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GRAMYUG : अभी बीता नहीं है आम का मौसम; जिह्वा और मन में रस घोलने को तैयार है भदेयां आम

स्मिता वाजपेयी, कवयित्री एवं लेखिका, नरकटियागंज (बिहार) Published by: Umashankar Mishra Updated Wed, 11 Sep 2024 01:13 PM IST
सार

बाजार ने कई सालों से अघोषित घोषणा की हुई है कि सावन के साथ ही आम का मौसम भी चला जाता है। पर, रुकिये! ठहरिए जरा! आम है अभी भी बगीचे में। पेड़ों पर। भादो वाली भी किस्में, जिन्हें भदेयां कहते हैं। 

कायदे से जेठ, बैसाख, आषाढ़, सावन, भादो आम के दिन हैं।
कायदे से जेठ, बैसाख, आषाढ़, सावन, भादो आम के दिन हैं। - फोटो : गांव जंक्शन

विस्तार

सभी फलों का राजा आम, 
मीठा मीठा ताजा आम। 

दूसरी जमात में यह कविता हम झूम-झूम कर पढ़ते थे। जब भी आम खाते या आम को देखते, तो हम सारे भाई-बहन इस कविता को सुर में गाने लगते। बचपन में हम उमस और गर्मी से बेचैन हुए हों; यह तो उतना याद नहीं आता, पर गर्मी की छुट्टियां और आम का आनंद कभी बिसरता नहीं है। अब अगर अपने बचपन में जाकर सोचूं, समझूं; तो ये ‘आम दिन हैं!’ जी! बिल्कुल ये आम दिन ही हैं, और अभी भी हैं, जब सावन बीत चुका है। बरसते सावन में हमारे ‘आम दिन’ होते थे। बाहर दुआर पर, खेत, खरिहान, बगईचा और भीतर अंगना, छत, खपरैल पर सावन बरसता था। उस सावनी जलधार के साथ संगत मिलाते हुए प्यासी धरती की तरह हमारे कंठ भी आम के रसधार से तृप्त होते थे। वे भी क्या दिन थे!

जब ओसारा के एक कोने में बाल्टी भर आम लेकर बैठते थे हम। “कम खाना! सबको बरसाती फोड़ा निकल रहा है आम खाने से!” घर का कोई बड़ा चिल्लाता हम पर। लेकिन, नाक की बुर्ज पर निकले घाव से बेपरवाह नाक डुबा-डुबा कर, कोहनी तक बहते रस के साथ आम खाना कितना अच्छा लगता था! आज सोचती हूं कि हमारी उस आप्यायित ‘रस दशा’ पर ही ये काव्य पंक्ति सटीक बैठती है - ‘यदि स्वर्ग है तो यहीं है!’ हम नाक, कान, मुंह, गला, कोहनी भर हाथ, आम रस से डूबे हुए बिना डकार वाले मनुष्य रूपेण शूकर योनि के बाल वृन्द जब आम खा लेते, तो आंगन के चापाकल तक जाने की ताकत नही रहती थी। 

भूखे भीम चला ना जाय, 
खाए भीम गए पटाय।।

गांव में आम का मौसम उत्सव से कम नहीं होता। बच्चे तो आम के बगीचे में पहुंचने का मौका खोजते रहते हैं।
गांव में आम का मौसम उत्सव से कम नहीं होता। बच्चे तो आम के बगीचे में पहुंचने का मौका खोजते रहते हैं। - फोटो : दुर्गादत्त पांडेय
बस हम वहीं के वहीं ओरी से बहते पानी में 
हाथ धो लेते। ढ़ाई-तीन बरस के नंगू-मंगू भाईयों को उसी पानी से नहला भी देते थे। ये नन्हे सूअर अपने पेट और दूसरे की पीठ में भी आम लीप देते थे। यह इसी तरह का प्रशिक्षण था सबका। इन्हें आपे-आपे (खुद से ही) आम खाने का बहुत शौक था। यह सब अराजक लग रहा है ना! मगर तब बरसते सावन में आम के छिलकों, गुठलियों से पैर फिसला कर मुंह हाथ फोड़ने का सुख आज मिल रहा है। याद करके। हम आम खा चुकने के बाद इसकी गुठली एक दूसरे के सर पर घुमाकर अपनी चुटकी से फिसलाते थे। गुठली जिधर गिरेगी, उसी दिशा में ही भाई या बहन की शादी होगी। वैसे इसका सत्यापन आज तक नहीं हुआ। पर, इस खेल में हमें बहुत मजा आता था। यह खेल भी बचपन के साथ बीत गया। बीत तो अब आम का मौसम भी गया। आप यही सोच रहे हैं ना। तो रुकिए जरा। ठहर कर सोचिए, तो क्या सचमुच आम का मौसम बीत गया? नहीं, बिल्कुल नहीं! आपकी शहरी रिहाइश, जड़ों से कटने से, सिमटने के कारण ही आपकी स्मृति कमजोर हुई है।

ये आम दिन हैं!
और यह पूरे भादो तक आम दिन ही होते हैं। गांव में आज भी देर से पकने वाले आम को भदेयां कहते हैं। खास उस आम की किस्म का नाम नहीं लेते। एक धान भी है, जो भादो में कटता है, तो उसको भी भदेयां कहते हैं। भादो यानी आधा अगस्त आधा सितंबर। हिंदी के महीनों को याद करेंगे, तो सब स्पष्ट हो जाएगा। कायदे से जेठ, बैसाख, आषाढ़, सावन, भादो आम के दिन हैं। इनमें आप चईत को छोड़ नहीं सकते, क्योंकि भले पेड़ों में अमिया, टिकोरा ही लगा हुआ हो, पर आम का रस तो तभी से आने लगता है रसना में। यह ‘सतुआन’ में सबसे पहले चटनी के रूप में आता है। इस तरह, आम के रसानंद का श्रीगणेश होता है। फिर दाल में, तरकारी में और जब आम में गुठली पड़ जाए, तो एक पूरा महीना ही आम का हो जाता है। यह महीना होता है जेठ। वही जेठ, जिसकी दुपहरिया में ‘छाहों मांगे छांह!’ 

आम को पेड़ से नीचे लाने का उत्सव   
कायदे से फिर जेठ के तीसरे हफ्ते से आम पकना शुरू होते हैं। प्रकृति का नियम भी यही है। मगर नियम में रह जाए वह फिर मानुस जात न हो जाए? बस, उधर पेड़ से कोई आम टपका जर्द पीला होकर कि तितली, भंवरे की तरह मंडराते बच्चे कुकुर, शूकर की तरह दौड़ पड़ेंगे। मार-कुटाई के कुकुर झौं-झौं के बाद उस हल्के पके आम के जरा-जरा हिस्से सबको मिलेंगे। रसना की लार ग्रंथि इतनी सक्रिय होगी कि बच्चों की सेना रोती-नकियाती बड़ों से जिद करेगी आम तोड़ने की। और अंततः बहुत शान से सुंदर, सलोना, सुगंधित जर्दा आम को पेड़ से नीचे लाने का उत्सव प्रारंभ होगा। दो-तीन आदमी पेड़ पर लकसी लेकर चढ़ेंगे आम तोड़ने के लिए। नीचे पांच-छः व्यक्ति तिरपाल को चारों ओर से पकड़े हुए खड़े होंगे। आम टूट-टूट कर उस पाल में गिरेंगे। चोटाया आम बढ़िया नहीं पकता है। चोट लगी हुई जगह सख्त हो जाती है और खाने का मजा जाता रहता है। घर में एक कमरा या दालान जूट की बोरी पर गेहूं का भूसा बिछाए आम के स्वागत की तैयारी में रहता है। यहीं पूरे भूसे पर जर्दा आम आदर, सम्मान के साथ बिराजेंगे। आम पकाने के लिए जूट की बोरी से तीन दिन ढक के उसके आराम फरमाने का बिधान है। 
आम
आम - फोटो : गांव जंक्शन
'अचार बिचार से बने ला' 
तपते जेठ में बनता है आम का अचार, जिसे बनाने के लिये आपका आचार मायने रखता है। भोजपुरी में कहावत है - अचार बिचार से बने ला।  यानी बहुत सतर्कता, बहुत नियम से। कब किस अचार को कितना मसाला, कितनी धूप, कितने दिन छांह में रखना है। किस आम से कौन-सा अचार बनेगा, इस सबका ध्यान रखना होता है। जैसे बड़े टुकड़ों वाले पारंपरिक अचार ‘सुकुल’ आम से बनेगा। यह आम अचार के लिए सर्वश्रेष्ठ है। बहुत रेशेदार होना इसकी श्रेष्ठता है। दूसरे गूदेदार आम, उनकी कोई भी किस्म हो, आम आवाम की तरह ही बरते जाते हैं। जैसे - आंधी, पवन झकोरों से गिरे, पड़े, टूटे, चोटाए आम का कुच्चा, थूर्रा, चटनी, पिड़िया बना दिया जाता है। जी बहलाने को, जिसे भोजपुरी में हिरीस मिटाना कहते हैं, एक तुरत-फुरत वाली खट्मिट्ठी भी बना दी जाती है। खाया-पिया चट किया की तर्ज पर। लेकिन, सालों-साल चलने वाली खट्मिट्ठी के लिए फिर से वही - सुकुल ही मान्य है। आधा जेठ खटिया या चौकी पर आम की खटाई सूखाते, बनाते, अचार बनाते, अचार के मसाले भूनते, पीसते, उसकी मिर्च से जलती चमड़ी को जेठ की धूप में और भी जलाते बीतता है। 

पीला और हल्की गुलाबी रंगत वाला 'जर्दा' 
जर्दा आम इतना मीठा आम है कि यह कच्चे में भी हल्का मीठा ही लगता है। वैसे अल्फांसो, दशहरी, लंगड़ा आम बहुत अच्छे आमों के रूप में अखबारों, किताबों में जगह बनाकर बैठे हैं। इनमें जर्दा आम का जिक्र कम ही मिलता है। ऐसा बिहार के लोगों के आलस के कारण है। हमारा जर्दा आम, जो भागलपुर में जर्दालु और गोरखपुर में गौरिया नाम से जाना जा रहा है, खा लें, दावा है कि वो चाहे किसी भी उमर का हो, वो भी जर्दा के लिए मनुष्यरूपेण कुछ खास योनियों में ना चला जाय तो कहना। जर्दा सबसे पहले पकता है। यह बेहद मीठा, सुगंधित और रसीला आम है। इतना सुंदर कि पकने के बाद कहीं से भी हरा नही दिखता। पीला और हल्की गुलाबी रंगत लिए जर्दा बेहद खास आम है।

राजा पद का इकला दावेदार 'डंका'
जर्दा के बाद बारी आती है सबुजा की। यह पकने पर भी हरा सब्ज ही रहता है, शायद इसीलिए देसज में ‘सबुजा’ हो गया। छिलका मोटा, गूदा लाल; और स्वाद में जर्दा से भी ज्यादा मीठा। डंका! यह इन दोनों के बाद आता है। ये सारे बिहारी नाम हैं आमों के। छिलका, गुठली पतली। गूदा ही गूदा! रस ही रस! डंके की चोट पर यह अपने रूपाकृति, रस, रंग, गंध, स्वाद से राजा आम है! यह जर्दा और सबुजा से आकार में बड़ा है और हर तरह से आम गुण में इतना श्रेष्ठ कि राजा पद का अकेला दावेदार है। डंका का समय जाते-जाते सावन आ जाता है। अब कायदे से कुछ द्वितीय श्रेणी के आमों की बारी आती है। इनमें दलमा, चौसा , चौरिया, सीपिया, सेनूरी, लटकम्पू, गुलाब खास, टयरिया, बिज्जू आते हैं। इनका मुकाबला डंका, सबुजा, जर्दा से नही हो सकता। पर, आम तो आम है। वह हमेशा खास रहेगा। उसकी तुलना किसी भी अन्य फल या मिठाई से नही हो सकती - असंभव!
गरमी में बच्चों की लंबी छुट्टियां गांव में आम के बगीचे में गुजरती हैं।
गरमी में बच्चों की लंबी छुट्टियां गांव में आम के बगीचे में गुजरती हैं। - फोटो : स्टॉक
टयरिया की तरकारी और भात 
अब लोग आधे सावन तक आम खा-खा कर अघा गए रहेंगे। अब टयरिया (बेहद छोटा, लट्टू जैसा गोल-गोल आम) जैसे आम की तरकारी बननी शुरु हो जाएगी। आम दरबार के घोर चारण लोग आम की तरी वाली तरकारी भात को सरपोट-सरपोट के खाएंगे। लार चुआते हुए वाह-वाह कहेंगे। कहना ही पड़ेगा। अब आम तो आम है भई। जिन्होंने कच्ची मिट्टी के आंगन में लगातार बरसते पानी को देखते हुए, माटी के ओसारा में पिढ़ई पर बैठकर आम की तरकारी और भात खाया है, वे ही इस अलौकिक रसानंद को पढ़कर महसूस कर सकते हैं।

भदेयां और भदई का मौसम 
अब आया भादो। आम के कई किस्मों की खेप बाजार से भी बीत चुकी है। बाजार ने कई सालों से अघोषित घोषणा की हुई है कि सावन के साथ ही आम का मौसम भी चला जाता है। पर, रुकिये! ठहरिए जरा! आम है अभी भी बगीचे में। पेड़ों पर। भादो वाली भी आम की किस्में हैं। उनमें से एक है -स्वर्णरेखा आम। यह टिकोरा निकलने के साथ ही हल्का गुलाबी, पीली रंगत लिए रहता है। गुठली आ जाने पर ज्यादातर पीला दिखता है, जिससे ये भ्रम हो जाय कि अब इसे तोड़ लिया जाना चाहिए। पर, इसके तोड़ने, पकने का समय भादो है। गांव-गिरांव में इसे भदेयां ही कहते हैं। वैसे ही जैसे भादो वाले धान को भदईं कहते हैं। 

स्वर्णरेखा आम की विशेषता है इसकी पान जैसी सुगंध। मात्र बीस आम से पूरा हाॅल पान की ताजा खुशबू से सराबोर हो जाता है। देखने में इतना सुडौल और नोकदार है कि बचपन की ड्राॅइंग में आम बनाना याद आ जाय। रूप पूरी तरह पीला कंचन! रस इतना कि खाते हुए नीचे प्लेट लगाकर खाना होता है। और हां, इसकी विशेषता है कि इसे शहरी और कथित सभ्य ढंग से नही खा सकते। रस कोहनी तक जाएगा ही। गुठली चूसने के बाद प्लेट उठाकर रस सुड़ुप-सुड़ुप कर पी लीजिए। पेट पर हाथ फेरते हुए भादो की बरखा का आनंद लीजिए। ईश्वर को इस रसात्मक जिह्वानंद, आत्मानंद का आभार दीजिए। और...जानिए कि आम का मौसम अभी बीता नही है।