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Navratri And Agriculture Confluence Of Faith Crops And Mother Earth This Festival Of Nature Linked To Farming
प्रकृति का पर्व नवरात्रि : किसान जब आस्था के साथ बोते हैं उम्मीदों के बीज, सौभाग्य का संदेश देते कलश और जवारे
मोहम्मद आमिल, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Mon, 22 Sep 2025 02:01 PM IST
सार
नवरात्रि का पावन पर्व किसानों को संदेश देता है कि बीज केवल अनाज नहीं, बल्कि भविष्य की उम्मीद हैं। फसल और मिट्टी की देखभाल करना उतना ही जरूरी है जितना अपने मन और घर को शुद्ध रखना। धरती मां को आशीर्वाद लौटाना ही असली समृद्धि है।
नवरात्रि और कृषि : आस्था, फसल और धरती मां का संगम
- फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
दक्षिण दिल्ली के जैतपुर क्षेत्र का खादर इलाका 15 दिन पहले यमुना में बाढ़ आने से जलमग्न हो गया... खेत और बस्तियां पानी में डूब गईं। किसानों की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई। अब यहां पानी पूरी तरह उतर चुका है, लोगों का जीवन पटरी पर लौटने लगा है। किसान भी फिर से खेतों को संवारने में जुट गए हैं। बर्बाद हो चुकी फसल को भुला, नई उम्मीद के भरोसे खेतों की जुताई की जा रही है। आज ही नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है। किसानों का मानना है कि खेत ही उनका मंदिर है और मिट्टी ही उनकी मां है। जब नवरात्रि आती, तो किसान केवल पूजा-पाठ ही नहीं करते, बल्कि अपने खेत और धरती मां को भी धन्यवाद दते हैं। आइए इस नवरात्रि जानते हैं, मां की भक्ति और फसलों का महत्व।
नवरात्रि का महत्व
नवरात्रि का पर्व शक्ति की उपासना और देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना का पावन समय है। यह वर्ष में दो बार चैत्र और आश्विन माह में आता है। इन दोनों कालों को ऋतु परिवर्तन और संधिकाल माना गया है, इसलिए शास्त्रों में नवरात्रि को विशेष महत्व दिया गया है। आज से शारदीय नवरात्र की शुरुआत हो गई है। भक्ति से भरा यह पावन पर्व 10 दिन तक चलेगा।
नौ गुप्त स्वरूप : नवदुर्गा
मां दुर्गा को आदि शक्ति, जगन्माता और सर्वसिद्धिदात्री कहा गया है। समय-समय पर उन्होंने अलग-अलग रूप धारण करके अधर्म का नाश किया और धर्म की रक्षा की। ब्रह्मा जी द्वारा वर्णित उनके नौ गुप्त स्वरूप नवदुर्गा कहलाते हैं। इनकी उपासना से भक्त को न केवल भौतिक सुख और समृद्धि मिलती है, बल्कि आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक सिद्धियाँ भी प्राप्त होती हैं।
किसान की मेहनत की तस्वीर : दक्षिण दिल्ली के जैतपुर क्षेत्र का खादर इलाका, तब और अब
- फोटो : गांव जंक्शन
नवरात्रि के पहले दिन जौ बोने की परंपरा
नवरात्रि को फसलों के बेहद अहम माना जाता है। इस पावन पर्व के पहले दिन कई जगह जौ बोने की परंपरा है। लोग अपने घर या खेत में जौ के बीज बोते हैं। आचार्य राहुल वशिष्ठ ने बताया कि शास्त्रों में जौ को पहली फसल और ब्रह्म माना गया है। पूजा और हवन में भी जौ का इस्तेमाल इसलिए होता है क्योंकि यह अनाज का सम्मान करने का प्रतीक है।
दिखती है फसलों के भविष्य की झलक
मान्यता है कि अगर जौ जल्दी और हरे-भरे उग जाएं, तो यह सुख-समृद्धि का संकेत है। अगर जौ पीली या पतली निकलें, तो आने वाले समय में कठिनाई हो सकती है। अगर जौ आधी हरी और आधी पीली हों, तो साल का कुछ समय अच्छा और कुछ समय मुश्किल भरा माना जाता है। इस तरह किसान मानते हैं कि जौ केवल बीज नहीं, बल्कि भविष्य की झलक है।
विजयदशमी और बीज बोने की परंपरा
आचार्य राहुल वशिष्ठ कहते हैं कि बहुत पुराने समय में जब न सड़कें थीं और न नक्शे, लोग लंबी यात्राओं या युद्ध पर जाते समय रास्ते में बीज बो देते थे। नवरात्रि के दस दिनों में जब वे बीज घास बन जाते, तो लौटते वक्त वही हरियाली उन्हें रास्ता दिखाती। यह प्रथा विजयादशमी के असली अर्थ- विजय और सुरक्षित वापसी को दर्शाती थी।
नवरात्रि और मिट्टी का रिश्ता
नवरात्रि शुद्धता, नई ऊर्जा और शक्ति का पर्व है। हल्द्वानी के प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा मानते हैं कि जैसे हम मां दुर्गा से शक्ति मागंते हैं, वैसे ही हमें धरती मां का भी आशीर्वाद लेना चाहिए। मिट्टी जीवन की नींव है। इसमें खनिज, जीवाणु और ऊर्जा होती है जो हमारी फसलों को पोषण देती है। जैसे नवरात्रि में हम सात्विक भोजन और स्वच्छ विचार रखते हैं, वैसे ही मिट्टी भी तब फलती-फूलती है जब उसमें रसायनों का जहर न डाला जाए। जैविक खाद और प्राकृतिक तरीकों से मिट्टी बार-बार खुद को नया करती है और हमें अच्छी फसल देती है।
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