीजों को जीन बैंक में सहेजने और इसके उद्देश्यों पर इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी एरिड ट्रॉपिक्स (इक्रीसैट)  में जीन बैंक के प्रमुख कुलदीप सिंह से विशेष बातचीत।

नार्वे के स्वालबार्ड में जीन बैंक सामने इक्रीसैट के जीन बैंक प्रमुख कुलदीप सिंह।
नार्वे के स्वालबार्ड में जीन बैंक सामने इक्रीसैट के जीन बैंक प्रमुख कुलदीप सिंह। - फोटो : इक्रीसैट

विस्तार

बीजों की पुरानी किस्मों को छोड़कर किसान नई किस्म के बीजों को अपनाते रहे हैं। लेकिन, पुराने बीज भी अलग-अलग बीमारियों और मौसम से लड़ने की क्षमता रखते हैं। इसीलिए, इन्हें जीन बैंक में सहेजकर रखा जाता है। 

जीन बैंक क्या है?
हजारों सालों में प्रकृति से हमें जो मिला है, कहीं वो खो न जाए, इसकी शुरुआत हैं जीन बैंक। अगर अनाजों की किस्मों को देखें, तो हजारों अलग-अलग किस्में नजर आएंगी। अगर इकट्ठा न करें, तो हम इन्हें खो देंगे। इस तरह से अलग-अलग किस्मों को इकट्ठा किया गया और उसे जीन बैंक का नाम दिया गया। आधुनिक जेनेटिक्स और मॉडर्न प्लांट ब्रीडिंग पिछले 100 साल में शुरू हुई है। जो सबसे अधिक प्रभावशाली हरित क्रांति के समय रही। इस दौरान जो नई किस्में विकसित हो रही थीं, वो अधिक पैदावार वाली थीं, जिससे किसानों को काफी फायदा हो रहा था। इसलिए जब बीजों की नई किस्में आईं, तो किसान पुरानी किस्मों को छोड़ते गए। अगर बीज एक साल नहीं बोया गया, तो वो अगले साल कम अंकुरित होगा। हर देश में अलग-अलग समय पर जीन बैंक बनने शुरू हुए। भारत में 1970 के आसपास 'नेशनल जीन बैंक' बनना शुरू हुआ। जितने भी अंतरराष्ट्रीय संस्थान हैं, सभी ने अपनी-अपनी निर्धारित फसलों का जीन बैंक बनाना शुरू किया। इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी एरिड ट्रॉपिक्स (इक्रीसैट) 1974 में स्थापित हुआ। इसी के साथ जीन बैंक भी बनना साथ-साथ शुरू हो गया। सही तरह से इक्रीसैट में जीन बैंक 1979 से शुरू हुआ।

कैसे काम करते हैं जीन बैंक?
यह संभव नहीं है कि हम बीज इकट्ठा कर लें और हर साल उसे बोते जाएं। यह काफी खर्चीला होता है। 100-200 तरह के बीज तो बोए जा सकते हैं, लेकिन आप के पास हजारों हैं तो कैसे करेंगे? एक तकनीक आई, जिसकी मदद से हम ये बीज शून्य से 18-20 डिग्री सेल्सियस नीचे तापमान पर रखने लगे।     
बीज को काटकर सुखाते हैं, उसे धूप या माइक्रोवेव में नहीं सुखाते, इसके लिए कमरे में 15 डिग्री सेल्सियस तापमान और 15 प्रतिशत आर्द्रता चाहिए। बीज को इन कमरों में पॉलिथीन में रख दिया जाता है। सुखाने का मतलब है कि नमी 5-7% तक आ जाए, हर किस्म अलग समय पर सूखती है।। इसके बाद एल्युमिनियम फॉयल के लिफाफों में रखा जाता है, जिससे कि हवा इधर से उधर न जा सके। इसे वैक्यूम सीलिंग कहते हैं। इस तरह से बीज को रखा जाता है। बीज को -18 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखने पर ये 40 से 50 साल तक सुरक्षित रहता है। अगर इसे 50 साल बाद भी बोया जाएगा, तो आराम से उग आएगा।
 
जीन बैंक में अलग-अलग पुरानी किस्मों को सहेजा जाता है।
जीन बैंक में अलग-अलग पुरानी किस्मों को सहेजा जाता है। - फोटो : इक्रीसैट
जीन बैंक का उद्देश्य क्या है?
इक्रीसेट जीन बैंक में 11 तरह की किस्मों के बीज रखे हुए हैं। इनमें 8 मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो, चेना, सांवा, कंगनी, कुटकी) और चना, अरहर एवं मूंगफली शामिल हैं। ये जो बीज एकत्र किए गए हैं, वो 144 देशों से आए हैं। ये सभी जर्म प्लाज्म 1,29,000 से भी अधिक किस्म के हैं। भारत के नेशनल जीन बैंक में 4.5 लाख से भी ज्यादा जर्म प्लाज्म हैं। इसी तरह, अंतरराष्ट्रीय जीन बैंक में कई अलग-अलग देशों से जर्म प्लाज्म को लाकर जमा किया जाता है। बीज रखने के हमारे तीन उद्देश्य हैं-बीज अलग-अलग जगहों से लाकर रखा जाए, उसे श्रेणीबद्ध करना और अनुसंधान के लिए देना। अगर पिछले 45 साल में देखें तो इक्रीसैट ने करीब 16 लाख से भी ज्यादा सैंपल बांटे हैं। इनमें से चार लाख से अधिक भारत में बांटे हैं। हमारे पास जो जीन होते हैं, उन्हें हर दस साल पर मॉनीटर किया जाता है। हर फसल का एक मॉनिटरिंग सिस्टम होता। अगर किसी बीज का जमाव कम होता है, तो उसे बीज के रूप में फिर पैदा कर लेते हैं और नया बीज लाकर वापस रख देते हैं। यह बीज अगले 50 साल तक फिर रखा रहेगा।

जलवायु परिवर्तन को देखते हुए जीन बैंक कितने जरूरी हैं?
इसका एक अच्छा उदाहरण अगर मैं दूं, तो चने की एक किस्म मध्य प्रदेश से वर्ष 1980 से ली गई थी। परीक्षणों के बाद पाया गया कि यह किस्म सूखे को सह सकती है। इसके बाद, यह भी देखा गया कि कौन-से जीन्स सूखे को झेलने में सहायक हैं। इसके बाद, देश में नई चने की कई किस्मों में सूखे से लड़ने वाले जीन को डाला गया। इसी तरह से, बाजरे में एक बीमारी लगती है डाउनी मिल्ड्यू, जो काफी खतरनाक थी। इसके लिए, जो हमारे पास जर्म प्लाज्म था, उसे स्क्रीन किया। कई किस्मों में बीमारियां लगाईं, जो डाउनी मिल्ड्यू को झेल सकती थीं, उन्हें उपयोग करके नई किस्में बनाई गईं, तो आज भारत में न के बराबर डाउनी मिल्ड्यू दिखती है। 

बाजरे की फसल में एक और बीमारी लग रही है, जिसका नाम है ब्लास्ट। यह बीमारी 20-25 साल पहले नहीं थी। लेकिन, आज यह अधिक हो गई है। इसके लिए, जो हमारे पास जीन हैं, पहले से वो ब्लास्ट प्रतिरोधी हैं, उनमें नए जीन डाल रहे हैं तो ब्लास्ट प्रतिरोधी बाजरे की किस्में भी आ रही हैं। भारत में आयरन की बहुत ही कमी है, टोगो से बाजरे का एक जर्म प्लाज्म आया था, जिसमें 80-85 पीपीएम आयरन था। उसी जीन को निकालकर यहां की किस्मों में डाला गया, तो जो नई किस्में तैयार हुईं, उसमें काफी अधिक आयरन है। इसी तरह, गेहूं और धान की भी बहुत सारी किस्में हैं। ये उदाहरण है कि जीन बैंक और जर्म प्लाज्म कैसे मदद कर सकते हैं। सबसे बड़ा जीन बैंक अमेरिका में है और दूसरे नंबर पर भारत का नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जीनोम रिसोर्सेस है। भारत में पांच ऐसे बैंक हैं, जो जानवरों, कीटों आदि का भी जर्म प्लाज्म रखते हैं। इनका उपयोग फसलों की किस्मों में सुधार करने में होता है।
 
नॉर्वे के स्वालबार्ड में पहाड़ काटकर बनाया गया है जीन बैंक।
नॉर्वे के स्वालबार्ड में पहाड़ काटकर बनाया गया है जीन बैंक। - फोटो : इक्रीसैट

आखिर जीन बैंक कहां और कैसे बनाए जाते हैं?
हर जर्म प्लाज्म तीन जगह रखा जाता है। अगर एक जगह रखेंगे, तो कोई दुर्घटना भी हो सकती है। इसलिए, कृषि पर अनुसंधान करने वाले अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का जो समूह है, उसने निर्णय लिया कि जो मुख्य जीन बैंक है, उसके अलावा दो जगह और जर्म प्लाज्म रखा जाए। उनमें से एक जगह स्वालबार्ड में है। नार्वे की सरकार ने एक ऐसा जीन बैंक बनाया है, जो पहाड़ के अंदर है। उस इलाके में साल भर ठंडक रहती है। कमरे का तापमान -1 से -2 डिग्री सेल्सियस ही मिलेगा। यहां पर भी मशीनें तापमान को -18 डिग्री सेल्सियस पर लेकर आती हैं। जीन बैंक ऐसी जगह होने चाहिए, जहां किसी तरह का विवाद न हो। बिल्कुल शांत जगह हो।  

विवाद की स्थिति आए तो क्या होगा?
ये अंतरराष्ट्रीय संबंध हैं, इसमें सभी देश शामिल होते हैं। नार्वे में जो हमने ब्लैक बॉक्स भेजा है, उसे हमारे अलावा कोई नहीं खोल सकता। अगर कभी जरूरत पड़े, तो हम वो बॉक्स वापस ले सकते हैं। जिस देश का जर्म प्लाज्म होता है, पासवर्ड उसी के पास रहता है। उसी देश को पता होता है कि किस डिब्बे में कौन-सा जर्म प्लाज्म है। एक देश दूसरे देश की मदद जर्म प्लाज्म देकर भी करते हैं।