Home Lokrang Gramyug Ukhlina Village Standing On The Mound Of History Where Fishes Were Clearly Visible In Bright Water Of Hindon

ग्रामयुग: इतिहास के टीले पर खड़ा उखलीना गांव, जहां हिंडन के उजले पानी में कभी साफ दिखाई देती थीं मछलियां

आदित्य भारद्वाज , वरिष्ठ पत्रकार, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 12 Apr 2025 07:27 PM IST
सार

इतिहास के टीले पर खड़े पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक गांव उखलीना में पैदा होने वाले गन्ने से बना गुड़ दूर-दूर तक मशहूर हुआ करता था। गांव की चौहद्दी से बहने वाली हिंडन नदी के उजले पानी में मछलियां भी तब साफ दिखाई देती थीं। लेकिन, अब न तो गांव में वो गन्ना पैदा होता है, न ही गुड़ की वो मिठास बची है। हिंडन का पानी भी अब पहले जैसा नहीं रह गया है। 

पश्चिमी यूपी के इस इलाके में गन्ने का व्यापार आज की तरह नहीं था। आसपास कोई शुगर मिल भी नहीं थी।
पश्चिमी यूपी के इस इलाके में गन्ने का व्यापार आज की तरह नहीं था। आसपास कोई शुगर मिल भी नहीं थी। - फोटो : गांव जंक्शन

विस्तार

बात करीब 40 साल पुरानी है। पश्चिमी यूपी के मेरठ जिले में बसे उखलीना गांव की चौहद्दी से होकर बहने वाली हिंडन नदी के उजले पानी में तैरती मछलियां साफ दिखाई देती थीं। उस समय मेरी उम्र 5-6 साल रही होगी, जब दादी की उंगली पकड़कर मैं मछलियों को दाना डालने जाता था। पीछे मुड़कर देखता हूं तो हिंडन के कल-कल बहते पानी की गूंज महानगर के कोलाहल में आज भी साफ सुनाई देती है।

गन्ना और देसी गुड़ गांव की पहचान 
इतिहास के टीले पर खड़े उखलीना गांव को गन्ने और देसी गुड़ के लिए जाना जाता रहा है। उखलीना गांव के खादर में उगने वाले गन्ने से बनने वाला गुड़ दूर-दूर तक मशहूर था। हरियाणा और राजस्थान से लोग इस गुड़ को खरीदने चले आते थे। कहते हैं - गांव के गन्ने (ऊख या ईख) के कारण ही इसका नाम उखलीना पड़ा। कुछ अन्य लोगों का कहना है कि उंचाई पर होने के कारण गांव का यह नाम पड़ा। उखलीना के नाम के पीछे की कहानी कुछ भी हो, पर यह बात तो सोलह आने सच है कि इतिहास और भूगोल यहां एकाकार हो जाते हैं।

हिंडन की गोद और इतिहास का टीला 
गंगा-यमुना के दोआब में स्थित उखलीना गांव से एक किमी दूर हिंडन नदी बहती है। उखलीना से आलमगीरपुर गांव सटा है, जो सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे पूर्वी स्थल माना जाता है। आलमगीरपुर में ही ऐतिहासिक परशुराम का टीला है, जिसके बारे में मान्यता है कि यह परशुराम भगवान की तपोस्थली रहा है। उखलीना और आलमगीरपुर ऐसे जुड़े हैं कि सिर्फ स्थानीय आदमी ही बता सकता है कि कहां उखलीना खत्म होता है और कहां आलमगीरपुर शुरू! नदी के दूसरे किनारे पर है पुरा गांव, जहां महादेव का मंदिर है। इसे पुरा महादेव कहते हैं। पश्चिमी यूपी, राजस्थान और हरियाणा में इस मंदिर की खूब मान्यता है। कहते हैं परशुराम ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी।
तब खरबूजा और तरबूज यहां बेचा नहीं जाता था। जिसके यहां खांड और गुड़ नहीं होता, वो खरबूजा या तरबूज देकर गुड़ और खांड ले आते।
तब खरबूजा और तरबूज यहां बेचा नहीं जाता था। जिसके यहां खांड और गुड़ नहीं होता, वो खरबूजा या तरबूज देकर गुड़ और खांड ले आते। - फोटो : AI
खरबूजा-तरबूज से जुड़ी अनूठी रीत
हिंडन का पानी तब साफ हुआ करता था और नदी के चारों तरफ तटबंध भी नहीं होते थे। गर्मियों में गांव के बच्चे नदी में छलांग लगाकर तैरते हुए देखे जा सकते थे। मैंने और मुझसे पहले की कई पीढ़ियों ने हिंडन नदी में ही तैरना सीखा। तब नदी स्वच्छंद बहती थी। बरसात में जब पानी चढ़ता और फिर पीछे हटता, तो अपने साथ लाई गई उपजाऊ मिट्टी नदी छोड़ जाती। थोड़ी ऊंचाई वाली जमीन पर ग्रामीण खरबूजा और तरबूज उगाते। इस मिट्टी में खरबूजा और तरबूज खूब फलते। तब इन्हें बेचा नहीं जाता था। जिन किसानों के पास कम जमीन थी, जो गुड़-खांड नहीं बना पाते थे, वे इन्हें देकर गुड़, खांड और शक्कर ले लेते। तब यही रीत सारे इलाके में थी।

घर-घर में गाय, बैल और बुग्गी
हिंडन के खादर में बड़ी गोचर भूमि थी, जहां पूरे गांव के पशु चरते थे। हर घर में गाय थीं, बैल थे, बैलगाड़ियां और बुग्गी भी थीं। गांव में दो-तीन लोग पशुओं को चराने ले जाते। सुबह दूध दुहने के बाद, गाय घेर में खली और चारा खा लेतीं, फिर जंगल में चरने चल पड़तीं। एक के पीछे एक चुपचाप जातीं। शाम का धुंधलका होने लगता तो जंगल से पशुधन लौट आता। उनके चलने से उड़ती गोधूली देखकर लोग समझ जाते कि गायें आ रही हैं। हर गाय को पता था, उसका ठिकाना किस खूंटे पर है। कोई पहुंचाता नहीं था। देहरी पर आकर खड़ी हो जाती थी गायें, जहां औरतें आटे की लोई और गुड़ देकर उनकी अगवानी करतीं। गाय चुपचाप अपने खूंटे पर खड़ी हो जातीं, फिर दूध दुहा जाता। सर्दी ज्यादा हो, तो उपलों की धूनी सुलगाई जाती, ताकि गायों को ठंड न लगे। अगर कोई गाय रात को जोर से रंभाती, तो लोग उठकर देखते कि कहीं उसे तकलीफ तो नहीं! वो जीवन तेज नहीं था, पर जो था, वक्त के साथ चलता था। उसमें जीने का सुकून था। अब ऐसा कहां रहा!
आज पाइप के जरिये गांवों में पानी पहुंचाया जा रहा है। लेकिन, उखलीना में करीब 4 दशक पहले डेढ़ फीट खोदने पर पीने का पानी मिल जाता था।
आज पाइप के जरिये गांवों में पानी पहुंचाया जा रहा है। लेकिन, उखलीना में करीब 4 दशक पहले डेढ़ फीट खोदने पर पीने का पानी मिल जाता था। - फोटो : गांव जंक्शन
डेढ़ फीट पर मिल जाता था मीठा पानी
हिंडन के खादर क्षेत्र में दोनों गांवों के किसानों की जमीनें हैं। 1990 से पहले यहां ट्यूबवेल की जरूरत नहीं पड़ती थी। साल भर पानी भरा रहता था। जगह-जगह धरती से सोते फूटते थे। मंद-मंद पानी बहता रहता। बरसात में अगर पानी ज्यादा हो जाता, तो कच्ची सड़कों पर बने खालों से बहता हुआ नदी में जा मिलता। तब किसान खेत में पानी साथ लेकर नहीं जाते थे। प्यास लगे तो खुरपी से डेढ़-दो फीट गहरा गड्ढा खोदा और छोड़ दिया। धरती से रिस-रिसकर साफ, मीठा पानी ऊपर आ जाता। अंजुरी में भरा और पी लिया। कोई बीमार नहीं पड़ता था, क्योंकि न धरती में रासायनिक खाद डाली जाती थी, न उसे खाद की जरूरत थी। जो कुछ था, सब प्रकृति का दिया हुआ था। गन्ने में मिठास थी ही, पानी में भी मिठास घुली थी, क्योंकि कीटनाशक का नामोनिशान नहीं था।
गन्ने से रस निकाला जाता, फिर उसे कोल्हू में ले जाकर गुड़, खांड और शक्कर बनाई जाती।
गन्ने से रस निकाला जाता, फिर उसे कोल्हू में ले जाकर गुड़, खांड और शक्कर बनाई जाती। - फोटो : गांव जंक्शन
पहले नहीं था गन्ने का ऐसा व्यापार
1990 से पहले यहां बस दो फसलें होती थीं - गन्ना और ढैंचा। वजह साफ थी, पानी इतना था कि खेत दलदली बने रहते। ये दोनों फसलें पानी में डूबे रहने के बाद भी खराब नहीं होतीं। मैं दादी के साथ बुग्गी पर बैठकर खेत जाता। दादी बुग्गी पर गन्ने की पत्तियों का ढेर बनाकर सूती साड़ी बिछा देतीं और मुझे बिठा देतीं। तब गन्ने का व्यापार आज की तरह नहीं था। आसपास कोई शुगर मिल भी नहीं थी। गन्ने से रस निकाला जाता, फिर उसे कोल्हू में ले जाकर गुड़, खांड और शक्कर बनाई जाती। ढैंचा पशुओं के लिए उगाया जाता। हाथ की चक्की में उसे दलकर खली में मिलाया जाता और पशुओं को खिलाया जाता। सर्दियों में खासतौर पर ऐसा किया जाता, क्योंकि ढैंचा की तासीर गर्म होती है। इसे खाकर पशुओं को ठंड नहीं लगती। दुधारू पशुओं के लिए यह बहुत अच्छा चारा माना जाता था, इससे दूध भी बढ़ता। ढैंचे की लकड़ियां ईंधन के काम आती थीं।

कोल्हू चलाते बैल और घुंघरुओं की आवाज
गांव में कई कोल्हू हुआ करते थे। कई घर मिलकर इन्हें लगाते। बारी-बारी से सब अपना गन्ना वहां लाते। बैल कोल्हू चलाते, रस निकलकर कुंडी में जमा होता रहता। उनके पैरों में बंधे घुंघरू और गले की घंटियों की आवाज ऐसे टन-टन करती, मानो कोई संगीतकार दूर बैठा मधुर धुन बजा रहा हो। बैलों की चाल बदलती, धुन बदल जाती।

पूरे जंगल में फैल जाती थी गुड़ की महक
ठिठुरती सर्दी में गुड़ ज्यादातर रात को बनाया जाता। गन्ने का रस निकलता और गुड़ बनने की महक छा जाती - गांव से लेकर मीलों तक फैले जंगल में। उस महक को सूंघकर नीलगाय, हिरण जैसे जानवर कोल्हू से थोड़ी दूर खड़े हो जाते। वे इंतजार करते कि गुड़ बनाने वाले कब जाएं, चाक ठंडा हो, और पास में पड़ी मीठी राब खाने को मिले। गन्ने का रस निकलने के बाद बची खोई नरम हो जाती, उसे भी जानवर चाव से खाते। उस गन्ने से बना गुड़ काला नहीं होता था। न उसमें कोई केमिकल मिलता, न रंग डाला जाता। जो था, सब कुदरती था। मंद रोशनी में गुड़ की डली को आपस में रगड़ो तो चांदी जैसे सफेद कण झरते हुए दिखाई देते। खाने में इतना लाजवाब कि कोई मिठाई उसकी बराबरी न कर सके। गांव वाले सालभर के लिए गुड़, खांड और शक्कर बना लेते। जो बचता, उसे नजदीकी हाट में बेच आते। ठीक से याद नहीं, शायद दो-तीन रुपये धड़ी (करीब पांच किलो) का भाव रहा होगा।
अब जो गुड़ बनता है, वो मसाले वाला है, रंग डालकर तैयार होता है। खादर में पैदा होने वाला गन्ने का बीज भी खत्म हो गया।
अब जो गुड़ बनता है, वो मसाले वाला है, रंग डालकर तैयार होता है। खादर में पैदा होने वाला गन्ने का बीज भी खत्म हो गया।
बदला गांव, गुड़, गन्ना और हिंडन नदी 
गांव का मिजाज बदल रहा है। उस गुड़ में भी वो मिठास कहां रही! अब जो गुड़ बनता है, वो मसाले वाला है, रंग डालकर तैयार होता है। खादर में पैदा होने वाला गन्ने का बीज भी खत्म हो गया। अब गन्ना सख्त है, जंगली सुअर, नीलगाय उसे खा नहीं सकते। उसकी पत्तियां उनके मुंह को चीर देती हैं। हिरण तो जंगल से कब के गायब हो गए। नदी के किनारे का घना जंगल, जिसे स्थानीय भाषा में बनी कहते थे, वो इतना घना था कि दिन में भी अंधेरा रहता। अब वो जंगल भी धीरे-धीरे सिमट रहा है।

समय बदला तो सहारनपुर की पहाड़ियों से निकलने वाली हिंडन नदी में शहरों का गंदा पानी, पेपर मिल और फैक्ट्रियों का कचरा डाला जाने लगा। साल-दर-साल नदी मरने लगी। खादर में सोते सूखने लगे। लोगों ने ट्यूबवेल लगाने शुरू किए। सरकार ने भी आधुनिक खेती को बढ़ावा देने की मुहिम चलाई। सरकारी ट्यूबवेल लगे। गोचर जमीन खत्म हो गई। जहां सैकड़ों गाय-बैल चरते थे, वो जमीन सिमट गई। ट्रैक्टर आए, बैलों की जरूरत खत्म हुई। गोचर नहीं बचा तो गायें रखना बंद हो गया।

गन्ना अब अपने लिए न उगाकर, बेचने के लिए उगाया जाता है। समय के साथ पानी कम हुआ, खेती का आधुनिकरण हुआ, तो खादर में हर फसल होने लगी। जहां दो फीट पर पानी निकल आता था, जहां सोते फूटते थे, वहां अब पानी 50-70 फीट नीचे चला गया है। अब न वो नदी बची है, न उन खेतों के गन्ने में मिठास रही। गुड़ का स्वाद भी फीका पड़ गया।

चरने के बाद लौटती गायों की गोधूली अब दिखती नहीं। कुलांचे मारते हिरण गायब हो गए। मरी हुई नदी के साथ वो गुड़ की मिठास भी चली गई, जो बचपन में जीभ पर घुल जाया करती थी। अब हिंडन में न वह उजला पानी बहता है और न ही मछलियां दिखाई देती हैं। गांव के मिजाज से लेकर यहां पैदा होने वाला गन्ना और इससे बनने वाले गुड़ की मिठास तक सब कुछ बदल गया है।