विस्तार
पूरा घर रज-गज हुआ है। जहां देखो वहां लईका-लईकी, पहुना-पहुनी हंस-बोल रहे हैं। दुआर पर पहुना लोग और गांव-जवार की मजलिस बैठी है, हंसी-ठट्टा हो रहा है। अंगना में पहुनी लोगों की गारी, गीत-गवनई चल रही है। अंगना, ओसारा, दलान में जगह बनाकर माटी का राम गिलास, हंड़िया-पतुकी, कोसा, परई रखे हैं। वहीं, पुरइन के पत्तों का ढेर लगा है। कूदते-फांदते बच्चे कहीं माटी का सामान न तोड़ दें; इसीलिए, उन्हें दुआर की ओर हांका जा रहा है।
लोकगीतों की जुगलबंदी
दूसरे आंगन में ईया गांव की औरतों के साथ ‘कसार’ की तैयारी में लगी हैं। बोरी का अरवा भूजा तिरपाल पर गिरा के दू जनीं लगी हुई हैं उसे चलनी से चालने में कि घोनसार (भड़भूज) से आया भूजा में बालू की करक न रहे। चलनी से चाल कर वे लोग वहीं तिरपाल पर ही एक ठयीं रख रहीं हैं। वहीं से उठाकर दू जनी भूजा (मुरमुरा) को सूपा से फटक रहीं हैं कि रही-सही बालू निकल जाए भूजा से। वे भूजा को फटक कर अपने पास रखे बांस के नए दउरा में रख रहीं हैं।
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दउरा से मूंज की बीनी नई दउरी में उठाकर सुकीया की माई जांत पर बैठी दूलम बौ और तल्ली बौ को दे रही हैं। वे दोनों जांता के दोनों ओर गोड़ पसार के भुईयां में बैठकर जांता चला रही हैं और भूजा पीस रही हैं। उन दोनों ने ही अंचरा से अपना मुंह तोप (ढक) लिया है। साथ ही, वे दोनों भी सब लोग के साथ बियाह का गीत-मांगर गा रही हैं। ईया भी साथ में गा रही हैं। बीच-बीच में ईया अपने मचिया से उठ-बइठ के बताती रहती हैं। कभी जांता का खूंटा ऊपर करके कहती हैं कि भूजा को एकदम ‘पिसान’ नहीं कर देना, कसार के लिए दर्रे (दरदरा) रहता है। ..तो कभी चलनी और सूपा में भूजा को खूब दबा के मिसवा (रगड़) रही हैं कि भूजा का राखी, बालू निकल जाए, मुंह में कर-कर न करे। ..तो कभी कोई नया गीत बता रही है। ईया और सब औरतें एक साथ राग में राग मिला के गीत गाते हुए चलनी, सूप, जांता चला रही हैं। कसार बांधने की तैयारी हो रही है। ये उसका पहला चरण है।
हर जग-परोजन में कसार
पश्चिमी चंपारण बिहार के एक गांव में यह ‘जग’ (यज्ञ) का घर है। हर जग-परोजन में कसार तो बनता ही है। जग-परोजन का मतलब यज्ञ-प्रयोजन। विवाह भी एक यज्ञ है और कसार उसका आर्वाचीन मान्य प्रसाद! ये हमेशा से एक ही तरह का, एक जैसा ही बनता है। बिहार में विवाह, यानी बात-बात पर कोई रस्म! हर रस्म पर कोई खास पकवान, मिष्ठान्न! ..और कसार उनमे से एक खास मिष्ठान्न है। वैसे आधुनिकता और समय, सहूलियत के अभाव में अब शादियों में बहुत-सी परंपरा, रीति-रिवाज खत्म से हो गए हैं, वहीं कुछ बातें आज भी बिना किसी फेरबदल के अपने पारंपरिक बनावट, बुनावट के साथ आज भी पूरे ठसक के साथ हैं।
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इन पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वाह अभी भी उसी तरीके से होता है, जैसे पहले किया जाता रहा है। कसार उनमें से एक है।
गीत-मांगर के साथ संझा–पराती
आईं ना ए.. बाबा बईठी मोरे अंगना,
देबो सतरंगिया बिछाय
रउए भरोसे हम जग एक ठानीले,
जगवा में होखीं ना सहाय
आईं न ए इसरल-बिसरल बईठी मोरे अंगना,
देबो सतरंगिया बिछाय
रउवे भरोसे हम जग एक ठानीले,
जगवा में होखीं ना सहाय
लगन होने यानी सगुन उठने के बाद, इस तरह के गीत-मांगर के साथ संझा–पराती गाते दिन बीतते जाते हैं। इन सब गीतों में देवी-देवताओं के स्तवन के साथ अपने पितरों, पुरखों को गीतों में नाम रख-रख के याद किया जाता है। जो विस्मृत हो गए हैं उनको ‘इसरल-बिसरल’ कह के याद किया जाता है, उनसे गुहार लगाईं जाती है कि वे आएं और इस यज्ञ में अपना आशीर्वाद देकर सहयोग करें। उन्हें गीत गाकर गोहराया, मनाया जाता है। ‘पितर नेवतौनी’ उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है। कसार हमारे पितरों का भोग है!
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अंगना में, अपने उमिर, देह के हिसाब से पीढ़ई, मचिया लेकर तीन गोल पहुनी लोग बैठी हैं। उनके बीच में बांस का नया दउरा में भूजा का मोटा दर्रा पिसान रखा है। पीसी हुई चीनी, पिघलाया हुआ मिट्ठा, बूकल गोल मरीच, भूजल करिया तिल और गरी-छोहारा डालकर बुक्का (बुका हुआ यानी बारीक कूटा हुआ) में मिलाया जा रहा है। छोटकी फुआ घूम-घूम के सब दउरा में घीव डाल रही हैं। पूरा अंगना घीव और बुक्का की सोंधी, मीठी महक से गम-गम गमक रहा है।
सब पहुनी लोग बियाह-सादी का गीत गाते हुए कसार बांध रही हैं। बगल में रखे खाली दउरा में गोल-गोल गेंदा के जैसे कसार बनाकर रखा जा रहा है। चीनी वाला कसार खूब उज्जर है, मिट्ठा वाला तनियक झांवर है। ‘पितर नेवतौनी’ के बाद बेटी बहिन की बिदाई और गांव घर में बायन बांटने के लिए भी बंधना है तो बारी-बारी से गोल उठ बईठ के कसार बांध (बना) रहा है। इसे लड्डू जैसे ही हाथ से गोल-गोल बनाते हैं।
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पितरों को न्योता
गोल का गीत-मंगर अब गारी पर उतर गया है, अब ‘समधी साले’, जगइतिन, (जिसके घर विवाह है) ननद, भौजाई, देवर, जीजा पर गारी गीत चरम पर है। ईया अपनी रक्सौल वाली ननद के मुंह फाड़ के हंसने से परेशान हैं। “हे दीदीजी, हेतना खेखरई से कसार बन्हाला कहीं? पितर के तरे नेवताई? हे, अपना मुंह पर अंचरा धरीं।” मगर, तभी बड़की फुआ ने कोई भीखम (भीषण, भारी) गीत कढ़ा (शुरू) दिया है। रक्सौल वाली फुआ ईया समेत तीन जनी कसार लिए-दिए पीछे उलट गई हैं अपनी मचिया से, हँस-हँस के।
ईया को गीत सुन के हँसी भी आ रही है और काम में हर्जा पर गुस्सा भी आ रहा है। देवकूरी (कुल देवता का स्थान) में कई दउरा कसार बांध कर रखा गया है।
जैसा कि होता ही है कि हर बात पर गीत, तो गीत गाते हुए आज भोरे-भोरे जगईतिन ने कुटुम की महिलाओं के साथ साड़ी, मरदानी, चिउरा, कसार चढ़ा के पितरों को न्योता दिया है। अब सब सुहागिनों को सेनुर लगाने का काम दो चाचियां कर रही हैं। अम्मा और बड़की माई सबके अंचरा में चिउरा-कसार दे रही हैं। सब पहुनी लोग देवकूरी में जा के मूड़ी पटक के, गोड़ लाग के आती जा रहीं हैं और दुआरी पर अंचरा में कसार, चिउरा लेकर नाक से सेनुर लगवा के निकलती जा रही हैं। गीत-मांगर समवेत रूप से जारी है।
जो ऐसे परिवेश से हैं, जिन्होंने ऐसी शादियों में बचपन बिताया है या कहें कि जो दिल से बिहारी हैं, पुरबिया हैं - उन सभी को कसार अच्छा लगता है। क्या स्त्री, क्या पुरुष सभी को!
घी और भुने पिसे चावल के आटे का ये लड्डू काफी दिनों तक खराब नहीं होता। शायद इसीलिए, इसे बेटी-बहिन, पहुनी लोग को बिदाई में दिया जाता है। यूं देखा जाए तो अब बहुत-सी मिठाइयों की उपलब्धता है। बिदाई में उन्हें भी साथ में दिया भी जाता है। कसार को शुभ माना जाता है। इसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। ब्याह-सादी और छठ में कसार बंधता ही बंधता है।
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कुथौनी का कसार
भोजन, रस पगे अन्न के विकासक्रम में कसार पहला मिष्ठान्न होगा। मिष्ठान्न यानी मीठा अन्न! ज्यादा दिनों तक खराब न होने वाले गुण ने ही इसे जग-परोजन में अनिवार्य बनाया होगा।
हमारे कृषि प्रधान देस में मवेशी भी हर घर में अनिवार्य रूप से थे, तो घी और अन्न के संयोग से बना यही पहला मिष्ठान्न रहा होगा, जो सहज, सरल, सस्ता और टिकाऊ था।
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बहू के द्विरागमन पर मायके उसके साथ आता है -‘कुथौनी का कसार!’ ये गिनती के बस पांच बड़े कद्दू जैसे कसार होते हैं। सास इनको समधियाने से आई नई साड़ी पहन के उसके अंचरा पर रख के फोड़ती है। इसको हाथ से ही फोड़ना होता है। फूटने के बाद इसके भीतर से सिक्के और पर्ची पे लिखी गालियां भी उछल-उछल के बाहर आती हैं। जो समधी-समधन के लिए होती हैं।
कुथौनी के कसार को बांधना और फोड़ना दोनों ही में कौशल की जरूरत होती है। दोनों ही में मुंह से ऊंह-आंह निकल ही जाती है, यानी व्यक्ति कूंथ के ही बनाता, फोड़ता है। इसीलिए, इसको कुथौनी का कसार कहा जाता है।
कसार अभी भी रसीली, सुस्वादु, बेशकीमती मिठाइयों के बीच अपनी गंवई ठसक से उपस्थित रहता है। ...और क्या खूब ठसक है इसकी!