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Dussehra 2024 We Used To Roam Around The Dussehra Fair Sitting On The Shoulders Of Kaka Babu
Dussehra: जब काका या बाबू के कंधों पर बैठ घूमते थे दशहरा मेला, हिंड़लवा और चकरी झूला के साथ आज भी झूमता है मन
स्मिता वाजपेयी, नरकटियागंज (बिहार)
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sat, 12 Oct 2024 02:06 PM IST
सार
दशहरा मेला (Dussehra Mela) बहुत दूर-दूर तक लगा होता और भीड़ इतनी होती कि चलने से धूल उड़ती। बंदर-भालू वाला डमरू बजाता तो तमाशा देखने के लिए बाबू, चाचा, काका, भाई का कंधा ही होता था। हम सारे सजे-धजे बच्चे होते थे, अपना स्कूल वाला जूता-मोजा पहनकर तैयार हो जाते। मां हमारे दो पोनीटेल करके सफेद रिबन से बांध देती। गांव के कई बच्चे मोटा-मोटा काजर लगाकर और बालों में ढेर सारा तेल चपोड़कर, माथे के कोने में डिठौना लगाकर आते थे... दुआर पर ही ट्रैक्टर और टेलर होता, उसी पर सारा गांव रामनगर का मेला देखने जाता...
दशहरा मेला में जलेबी सभी को सबसे ज्यादा पसंद आती थी।
- फोटो : AI
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विस्तार
यह साल 2024 है। 12 अक्तूबर को हर जगह दशहरा मेला (Dussehra Mela) की रौनक है। पर, मन आज के भव्य पंडालों, माता-भवानी की मूर्ति देखते हुए दो तल पे खड़ा है। बहुत पीछे... कहीं 1970 और 80 के दशक में जाकर... जब पूरे साल दशहरा मेला (Dussehra Mela) का इंतजार रहता था।
हम नरकटियागंज में पढ़ते थे, पर किसी भी छुट्टी में अपने गांव बढ़निहार चले जाते थे। बढ़निहार से लगभग दस किलोमीटर दूर रामनगर का दशहरा मेला (Dussehra Mela) ही हमारा सबसे नजदीकी मेला (Mela) होता था। पांच शिखरों वाले पुराने शिव मंदिर के चारों ओर लगता था वह मेला। वहीं पर कहीं किसी पंडाल में माता दुर्गा भवानी की मूर्ति होती थी महिषासुर राक्षस को भाला (त्रिशूल) भोंकते हुए, भैंस का कटा हुआ सिर भुईया में गिरा होता था और कटी गर्दन से ‘लोहू’ (लहू) निकलता रहता। जिसे देखकर हम डर जाया करते, रोने लगते तो हमें बताया जाता कि यह सब तो झूठमूठ का खून है। कई बार हम माता भवानी के शेर से भी डर जाते। बहुत भीड़ होती थी। बहुत ज्यादा! हम माता भवानी की मूर्ति को काशी भाई, केदार भाई या खलीफा काका के कंधों पर चढ़कर देखते थे। हमारे साथ आए गांव के बच्चे भी अपने बाबू, काका के कंधे पर चढ़कर भवानी माई को हाथ जोड़ते थे। भीड़ में जब हम कंधे पर चढ़े-चढ़े पास आते तो माता भवानी को देखना छोड़कर आपस में हाथ मिलाने का खेल शुरू कर देते थे। इस खेल में नीचे हमें कंधे पर चढ़ाए लोगों का संतुलन बिगड़ता था और वह हमें धप्प से नीचे उतार देते थे-लमेट लयिका!!
फिर, कंधे पर चढ़े दूसरे बच्चे नीचे वालों को चिढ़ाते -'राजा बाड़ें कोठा पर, बिलइया बिया भुईंया ‘उम्र के हिसाब से इसकी प्रतिक्रिया रोने’ चिल्लाने या चुप खड़े होने में ही होती।
मेले में हिंड़ोलवा, चकरी झूला को देख मचल जाता मन
मेला बहुत दूर-दूर तक लगा होता और भीड़ इतनी होती कि चलने से धूल उड़ती रहती। सारी दुकानें तंबू, कनात में लगी होती। उनकी बांस बल्ली से भी लटक, झूम के मेला का मजा हो जाता। यूं तो मेले में हिंड़ोलवा, चकरी झूला भी होता पर उन पर चढ़ने के लिए हर एक के पास पैसा थोड़े ना होता था। सो तंबू कनात के बांस बल्ली से लटक लिया जाता।
मेले में खिलौने और चीजें तो बेशुमार होतीं। उन्हें हर बार ही हम पेट में गुदगुदी लिए देखते।
- फोटो : AI
बंदर-भालू वाले डमरू की आवाज से ठहर जाते कदम
पैदल चलते-चलते पैर दुख जाते तो छोटे बच्चे बकईंयां, पिठइयां चढ़ जाते थे। जहां बंदर-भालू वाला डमरू बजाता; वहां का तमाशा देखने के लिए तो बाप, चाचा, काका, भाई का कंधा ही होता था। मेला में मम्मफल्ली, चिनिया बेदाम बिकता, रंगीन लाल हरा शरबत बिकता, जलेबी, सिंघाड़ा (समोसा को कहते थे) बिकता था। एक कंद भी गोल-सा बिकता था - 10 पैसा में एक। पारदर्शी-सा सफेद कंद हल्का मीठा होता था। हमें सब चीज खानी थी। हम हर चीज के लिए मचल जाते। दस पैसा वाला कंद भी खा के ही दम धरते।
हम सारे सजे-धजे बच्चे होते थे, अपना स्कूल वाला जूता-मोजा पहनकर तैयार हो जाते। माँ हमारे दो पोनीटेल करके सफेद रिबन से बांध देती। ..तो वहीं गांव के बच्चे खूब मोटा-मोटा काजर लगाकर और बालों में ढेर सारा तेल चपोड़ के, माथे के एक कोने में डिठौना लगा के आते। हमारे दुआर पर ही ट्रैक्टर और टेलर होता, उसी पर सारा गांव रामनगर का मेला देखने जाता।
जैसे ही ट्रैक्टर स्टार्ट होता बच्चे चिल्लाते हे!!! भवानी माई के जय!! और अगर सबके बैठ जाने के बाद भी ट्रैक्टर स्टार्ट नही होता तो -लग्ग्गे जो..र!! खुशी के मारे एक और कोइ मंत्र जैसा कहते-
'काली माई करिया भवानी माई गोर
काली माई के लाइका भयिल ले गयिल चोर !!'
फिर बिना बात के हँसते। हम भी हँसते उनके साथ। हम पापा-चाचा के साथ मोटरसाइकिल पर होते। मोटरसाइकिल की टंकी पर गमछी, तौलिया बिछाकर और पीछे कैरियर में कपड़े की गद्दी बनाकर हमें एडजस्ट किया जाता। हम सब एक-दूसरे को पीछे से पकड़े बैठे होते।
दुआर पर खिरलिच और पेड़ पर धोबिन चिरई (नीलकंठ)
दशहरा की शुरुआत ही ओस भीगी सुबह और हरशृंगार के फूलों से होती। दुआर पर खिरलिच और पेड़ पर नीलकंठ देखने का मतलब था कि मेला अब करीब है।
गांव-देहात में तब नवरात्रि की ऐसी चर्चा, धूम नहीं होती थी। बस दशहरा का मेला होता था। जो बीत जाने के बाद भी मेला लगाए रहता था। मेला जाते समय हम धोबिन चिरई (नीलकंठ) को देखकर ‘जतरा’ बनाते थे। वह भी जैसे हमारे इंतजार में ही पेड़ों पर होते थे। जब हम रामनगर जाने के लिए नहर के किनारे चलते तो दोनों ओर के पेड़ों से यह धोबिन चिरई उड़ने लगती और हमारा जतरा बन जाता।
मेले में खिलौने और चीजें तो बेशुमार होतीं और हर बार ही वही-वही ही होतीं। पर, उन्हें हर बार ही हम पेट में गुदगुदी लिए देखते। दूर से ही जब हमें लाउडस्पीकर पर बजता भोजपुरी गीत ‘जगदम्मा घर में दियरा बार अइनी होss’ या ‘गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा उड़ी-उड़ी जाएss’ सुनाई देता तो हम जान जाते कि हम मेले के करीब हैं। थोड़ा और करीब जाने पर पिपिहिरी बजाते, झुनझुना लिए डगरौना डगराते बच्चे मेले से लौटते दिखते तो हम रुआंसे से हो जाते कि - जा अब त मेला उसर गयिल...
कुछ खिलौने हर साल खरीदे जाते और जरूर खरीदे जाते। जिसमे रंगीन कागज की घिरनइया, बांस की बांसुरी, नरकट की पिपिहिरी, मिट्टी का जाँता और स्प्रिंग से गरदन हिलाते मिट्टी के ही बूढ़ा-बूढ़ी होते और होता सबसे अलबेला, हमें सबसे प्यारा तिड़बिड़ ताशा!
यह मिट्टी के दीये पर कागज लपेटकर नगाड़ा बनाकर बांस की खपच्चियों पर दो मिट्टी के ही पहियों वाला खिलौना होता। जब बच्चे इसे रस्सी में बांधकर खींचते तो पहियों से ऊपर नीचे होती दो कमानी से उपर नीचे होता सा बजता - तिड़बड़.. तिड़बड़.. तिड़बड़...
यह प्यारा खिलौना अब ढूंढे नहीं मिलता...
हम अपने को हर खिलौने से खुद को जोड़ लेते। जैसे एक कमल के फूल में नाचती हुई लड़की मैं हो जाती। टेलीविजन पर, रेडियो पर भी मुझे ही बोलना था। मिट्टी के जाँता से हम कितना ही बालू पीस देते पिसान कह के।
काठ की तीन पहिया गाड़ी हमारे बहुत छोटे दस माह के भद्द-भद्द गिरते भाई बहनों को चलना सिखाने के लिए होती, तो चिरई वाला डगरौना छोटे भाई बहनों को ‘अपनी गाड़ी’ के घमंड के लिए होती। आपस के महायुद्ध में इसी डगरौना से एक-दूसरे का कपार भी फूटता था।आंगन के कउवे भी इसी डगरौना के डंडे से उड़ाए जाते।
काठ का ही एक खिलौना होता था चिरई वाला। तिकोने काठ पर तीन चिड़िया होती थीं। नीचे मोटी डोरी से एक भारी काठ बंधा होता था। तिकोने काठ को हिलाने से तीनों चिड़िया बारी-बारी दाना चुगती थी। हम बहनों को वह बहुत पसंद था। हम उसे खरीदते, चिरई को दाना डालते उन्हें खट्-खट् हिला के दाना चुगाते और ये गीत गाते-
‘राम जी के चिरई राम जी के खेत
खा ल चिरई भर-भर पेट’
गांव-देहात में तब नवरात्रि की ऐसी चर्चा, धूम नहीं होती थी। बस दशहरा का मेला होता था।
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‘बन में लकड़ी घर में लकड़ी देख तमाशा लकड़ी का...’
मेले में एक गाने वाले होते, जो दो उंगलियों में पत्थर फंसा के बजाते और गाते - ‘बन में लकड़ी घर में लकड़ी देख तमाशा लकड़ी का...’
हमें यह गाना याद हो जाता और हम यह गाना भी गाते जब भी काठ के खिलौने से खेलते तो...। और इस तरह काठ के खिलौने की वजह से दशहरे का मेला लंबे समय तक आँगन, दुआर पर लगा रहता।
काठ की चीजों में एक चिड़िया भी होती। इसके दोनों पंख खुलते तो पेट में दो गहरे डिब्बे होते, जिसे बिसाती ‘सास का उबटन तेल वाला मालिया’ (कटोरी) कहता। हम उसके लिए भी पैर पटकना, ठुनकना, रोना शुरू कर देते। कोई छोटी बहन ‘गंदी बच्ची’ की तरह भुईंया में लोट जाती - सास के मालिया चाहीं हमरा!!
हमें सारा ही मेला चाहिए होता था। हम खुद खिलौने खरीदते, गांव के अपने साथी के लिए भी खरीदवाते। मेला में भुलाने, खोने के डर से एक-दूसरे का हाथ पकड़ के चलते। आधा दिन मेला घूमते यह पक्का था कि कोई ना कोई तो रोएगा - गोड़ दुखाता... या हई मार दहलें.. गिरा दहलें...
भीड़ में चलते ठेस भी लगती और गिरकर भुभ्भुन, ठेहुन भी फूटता पर इससे क्या मेला नहीं घूमा जाएगा?
आधे दिन के बाद हम सब किसी तंबू कनात वाले होटल में सिंघाड़ा, जलेबी खाते, पानी पीते और एक दूसरे को अपने खिलौने दिखाकर अगराए हुए बच्चे होते।
लड़कियां ज्यादातर माला, चोटी, चांप, झुमकी, बाली, चिरी, जाँता, नाचने वाली लड़की, बीन या ढोलक खरीदतीं, तो लड़के नए चलन वाली पिस्तौल, जिसकी रील जैसी गोली होती थी; बम, डगरौना, बांसुरी, बैंजो, चाबी वाला भालू या फिर लकड़ी का ठकरा (डांडिया) खरीदते।
तिड़बिड़ तासा लयिका, लयिकी में पॉपुलर खिलौना था। सारे बच्चे पिपरी बजाते, ठकरा खेलते हुए लौटते। उस दिन आते-आते अंधेरा हो जाता। कुछ बच्चे अपने बाबू माई के गोद में सो जाते।
अब मिट्टी और काठ के खिलौने इसी कस्बे के मेले में नहीं मिलते। उमर पचास पर है, पर मन? वह अब भी उसी उछाह से मेला को देखता है और बचपन का मेला याद करता है-
मेला झूमे रात को
सुनना मेरी बात को
मेला झूमे.. मेला झूमे...
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