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सूर्यपुत्र कर्ण से है छठ महापर्व का जुड़ाव : जानें; कैसे बिहार से शुरू हुई छठी मैया की पूजा

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sun, 26 Oct 2025 10:50 AM IST
सार

छठ केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। यह पर्व सूर्यदेव की ऊर्जाशक्ति और मातृत्व की संवेदना का संगम है।
 

सूर्यपुत्र कर्ण से है छठ महापर्व का जुड़ाव
सूर्यपुत्र कर्ण से है छठ महापर्व का जुड़ाव - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

छठ का महापर्व बिहार समेत पूरे देश में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व भगवान सूर्य और छठी मैया को समर्पित है। आज इस महापर्व का दूसरा दिन खरना है। कल भक्त अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देंगे, और अंतिम दिन यानी चौथे दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर व्रत का समापन होगा। इस महापर्व के पीछे कई धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक कथा महाभारत के योद्धा सूर्यपुत्र कर्ण से भी जुड़ी हुई है।

कर्ण से जुड़ी है छठ पूजा की कहानी

महाभारत के अनुसार, कर्ण सूर्यदेव के पुत्र थे। माता कुंती ने सूर्य देव की आराधना के लिए मंत्रों का जाप किया था, जिसके परिणामस्वरूप कर्ण का जन्म हुआ। लेकिन सामाजिक भय के कारण कुंती ने शिशु कर्ण को नदी में बहा दिया। कर्ण में सूर्यदेव का तेज और आशीर्वाद निहित था। उनकी दानवीरता, पराक्रम और धर्मनिष्ठा आज भी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

जन पूवर्जन्म में असुर बने कर्ण

कथाओं के अनुसार, कर्ण का पूर्वजन्म दंभोद्भवा नामक असुर के रूप में हुआ था। उसे सूर्यदेव ने 1000 कवच और दिव्य कुंडल का वरदान दिया था, जिससे वह अजेय बन गया। लेकिन अहंकारवश उसने अत्याचार करना शुरू किया। तब नर और नारायण ने कठोर तपस्या कर उसके 999 कवच तोड़ दिए। जब उसके पास केवल एक कवच बचा, तो वह सूर्यलोक में जाकर सूर्यदेव की शरण में चला गया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने वरदान दिया कि अगले जन्म में वह उनका पुत्र बनेगा। यही असुर अगले जन्म में कर्ण के रूप में जन्मा।

छठ पूजा की हुई शुरुआत

कर्ण जब अंग देश (वर्तमान बिहार के भागलपुर और मुंगेर क्षेत्र) के राजा बने, तो उन्होंने सूर्यदेव की भक्ति में प्रतिदिन सूर्य नमस्कार और अर्घ्यदान करना आरंभ किया। वह नियमित रूप से छठी मैया की आराधना करते और सूर्यदेव को जल अर्पित करते थे। कहा जाता है कि कर्ण के द्वारा ही छठ पूजा की परंपरा बिहार और पूर्वांचल में स्थापित हुई। इसीलिए आज भी छठ पर्व के दौरान सूर्य उपासना और अर्घ्यदान को अत्यंत शुभ माना जाता है।