दीवाली सचमुच घर लौटने का त्योहार है। महानगरों के छोटे-छोटे दड़बों में बड़े आधुनिक बच्चे-बच्चियां भी इस समय दौड़ पड़ते हैं। जिसे देखो, जैसे दौड़ा चला जा रहा है घर की तरफ। किसी तरह बस पहुंच जाएं उस आंचल की छांव में और ले आएं शक्ति सालभर की धूप में झुलसने की। ऐसा त्योहार जो दिलों के बीच की दूरी कम कर दे, घर के करीब लेकर आए, उसकी तो नज़र उतारिए, बलैयां लीजिए कि बना रहे यह त्योहार और घर की तरफ लौटते रहें हम...
इन दिनों सोशल मीडिया पर कंवलजीत का एक विज्ञापन आ रहा है। इस विज्ञापन की एक पंक्ति कि दीवाली क्यों मनाई जाती है, क्योंकि कोई बच्चा बहुत बरस बाद घर लौटा था। श्री राम, सीता और लखन बहुत बरस बाद घर लौट थे। कैसा पल रहा होगा और कैसा दृश्य कि चौदह बरस तक पथराई आंखों से अयोध्या का रोम-रोम प्रतीक्षा करता रहा और जब लौटे तो मनाई दीवाली।
दीवाली सचमुच घर लौटने का त्योहार है। लक्ष्मी पूजा, और अन्य परंपराएं तो हमारे उत्सव-प्रेमी लोक ने रच ली होंगी। घर है तो लक्ष्मी है, धनतेरस है, केवल बड़े-बड़े मकानों, अट्टालिकाओं के वैभव में धनतेरस नहीं होती। वो तो सबके मिल बैठने से होती है। रिश्ते ही असल धन है, उनके बीच का प्रेम ही असल रूप, उनके बीच का प्रगाढ़ बंधन ही आरोग्य है, सौभाग्य है, घर में बहू-बेटे हैं, सुस्वादु पकवान, उपहार, शृंगार है तो रूप चौदस है, घर सजाने की दौड़धूप ही असल रूप है। घर में संतान है, उसकी किलकारी है तो वहीं, रोशनी और आतिशबाज़ी है। भाई-बहनों की नोक-झोंक है तो फुलझडियां हैं। अपने तप और पुरुषार्थ से अर्जित धन है, चरित्र है, जो दीपक की तरफ प्रकाशवान है। यही तो दीवाली है, जो खींच लाती है दूर परदेस में बैठे किसी अपने को।
इसके पहले ही होने लगते हैं जतन जाने के, कितने दिन की छुट्टी मिली है - पूछते हैं माता-पिता, मन मार लेते हैं, जाना ही तो पड़ता है घर से सबको, लेकिन जाना ऐसा हो कि लौटकर आने को मन हुलसता रहे। दूरियां किलोमीटर में तो हों, लेकिन दिलों में नहीं, लगे कि बस जब चाहें तब लौटे चलें। ऐसा एक घर, ऐसी एक जगह सबके हिस्से आनी ही चाहिए, जहां जाया जा सके, जहां जाने के लिए कुछ सोचना न पड़े, जहां कोई आपकी प्रतीक्षा कर रहा हो। दीवाली सचमुच घर लौटने का त्योहार है। महानगरों के छोटे-छोटे दड़बों में बड़े आधुनिक बच्चे-बच्चियां भी इस समय दौड़ पड़ते हैं - अपने खुले-खुले आंगन वाले घर की ओर, जिसे देखो, जैसे दौड़ा चला जा रहा है घर की तरफ। रेलगाड़ी, गाड़ियां, बस, विमान सब भरे हुए हैं। कहीं जगह नहीं तो कोई और उपाय कर किसी तरह बस पहुंच जाएं उस आंचल की छांव में और ले आएं शक्ति सालभर की धूप में झुलसने की, दुनियादारी में उलझने की, जीवन की भागदौड़ में थमे रहने की। यह दौड़ती भीड़ परेशान नहीं करती, बल्कि सुखद लगती है। अच्छा लगता है कि अभी भी त्योहारों का उत्साह बाकी है, अभी भी घर आंगन की याद बाकी है, अभी भी अपनों का साथ बाकी है, यह जो बाकी है, वह बचा रहे, यह भीड़ दौड़ती रहे अपने घर जाने को।
"जो घर होंगें तो बची रहेगी खुशियां,
ईंट पत्थर के मकानों में रौनक नहीं होती"
दीवाली वह नरम मुलायम छांव है, मां का आंचल है, जिसे सिर पर अनुभव करने को हर मन तरसता है। श्री राम वन से वापस आए, यही सबसे सुंदर कारण है, पुरुषार्थ की यात्रा में भले कितनी दूर निकल जाए, पर लौटता रहे हर बच्चा अपने घर, कोई अपने घर वापस आए, इससे बड़ा कोई और क्या कारण हो सकता है उत्सव का।
एक विज्ञापन और आता था, सियाराम शूटिंग शॉर्टिंग का, कमिंग होम टू सियाराम, उसमें भी यही भावना थी, लौटने की ही तो प्रतीक्षा है। सीमा पर बैठा जवान भी घर लौटने की सोचता है, उसका भी उसी तरह इंतज़ार होता है, जैसा किसी और बेटे का, वह कभी लौटता है। कभी ...काश हर सैनिक अपने घर दीवाली मना सके! क्या हम ऐसी दुनिया नहीं बना सकते, जहां हर सैनिक अपनों के पास लौटता रहे, बार-बार, हर बार उसके लौट आने की आश्वस्ति हो। काश कि ऐसा हो कि हर इंसान अपने घर लौटकर आता रहे, काश ऐसा हो कि सबके पास लौटने के लिए एक घर हो, उस घर में उसका इंतज़ार करते अपने हों।
जब कोई कहता है कि क्या देखा आपने कि श्री राम लौटे थे इस दिन, श्री राम हुए भी थे या नहीं; इसका भी प्रमाण मांगते हैं कुछ शुष्क हृदय मस्तिष्क! उनसे सिर्फ इतना कहना है, श्री राम के लौटने पर दीवाली जैसे त्योहार के मनाने के पीछे जिसकी सोच रही होगी, वह कोई कोमल हृदय का स्वामी रहा होगा। उसकी दूरदर्शिता को प्रणाम कीजिए कि उसने घर लौटने के उत्सव की कल्पना की, वह राजा राम के लौटने का उत्सव नहीं था, वह एक पुत्र के लौटने का उत्सव था, जो हर मां मनाती है, और श्री राम तो सबके हैं, तो कोई क्यों न मनाए इस उत्सव को। इस दिन सबके बेटे-बेटियां भी तो लौटते हैं अपने घर। उसे पता चल गया होगा कि ऐसा भी युग आएगा जब मनुष्य तो बहुत होंगें, पर संबंध कम; सुविधाएं तो बहुत होंगी, पर समय कम; बुद्धि तो बहुत होगी किंतु भाव कम; धन तो बहुत होगा लेकिन मन कम; तो रच दी गई त्योहारों की परंपरा और उसे परिवार, समाज, जमीन से कुछ इस तरह जोड़ दिया गया कि चाहे जैसा भी मन हो, इस दिन उत्साह से भर जाए। चाहे जैसी बुद्धि हो, थोड़ी भाव से भर जाए और लगा ले दौड़ उस तरफ जहां उसकी नाल गड़ी है। दौड़ पड़े अपनी जड़ों से, अपनों से मिलने के लिए।
सचमुच दीवाली घर वापसी का त्योहार है, दिवाली अपनों के पास लौटने का बहाना है, दीवाली खुद अपने आप से मिलने का अवसर है, दीवाली केवल दीपोत्सव नहीं, दीवाली मन का उत्सव है। बाहर दीप जलाने के जतन में हम सबके भीतर न जाने कितने दीप जल उठते हैं, न जाने कितनी रोशनी फैलने लगती है। बाहर रंगोली सजाने के क्रम में भीतर कितने रंग बिखरते जाते हैं, बाहरी शृंगार के जतन में भीतर कितना सुंदर हो जाता है। पकवानों की महक से घर और गलियां ही नहीं, हमारी आत्मा भी महक उठती है। घर लौटते बच्चों के लिए बनने वाले पकवानों में अलग-सी मिठास होती है। कदाचित उस मिठास में प्रेम की शक्कर के साथ प्रतीक्षा की इलायची की सुगंध भी समा जाती है। प्रतीक्षा मिष्ठान में पड़ने वाली इलायची है, जिसकी महक से महक उठता है परिवेश और संबंध। पूरी दुनिया में दीप को पूजने के ऐसे अनूठे त्योहार का कोई इतिहास नहीं मिलता। एक ऐसा त्योहार, जो सात समंदर पार होने पर भी मन को घर की तरफ मोड़ देता है।
यह त्योहार अब तो पूरी दुनिया में मनाया जाता है। भारत के बाहर अपने घर को ढूंढने वाले इस त्योहार में थोड़ा-सा अपने घर के करीब आ जाते हैं, दूरियां थोड़ी-सी कम हो जाती हैं। ...तो अब जब भी निकलें बाहर और ट्रैफिक की समस्या हो, भीड़ हो तो थोड़ा ठहरकर देखिएगा कि इसमें से कोई है जो घर लौट रहा है, कोई है जो अपनों के लिए खरीदारी कर रहा है, कोई है जो परिवार के लिए सपने बन रहा है। किसी की आंखों में नया ड्राइंगरूम, नए पर्दे दमक रहे हैं, तो किसी की आंखों में सजावट के सामान से रोशनी से भरा घर दमक रहा है। किसी को अपने बच्चे नए कपड़ों में सजे हुए दिख रहे हैं, तो किसी सड़क पर सामान बेचने वाले मजदूर और कलाकार को खूब खरीदी हो जाने पर अपने सपने पूरे हो जाने की आश्वस्ति दिखाई दे रही है। रोगी और पीड़ित तक इस समय अपनी पीड़ा भूल जाते हैं।
इस तरह देखेंगे तो आपके चेहरे पर एक मुस्कान दौड़ जाएगी और उत्साह दोगुना हो जाएगा। वर्ष भर भले रोते रहें, कलपते रहें, समाज दुनिया के बिगड़ते हालात पर अपनी बौद्धिक जुगाली करते रहें, लेकिन इस त्योहार पर इन सबसे परे केवल खुश हो जाइए। अपने लिए न हो सकें तो दूसरों के लिए हो जाइए। अर्थ भी पुरुषार्थ है और भौतिक समृद्धि भी एक वरदान है। इससे ऊर्जा उत्साह लेकर फिर करें वर्ष भर सरोकार की बात, लेकिन त्योहार पर तनिक अपनी बुद्धि को डपट दीजिए कि यह खुश होने का मौसम है, तुम्हें अनुमति नहीं है कि इस पर नज़र लगाओ, सालभर तुम्हारा, लेकिन यह त्योहार उत्सव हमारे। ऐसा त्योहार जो दिलों के बीच की दूरी कम करे, घर के करीब लेकर आए उस त्योहार की तो नज़र उतारिए, बलैयां लीजिए कि बना रहे यह त्योहार और घर की तरफ लौटते रहें हम।
...तो गाएं गीत आओ रघुराई घर अपने, घर लौटते अपने और अपनों के साथ लौटती खुशियां।
शुभ दीपावली...