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GRAMYUG: बहुरा से दिन लहुरा, खिचड़ी से दिन जेठ; रात निर्मली दिन में छाहीं, तब समझो कि बरखा नाहीं...

स्मिता वाजपेयी (कवयित्री एवं लेखिका), नरकटियागंज (बिहार) Published by: Umashankar Mishra Updated Fri, 18 Oct 2024 02:34 PM IST
सार

दिन अब छोटे हो रहे हैं। शाम जल्दी ढल रही है। इसे कहावतों में कुछ इस तरह कहा गया है - 
बहुरा से दिन लहुरा, खिचड़ी से दिन जेठ। 
जब यह कहावत बनी होगी; हाथ या दीवार घड़ी नहीं रही होगी। आंगन में आती धूप के एक-एक अंगुल सिमटने के प्रमाण के साथ मेरी दादी-सास दिन के छोटा या बड़ा होने को बता, दिखा देतीं थीं। ऐसी कई कहावते हैं, जिन्हें सुनते हम बड़े हुए और जिनको अक्सर प्रमाणित होते हुए भी देखा।

ऐसी कई कहावते हैं, जिन्हें सुनते हम बड़े हुए और जिनको प्रमाणित होते भी देखा।
ऐसी कई कहावते हैं, जिन्हें सुनते हम बड़े हुए और जिनको प्रमाणित होते भी देखा। - फोटो : गांव जंक्शन

विस्तार

कहावतें जीवन के लंबे अनुभवों से उपजी हैं और कितनी सटीक होती हैं ना! न जाने कब सेे कहावतें और लोकोक्तियां जनमानस के बीच पूरे साक्ष्य एवं प्रमाण के साथ रची-बसी हुई हैं। दिन अब छोटे हो रहे हैं। शाम जल्दी ढल रही है। इसे कहावतों में कुछ इस तरह कहा गया है -

बहुरा से दिन लहुरा, खिचड़ी से दिन जेठ।

जब यह कहावत बनी होगी, हाथ या दीवार घड़ी नहीं रही होगी। आंगन में आती धूप के एक-एक अंगुल सिमटने के प्रमाण के साथ मेरी दादी-सास दिन के छोटा या बड़ा होने को बता, दिखा देतीं थीं। बिना घड़ी देखे मेरी अम्मा भी धूप देख के बिल्कुल सही समय बता देती हैं।

अम्मा से ही सीखी हैं मैंने भी घाघ और भड्डरी वाली कुछ कहावतें और उनके अनुसार - आसमान, बिजली चमकने की दिशा और हवा के बहाव से बारिश होगी या नहीं या कल भी लगातार बारिश होगी; ये बता सकती हूं। कहावतों के सटीक प्रमाण चमत्कृत करते हैं। अम्मा के कारण अनगिनत कहावतें याद हैं, जो बेसाख्ता याद आ जातीं हैं, मुंह से निकल जाती हैं।

22 अगस्त को था बहुला! और दस दिन में ही शाम आधा घंटा पहले उतर रही है मेरे पोर्टिको में। बहुला व्रत पर्व होता है भाद्रपद की तृतिया तिथि को। उसके अगले दिन से ही धूप धीरे-धीरे सिमटने लगती है। फिर, ये कहावत याद आई, तो सोचा आप सभी से भी पूछ लूं कि इस बदलाव को आप भी देख रहे हैं मेरी ही तरह या ...अति व्यस्त मानवों को कोई फर्क ही नई पड़ रहा?

कहावतें किसी भी बोली भाषा की हों; सदियों के अनुभव से उपजी हैं और आज भी उतनी ही प्रमाणिक हैं, उतनी ही प्रासंगिक हैं। आप कहावतों पर गौर करें, तो इनमें मिलने वाले जीवन के विभिन्न राग, रंग, ढंग की प्रमाणिकता पर दंग हुए बिना नहीं रह सकते। घाघ और भड्डरी की मौसम संबंधी जितनी कहावतें हैं, वह आज भी प्रामाणिक हैं। ऐसी ही एक कहावत, जो अभी याद आ रही है, वह है-

रात निर्मली दिन में छाहीं
तब समझो कि बरखा नाहीं।।


इसे मैं बचपन से सुनते-देखते बड़ी हुई हूंं। आप भी इसे मिला लीजिएगा। वाकई तब बरखा नहीं होती, जब दिन भर बदली रहे, और रात में आसमान साफ रहे। एक और इन्हीं का कहा याद आ रहा है - बेरा हँसना। इसे भी मैंने एकदम प्रामाणिक पाया है। बेरा हंँसने का मतलब कि बरखा के दिन में दिनभर मूसलाधार पानी बरसा और सूर्यास्त के समय खूब चमकीली धूप हो गई, तो निश्चय जानिए यह दिन नहीं खुल रहा है। यह संकेत है कि अगले दिन भी लगातार मूसलाधार बारिश रहेगी। ठंड और कोहरे वाली ऋतु है, तो अगले दिन धूप नहीं होने वाली।

ऋतु परिवर्तन से ही जुड़ी एक और कहावत है, जिसे बचपन से ही मैं हमेशा सुनती रही हूं, वो है-

अदहन देत अगहन
पूस के दिन फूस
माघ तिलातिल बाढ़ी
फागुन गोड़ा काढ़ी


जाड़े के दिनों में सबसे ज्यादा इसे मंत्र की तरह रटती थी ईया (दादी)। दिन छोटे होते थे और कई काम अधूरे रह जाते थे। तब वो इसे कहते हुए या तो काम समेटती थीं या जल्दी करने को कहती थीं - अदहन देत अगहन। आधा नवंबर और आधा दिसंबर के समय जब दिन भात के लिए अदहन चढ़ाते और उतारते ही खत्म हो जाता है। 
‘पूस का दिन फूस’ (एक तरह की घास) की आग की तरह तुरंत जली और तुरंत खत्म। माघ से तिल-तिल ही बढ़ पाता है दिन और फागुन आते-आते तो पूरा बसंत खिल जाता है। अब दिन, धूप, ऊष्मा की गति कदम-कदम बढ़ने लगती है।

ऐसी ही कुछ और कहावते हैं, जिन्हें सुनते हुए हम बड़े हुए और जिनको थोड़ी समझ होने पर प्रमाणित होते भी देखा और ऐसा होते देखकर हमेशा ही आश्चर्य से भरते रहे। उनमे से कुछ कहावतें हैं-

कलसे पानी गरम हो, चिरई उड़ावे धूर।
अंडा ले चिउंटी चले तौ बरखा भरपूर।।


गांव में रहने के कारण चिड़िया को धूल में लोटते, पंखों से धूल को फर्र-फर्र उड़ाते देख, लोगों को कहते सुना है और देखा भी है कि बरखा होगी। और बरखा होती ही है। चींटियां भी कतार से अपने अंडे ले के चलती हैं, तो अवश्य बरखा होती है।
कहावतें विभिन्न भाषा-बोलियों में प्रचलित हैं, जिनका लिखित साहित्य नहीं है।
कहावतें विभिन्न भाषा-बोलियों में प्रचलित हैं, जिनका लिखित साहित्य नहीं है। - फोटो : गांव जंक्शन
अगर आप शहर में रहते हैं और आपको दिशाभ्रम ना हो तो इसे आप स्वयं देख लीजिएगा- 

चमके पश्चिम उत्तर ओर, 
तब पानी मानिहैं जोर।


इसका अर्थ है कि अवश्य ही वर्षा होगी। क्या आप यकीन करेंगे कि मौसम साफ रहता था और उत्तर-पश्चिम की ओर रह-रह के बिजली चमकती थी, तो मेरी अम्माँ, ईया, बुआ लोग भारी कपड़े नही धुलती थीं, क्योंकि उन्हें पता चल जाता था कि भारी बरखा होगी।

आप चाहे जहां के निवासी हों, जिस बोली-भाषा को बोलते हों, अपने क्षेत्र की कहावतों को आपने सुना ही होगा। तो अब से उनमें कही गई बातों की जांच भी करें और यकीनन आप उन्हें सटीक पाएंगे। चाहे वो कहावतें कृषि, मौसम, भू-विज्ञान से हों या खानपान से हों। कहावतों के सार से आप उन्हें जीवन में एकदम खरा पाएंगे। 

सिर्फ अनुमान, विज्ञान की बातें ही नहीं कहतीं कहावतें, बल्कि लोक-व्यवहार, रिश्ते-नातों के मीठे, बुरे अनुभव, समय, प्रारब्ध और मर्म को बेधती चिरकालिक सत्य को भी बताती चलती हैं। इक्कीसवीं सदी या यांत्रिक युग के हवाले से आप इनमें से किसी भी कहावत को अप्रासंगिक नही पाएंगे। आज भी बहुतायत में कई घरों की स्त्रियों का जीवन यही है- 

मोर पिया मोर बात ना पूछे, 
तउ सुहागिन नाव रे।


और उसके बाद समाज, परिवार में तिरस्कृत, अनादृत स्त्री के लिए परिवार का पाखंड देखिए-

मुअली पतोह के बड़ी-बड़ी आंख रहे।

कबीर की साखियों, दोहों के जैसे ही कई कहावतों में पाखंड, प्रवृत्ति पर रोष, व्यंग्य देखन को मिलता है। आप अगर देहात में जाएं, तो बातों-बातों में, लोगों की आपसी बातचीत में कई कहावतें सुन लेंगे। पूरे एक जीवन अनुभव को कम में कहने, समझने का सलीका है कहावत। चाहे किसी पर तंज हो, अपनी व्यथा हो, या किसी को कोई सांत्वना देनी हो, कहावतें हर जगह आपकी ओट, आपका अवलम्ब हो जातीं हैं।

का बालू के भीत, का ओछर से प्रीत 
यह कहावत कहकर प्रेम के धोखे को सहना हो; या पद, उम्र में बेलिहाज होते व्यवहार की बात हो तो कहते हैं - जेठ रहिहैं जेठानी, त रखिहैं आपन पानी। इसी से सावधान हुआ जाता है।

अन्हरा सियार के पकुआ मेवा 
ऐसी कहावतों में हास्य व्यंग्य भी खूब मिलता है। पकुआ, पाकड़ के पेड़ का फल होता है, और अंजीर, काजू के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता है। सियार की बात पर याद आया कि सियार को लेकर कई कहावतें कही गई हैं। ऐसी ही एक कहावत है- सियरा ऊहे ह, रोंआ झरले बा। 

लोहा के सहतई भईल, 
सियार गढ़वलें टांगी। 


ऐसी कई और कहावते भी हैं, जो खूब कही व सुनी जाती रही हैं। 

समाज जो कल था, आज भी उसी दिशा में जा रहा है न! यानी यह देखा-देखी पाप, देखा-देखी पुन्न वाली बात तब भी थी। लोग तब भी ऐसे थे, जो चाहते थे- 

न बहे हर न चले कुदारा, बईठल भोजन दे मुरारा।

...और यह भी सच है कि प्रवृत्ति कभी जाती नहीं। इसीलिए, लोगों को कहते सुना है - 

ए भाई हिन्नू, एक्के के तिन्नू।  

इसी तरह, एक कहावत है - मोरचाइलो हंसुआ अपने ओर खींचेला।

खुद को प्रचारित करके जो वाकई गुणी हैं, उसके मौकों को छीन लेना, उसके किए को अपने मिथ्याचारण से ढक देने की प्रवृत्ति तो जोरों पर है। इसीलिए, तो कहते हैं -

गुन्नी रहिहैं थुन्नी प, फुहरो बड़ेरी पर। 

अपनी विपन्नता को भी परिहास में कहने की कला है - अईसन नेउरा धनिक बा कि बसिया ध के खाई? इसी तरह, गुणों को ग्रहण करने की कमी की बात आती है तो कहते हैं-

सोना दहाइल जाय, कोइला प छापा परे। 

आज भी ढेरों कहावतें भोजपुरी और अन्य भाषा-बोलियों में प्रचलित हैं, जिनका कहीं लिखित साहित्य नहीं है, पर ये जीवित ही हैं, अपनी प्रामाणिकता के कारण। बड़ी से बड़ी बात को जरा-सी पंक्ति में कह देने की कला ने मुझे हमेशा हैरत में डाला। इन कहावतों को सच होता देख हमेशा विस्मित होती रही हूं। गर्वित होती रही हूं कि क्या कमाल के लोग थे हमारे पुरखे और हम उनकी संतान हैं।

ऋतु चक्र और उसके अनुमान, फलादेश से शुरू हुई थी बात। ...तो कुंडलियां छन्द की तरह पुनः उसी पर लेख पूरा करती हूं, क्योंकि सारी कहावतें एक बार में तो लिखीं भी नही जा सकतीं हैं। ना कही जा सकती हैं।

लौटकर एक बार फिर मौसम पर आते हैं- 

लगे अगस्त, फूले बन कासा।
अब छोड़ो बरखा की आसा।।


अगस्त नक्षत्र का तो नही पता, पर कास के खिलने पर बरखा नही होती है। ऐसा देखती आ रही हूं एक उम्र से। कास के खिलने का मास है कार्तिक। यानी अक्तूबर। आपके आसपास हो कास तो उनके खिलने पर ध्यान दें। आप पाएंगे कि उसके बाद बरखा नही होती।

प्रकृति के इन संकेतों को संस्कृत साहित्य में खूब लिखा गया है। कालिदास के साहित्य में आते हैं - 'कास' कई रूपों में। कभी 'कास पुष्प को तिरस्कृत करते हुए श्वेत धवल केशों के रूप में', तो कभी नायक की निराशा में कि - 'आह अब तो कास भी फूल गए, अब कहां आएंगे जल भरे बादल!'

इस अक्तूबर इस कहावत को चरितार्थ होते देखिए! ...और कहावतों के आलोक में एक बार देखिए तो जीवन को। आश्चर्य से भर जाएंगे। विस्मित होंगे आप भी!