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भैंसों का दंगल : पुरानी परंपरा का हिस्सा, जानें; प्रतिबंध के बीच टकराव की कहानी

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 25 Oct 2025 01:03 PM IST
सार

कई बुजुर्ग बताते हैं कि पहले भैंसों के दंगल दीपावली के बाद कृषि उत्सव के रूप में आयोजित किए जाते थे, जब किसान अपनी मेहनत की कमाई का जश्न मनाते थे।

भैंसों का दंगल
भैंसों का दंगल - फोटो : गांव जंक्शन

विस्तार

मध्य प्रदेश के उज्जैन में दीपावली के बाद भैंसों का दंगल पुरानी परंपरा का हिस्सा माना जाता है। यह परंपरा आज भी लोगों के बीच उत्साह और रोमांच का केंद्र बनी हुई है। दीपोत्सव के कुछ दिन बाद ग्रामीण क्षेत्रों में इन भैंसों की भिड़ंत देखने हजारों लोग इकट्ठा होते हैं, मानो यह कोई बड़ा उत्सव हो।

प्रतिबंध और विवाद

भैंसों के दंगल पर रोक पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत लगाई गई है। इस अधिनियम में जानवरों को अनावश्यक पीड़ा पहुंचाना दंडनीय अपराध माना गया है। अतीत में भैंसों को आक्रामक बनाने के लिए शराब पिलाने की घटनाओं के चलते कई बार हादसे हुए हैं, न सिर्फ जानवरों को चोट लगी, बल्कि दर्शकों की जान को भी खतरा हुआ। यही कारण है कि प्रशासन ने अब इस पर सख्ती दिखाई है।

परंपरा बनाम कानून

स्थानीय यादव समुदाय इसे अपनी सांस्कृतिक धरोहर मानता है। उनका कहना है कि “भैंसे तो तबेले में भी आपस में लड़ लेते हैं, यह कोई क्रूरता नहीं बल्कि प्राकृतिक स्वभाव है।” कई बुजुर्ग बताते हैं कि पहले भैंसों के दंगल दीपावली के बाद कृषि उत्सव के रूप में आयोजित किए जाते थे, जब किसान अपनी मेहनत की कमाई का जश्न मनाते थे।

तीन जोड़ भैंसों का हुआ मुकाबला

शुक्रवार को उज्जैन के लालपुर क्षेत्र में पारंपरिक दंगल का आयोजन हुआ। इस मुकाबले में तीन जोड़ भैंसों शिव बनाम जीत, शनि बनाम जलवा और एक अन्य जोड़ी ने हिस्सा लिया। मैदान में जब ये भैंसे आमने-सामने आए तो दर्शकों में उत्साह चरम पर था। भिड़ंत के दौरान एक भैंसे का सींग टूट गया, लेकिन भीड़ ने तालियों के बीच दंगल का आनंद लिया। हालांकि, उज्जैन के एसपी प्रदीप शर्मा ने पूर्व में ही ऐसे आयोजनों पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए थे। बावजूद इसके, पशुपालक ग्रामीण इलाकों में एकांत स्थानों पर परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।

तीन महीने की तैयारी से होते हैं तैयार

भैंसों को दंगल के लिए तैयार करने में महीनों की मेहनत लगती है। हर भैंसे की तैयारी करीब तीन महीने पहले से शुरू कर दी जाती है। उन्हें रोजाना घी, दूध, काजू-बादाम और देशी अंडे खिलाए जाते हैं। सरसों के तेल से मालिश कराई जाती है ताकि उनकी ताकत बनी रहे। दो लोग दिन-रात उनकी सेवा में लगे रहते हैं। आयोजकों का कहना है कि भैंसों को लड़ाने से पहले शराब पिलाने जैसी अफवाहें पूरी तरह गलत हैं। जब दो भैंसों को आमने-सामने लाया जाता है, तो वे स्वाभाविक रूप से भिड़ जाते हैं। यह उनकी प्रवृत्ति का हिस्सा है।