Uttarakhand: पहाड़ों पर फैल रही दुर्लभ बीमारी, लोगों के लीवर और फेफड़ों में बन रही जहरीली गांठ
गांव जंक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: Himanshu Mishra
Updated Wed, 03 Sep 2025 05:26 PM IST
सार
राजकीय दून मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय के वरिष्ठ जनरल सर्जन डॉ. अभय कुमार इस बीमारी पर पहला गहन अध्ययन कर रहे हैं। उनके अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में राज्य के विभिन्न पर्वतीय जिलों से अब तक 25 मरीजों में इस बीमारी की पुष्टि हो चुकी है।
पहाड़ों पर दुर्लभ बीमारी फैल रही
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में अब एक नई स्वास्थ्य चुनौती सामने आ रही है। सिस्टिक इचिनोकोकोसिस नामक दुर्लभ बीमारी धीरे-धीरे यहां पैर पसार रही है। इस बीमारी से पीड़ित मरीजों के लीवर और फेफड़ों में जहरीली गांठ (सिस्ट) बनने लगती है, जो कई बार जानलेवा भी साबित हो सकती है।
राजकीय दून मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय के वरिष्ठ जनरल सर्जन डॉ. अभय कुमार इस बीमारी पर पहला गहन अध्ययन कर रहे हैं। उनके अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में राज्य के विभिन्न पर्वतीय जिलों से अब तक 25 मरीजों में इस बीमारी की पुष्टि हो चुकी है। इनमें उत्तरकाशी, चमोली और टिहरी जिले सबसे अधिक प्रभावित बताए जा रहे हैं।
कैसे फैलती है यह बीमारी?
विशेषज्ञों के अनुसार, यह बीमारी इचिनोकोकस ग्रैनुलोसस नामक परजीवी से फैलती है। जिन क्षेत्रों में लोग भेड़, बकरी और कुत्ते एक साथ पालते हैं, वहां इस परजीवी के पनपने की संभावना अधिक रहती है। परजीवी दूषित फल और सब्जियों के जरिए मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसके बाद यह लीवर और फेफड़ों पर हमला करके जहरीली गांठ बना देता है।
लक्षण देर से दिखाई देते हैं
इस बीमारी की पहचान शुरुआती दौर में करना कठिन होता है क्योंकि शुरुआती लक्षण सामान्य पेट दर्द या कमजोरी जैसे लगते हैं। अधिकतर मामलों में तब लक्षण सामने आते हैं जब गांठ का आकार 10 सेंटीमीटर से ज्यादा हो जाता है। मुख्य लक्षणों में –
लगातार पेट दर्द,
भूख कम लगना,
उल्टी होना,
और थकान जैसी समस्याएं शामिल हैं।
शोध से सामने आए तथ्य
लाइफ जर्नल में वर्ष 2024 में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक, कश्मीर के श्रीनगर क्षेत्र में 2019 से 2024 तक 110 संदिग्ध मरीजों पर अध्ययन किया गया। इनमें से 12 मरीज सिस्टिक इचिनोकोकोसिस से पीड़ित पाए गए, जिनकी औसत उम्र 46 से 58 वर्ष रही। इसी आधार पर अब उत्तराखंड में भी शोध कार्य शुरू किया गया है। दून मेडिकल कॉलेज की टीम संदिग्ध मरीजों का पूर्वप्रभावी अध्ययन कर रही है और जल्द ही विस्तृत परिणाम जारी किए जाएंगे।
महिलाओं और ग्रामीण समुदाय पर ज्यादा असर
डॉक्टरों का कहना है कि यह बीमारी मुख्य रूप से उन इलाकों में देखी गई है जहां लोग पारंपरिक रूप से पशुपालन और खेती दोनों करते हैं। चूंकि महिलाएं और बच्चे चारे-पानी और घरेलू कामों में ज्यादा जुड़े रहते हैं, इसलिए उनके प्रभावित होने का खतरा ज्यादा रहता है।
जागरूकता और सावधानी ही बचाव
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों को साफ-सफाई पर ध्यान देने, पशुओं और कुत्तों को नियमित दवा देने, फलों और सब्जियों को अच्छी तरह धोने की सलाह दी है। उनका कहना है कि समय रहते पहचान और इलाज से इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है।
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