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बदलता मानसून, बढ़ता खतरा : जलवायु परिवर्तन की मार, खेती पर संकट, चार दशक में बढ़ेंगी बाढ़-सूखे की चरम घटनाएं
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Tue, 23 Dec 2025 12:42 PM IST
सार
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के चलते एशियाई मानसून का स्वभाव तेजी से बदल रहा है, जिससे बाढ़ और सूखे जैसे चरम हालात सामान्य हो सकते हैं। भारत में भी मानसून की अवधि बढ़ रही है, जिसका सीधा असर खेती, जल प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा।
भारत की जीवनरेखा और देश का वित्तमंत्री कहा जाने वाला मानसून आगामी दशकों में सबसे बड़ा खतरा बन सकता है।
- फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
मानसून सदियों से एशिया, खासकर भारत की जीवनरेखा रहा है, लेकिन अब वही मानसून आने वाले दशकों में सबसे बड़ा खतरा बन सकता है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर समय रहते लगाम नहीं लगी, तो वर्ष 2064 के बाद मानसून का चरित्र खतरनाक मोड़ ले सकता है। इसका मतलब यह होगा कि कभी अत्यधिक बारिश, तो कभी लंबे सूखे जैसे हालात आम हो जाएंगे, जो कृषि, जल संसाधन और ऊर्जा प्रणालियों की नींव हिला सकते हैं।
शोध पत्रिका साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हांगकांग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में हुए अध्ययन में साफ कहा गया है कि उच्च उत्सर्जन की स्थिति में एशिया और अन्य उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मौसम का चरम उतार-चढ़ाव नई सामान्य स्थिति बन सकता है।
बढ़ेंगे बारिश और सूखे का खतरनाक दौर
अध्ययन के मुताबिक भविष्य में हर 30 से 90 दिनों के भीतर भारी बारिश और लंबे सूखे के दौर बार-बार देखने को मिल सकते हैं। वैज्ञानिक इसे ‘सब-सीजनल व्हिपलैश’ कह रहे हैं - यानी मौसम का ऐसा झटका, जो अचानक सूखे से बाढ़ या बाढ़ से सूखे में बदल जाता है। यह बदलाव खेती, जल आपूर्ति और बिजली उत्पादन के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है।
शोधकर्ताओं ने दुनिया के उन्नत जलवायु मॉडलों की मदद से मानसून की प्रणाली का विश्लेषण किया, जो तय करती है कि एशियाई मानसून के दौरान 30 से 90 दिनों के भीतर बारिश और सूखे के चरण कैसे बदलेंगे। भविष्य में इसके और अधिक शक्तिशाली होने के संकेत मिले हैं, जिससे कहीं मूसलाधार बारिश होगी, तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ सकता है।
बढ़ेगा असर, फैलता जाएगा दायरा
शोधकर्ताओं ने पाया है कि बारिश लाने वाली मानसूनी लहरें, जो पहले इंडोनेशिया तक सीमित रहती थीं, अब प्रशांत महासागर तक तेजी से फैल सकती हैं। उच्च उत्सर्जन की स्थिति में सदी के अंत तक इसकी गति दोगुनी होने की आशंका है। इसका मतलब है कि मानसून से जुड़े चरम हालात बड़े भूभाग को प्रभावित करेंगे। इसका असर सिर्फ एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। ग्रीनलैंड और उत्तरी रूस में वर्षा पैटर्न बदल सकते हैं, जबकि अफ्रीका में सहारा रेगिस्तान से उड़ने वाली धूल बढ़ने से अटलांटिक में बनने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवात भी प्रभावित हो सकते हैं।
खाद्य सुरक्षा पर मंडराता खतरा
इस अध्ययन से जुड़ी प्रोफेसर मंगकियान लू के अनुसार, सूखे से अचानक बाढ़ में बदलने वाली घटनाएं सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती हैं। उनके मुताबिक, ऐसे झटकों से वैश्विक धान उत्पादन को होने वाला खतरा सामान्य बारिश या सूखे की तुलना में 43 फीसदी अधिक है। अगर एशिया और अफ्रीका के कृषि क्षेत्रों में ऐसे हालात बढ़े, तो दुनिया की खाद्य सुरक्षा गंभीर संकट में पड़ सकती है।
भारत में मानसून का बदलता मिजाज
भारत के लिए यह चेतावनी और भी अहम है, क्योंकि देश की कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था मानसून पर टिकी है। देश में सालाना बारिश का करीब 75 फीसदी हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून से आता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अध्ययन से पता चला है कि भारत में मानसून की अवधि लगातार बढ़ रही है।
शोध पत्रिका मौसम में प्रकाशित इस शोध में 1971 से 2020 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के नतीजों के अनुसार, भारत में मानसून की अवधि हर दशक औसतन 1.6 दिन बढ़ रही है। इसकी मुख्य वजह मानसून की विदाई में हो रही देरी को पाया गया है। सामान्य तौर पर मानसून 15 सितंबर के बाद लौटना शुरू करता है और 15 अक्टूबर तक पूरी तरह विदा हो जाता है, लेकिन अब यह प्रक्रिया धीमी होती जा रही है।
खेती और जल प्रबंधन पर सीधा असर
मानसून की यह ‘धीमी विदाई’ खेती की समय-सारणी को प्रभावित कर सकती है। बुवाई और कटाई के समय में बदलाव, बाढ़ और सूखे की आवृत्ति में उतार-चढ़ाव और जलाशयों के प्रबंधन में नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं। विश्लेषण से यह भी पता चला है कि पूरे देश में मानसून सक्रिय रहने वाले दिनों की संख्या हर दशक औसतन 3.1 दिन बढ़ रही है, खासकर उत्तर-पश्चिम भारत से इसकी देर से वापसी के कारण ऐसा हो रहा है।
तापमान, अल नीनो और भविष्य की चुनौती
अध्ययन के अनुसार 1986 से 2015 के बीच भारत का औसत तापमान हर दशक 0.15 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। जलवायु मॉडल के अनुमान बताते हैं कि तापमान में हर एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ मानसूनी बारिश में करीब 6 फीसदी का इजाफा हो सकता है। साथ ही, अल नीनो जैसी घटनाएं भी मानसून के पैटर्न को गहराई से प्रभावित करती हैं।
केवल मौसम नहीं, नीति का भी सवाल
अब मानसून सिर्फ मौसम विज्ञान का विषय नहीं रह गया है। यह कृषि नीति, सिंचाई योजनाओं, जल प्रबंधन और खाद्य भंडारण रणनीतियों का केंद्र बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मानसून का स्वभाव बदल रहा है, तो नीतियों और योजनाओं को भी उसी हिसाब से नए सिरे से तैयार करना होगा। अध्ययन का संदेश साफ है - अगर बढ़ते उत्सर्जन को अभी नहीं रोका गया, तो आने वाली पीढ़ियों को ऐसे मानसून का सामना करना पड़ेगा, जो जीवन देने के बजाय जीवन की चुनौतियां कई गुना बढ़ा देगा।
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