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महुआ के फूलों में महकता गांव : लोकजीवन में रचा-बसा महुआ और इससे जुड़ी मान्यताएं

उमाशंकर मिश्र, प्रतापगढ़ Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 19 Dec 2023 12:45 PM IST
सार

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले को आंवले के बगीचों और देसी आम की सैकड़ों किस्मों के लिए अधिक जाना जाता है। पर, मेरे मन में अपने गांव बहुंचरा का महुआ महकता है। जमीन पर टप-टप करके चूने वाले महुआ के रसभरे पीले फूलों की चादर पर बूढ़े पेड़ के पत्तों से छनकर आने वाली सुबह की मखमली किरणें मन को आज भी रोशन कर देती हैं।

महुआ के रस भरे फूल, सूखा महुआ और इसके फलों का ग्रामीण अर्थव्यवस्था और परंपरा में अहम स्थान रहा है।
महुआ के रस भरे फूल, सूखा महुआ और इसके फलों का ग्रामीण अर्थव्यवस्था और परंपरा में अहम स्थान रहा है। - फोटो : दुर्गादत्त पांडेय

विस्तार

यह बात भादो के महीने की है। गांव से बूढ़ी अम्मा ने दिल्ली में रहने वाली अपनी बड़ी बहू यानी मेरी मां के लिए महुआ के सूखे फूल भिजवाए थे। सूखे महुआ का महत्व भादो की ललही छठ के दिन बढ़ जाता है, जब अवध क्षेत्र की माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। ललही छठ के व्रत में फलाहार के रूप में सिर्फ महुआ का सेवन होता है। एक मान्यता है कि खेत में उगायी जाने वाली किसी फसल का उपयोग इस दिन फलाहार में नहीं करना चाहिए। महुआ की लकड़ी और पत्ते का उपयोग हवन-पूजन और दूसरे शुभ कार्यों में होता है। शुभता का प्रतीक बनकर महुआ न जाने कब लोकजीवन में रच-बस गया और इसके साथ मान्यताएं जुड़ गईं।

महुआ की पोटली से याद आया बचपन
प्रतापगढ़ में सई नदी के किनारे बसे गांव बहुंचरा से अम्मा की भेजी हुई सूखे महुआ की पोटली देखकर मन बचपन की उन यादों में खो जाता है, जब महुआ के बाग में हम आस-पड़ोस के बच्चे खेला करते थे। यह बात करीब 30-32 साल पुरानी होगी। सुबह की मखमली धूप पेड़ के पत्तों से छनकर जमीन पर पड़ रही थी। जमीन पर रसभरे महुआ के पीले फूलों की चादर बिछी थी। घर के कुछ बड़े-बूढ़े अरहर के रहठा से बनी टोकरियों में महुआ के फूलों को बीनकर रख रहे थे। तभी खेल-खेल में दौड़ते किसी बच्चे ने महुआ के फूलों को पैरों तले कुचल दिया। यह देखकर गुस्से से मेरे चाचा चीख पड़े थे। बच्चों की टोली वहां से चुपचाप खिसक गई और जेठउआ की घनी छांव में जाकर खेलने लगी।

जेठउआ, बाग के सबसे बूढ़े पेड़ का नाम था। बाग में छोटे-बड़े करीब 25 महुआ के पेड़ थे। दूसरे पेड़ों से उम्र में सबसे बड़ा होने के कारण उसे यह नाम अम्मा के बाबा ने दिया था। जेठउआ के नीचे कुछ बकरियां आ गईं। एक तेज-तर्रार बच्चा बिना समय गंवाए महुआ के कुछ पत्ते तोड़ लाया। उन पत्तों से दोने बनाए गए। कुछ बच्चों ने बकरियों का दूध दुहना शुरू कर दिया। बच्चों ने दोने में बकरी का दूध भर लिया और पलभर में गटक गए।
 
ललही छठ के व्रत में फलाहार के रूप में सिर्फ महुआ का सेवन होता है।
ललही छठ के व्रत में फलाहार के रूप में सिर्फ महुआ का सेवन होता है। - फोटो : सोशल मीडिया
उतरती ठंड में महुआ की कोपलें
फागुन-चैत में महुआ की पत्तियां झड़ जाती हैं और शाखाओं पर कलियां खिलने लगती हैं। इन कलियों को गांव में कूचीयाना कहते हैं। कुचियाने के बाद महुआ के पेड़ के नीचे साफ-सफाई होती है।  मार्च-अप्रैल में महुआ के फूल चूने लगते हैं और मई-जून में फल आते हैं। घर में बारी-बारी से सबको महुआ बीनने की जिम्मेदारी दी जाती है। महुआ के फूल लगभग 20-25 दिनों तक टपकते रहते हैं।

महुआ के इन रसीले फूलों का सेवन पशु, पक्षी और मनुष्य बड़े चाव से करते हैं। इसका उपयोग हरा या सूखा दोनों तरह से किया जाता है। यह चीनी की तरह मीठा होता है। सूखे महुए की बात करें तो उसमें तिल मिलाकर कूटा जाता है और इस तरह बनने वाली मिठाई को गांव में लाटा कहते हैं। इसे गाय भैंस को भी खिलाया जाता है, जिससे उनके दूध देने की क्षमता में वृद्धि होती है। गांव में बच्चे सबसे पहले महुआ या कोवा बीनने जाते थे। बच्चे इसे सुखाकर बेच लेते और उन्हें जेब-खर्च मिल जाता। कुछ बच्चे इससे मिलने वाले पैसे से कॉपी-किताब खरीदते।
 
फागुन-चैत में महुआ की पत्तियां झड़ जाती हैं और शाखाओं पर कलियां खिलने लगती हैं।
फागुन-चैत में महुआ की पत्तियां झड़ जाती हैं और शाखाओं पर कलियां खिलने लगती हैं। - फोटो : सोशल मीडिया
सात पीढ़ियों की कहानी
चैत्र-बैशाख के दिन थे और महुअरिया (महुआ का बाग) में फरवार लगा था, जहां जौ, चना, गेहूं, मटर और सरसों की फसलें कटाई के बाद रखी हुईं थीं। हमारी महुअरिया में यह फरवार पास के गड़राने में रहने वाले लोगों का था। जबकि, हमारा फरवार बड़की बगिया में लगता था। करीब 80 वर्षीय मेरी दादी अम्मा श्रीमती रामलली बताती हैं कि चैत्र के नवरात्र में उनके बाबा सुबह-सुबह भवानी के थान पर पाठ करने जाते थे। यही समय महुआ बीनने का भी होता था। इसीलिए, गड़राने की कुछ महिलाओं को महुआ बीनने के लिए पहले ही बोल दिया जाता। अम्मा अपने बचपन को याद करते हुए बताती हैं, अपनी छोटी बहन राजपति के साथ वह भी महुआ बीनने जातीं थीं।

कुछ देर में, वासुदेव बाबा भी पाठ खत्म करके आ जाते। महुआ के बाग में पहुंचकर वह गड़राने की ओर मुंह करके आवाज लगाते - हे बहिराssss! तनि आवा बीनाय लेअया! वासुदेव बाबा की आवाज सुनकर गड़राने की बहिरा भी महुआ बीनने में हाथ बंटाने पहुंच जातीं। अम्मा कहती हैं, महुआ के ये पेड़ हमारी सात पीढ़ियों से भी पुराने हैं। अम्मा के बाबा और उनके पिताजी, जिन्हें वह बच्चा बाबा कहती हैं, के जमाने से महुआ के फूलों से यह रिश्ता जस का तस बना हुआ है।
 
महुए के फल को कोवा कहते हैं। इसके बीज को सुखाकर इसका तेल निकाला जाता है।
महुए के फल को कोवा कहते हैं। इसके बीज को सुखाकर इसका तेल निकाला जाता है। - फोटो : सोशल मीडिया
एक रुपये का तीन किलो महुआ
अम्मा कहती हैं, उनके बचपन में एक सीजन में 10-15 मन महुआ होता था। बखार में महुआ रखा जाता। टटिया बांधकर उसके अंदर सूखी पत्तियां लाकर बिछा दी जातीं और फिर महुआ को दबाकर रखा जाता। भादो या फिर कुआर में बखार से निकालकर महुआ बेचा जाता। उस समय एक रुपये का तीन किलो बिकता था महुआ। कुजड़ा (तरकारी, फल आदि बेचने-खरीदने वाले) घर-घर आकर महुआ खरीदकर ले जाते। गांव के लोग भी ले जाते। महुआ बेचकर मिले पैसों से मेड़ बंधाने, बीज खरीदने, जुताई, मंड़ाई, चारा खरीदने जैसे काम कराए जाते। कपड़े और जलेबी भी आती। तब पांच आना में पाव भर जलेबी मिलती थी।
 
महुआ की बरिया (पुआ) और ठेकुआ (ठोकवा) भी खूब पसंद किया जाता है।
महुआ की बरिया (पुआ) और ठेकुआ (ठोकवा) भी खूब पसंद किया जाता है। - फोटो : सोशल मीडिया
बर्रे और अलसी के तेल में बना ठेकुआ
जब माई (अम्मा की मां) कहतीं कि लपसी बनाने के लिए महुआ ले आना, तो सिर पर टोकरी रखकर महुआ घर लाया जाता। घर में महुआ धोया जाता और निचोड़कर उसका रस निकाला जाता। इस रस को कड़ाही में डालकर चूल्हे पर देर तक खौलाया जाता। खौलते रस में धीरे-धीरे भुना आटा डालकर लपसी बनायी जाती। महुआ की बरिया (पुआ) और ठेकुआ भी खूब पसंद किया जाता। मेरी मां कहती हैं, महुआ को भिगोकर उसे सिल-बट्टे पर पीसा जाता। इसको आटा के साथ गूंथ लिया जाता और ठेकुआ बनाया जाता।

तवे पर परांठे की तरह घिसुआ ठेकुआ बनता, जबकि कड़ाही में कढ़ुआ ठेकुआ बनाया जाता। बर्रे (कुसुम) और अलसी के तेल में भी ठेकुआ बनता था। महुआ के फूलों का सीजन खत्म होता है, तो उसमें फल आने शुरू हो जाते हैं। इसके हरे कोये की सब्जी बनती है। महुए के बीज को कोइया कहते हैं। मां बताती हैं कि उनकी दादी कोइया के तेल को खौलाकर हांडी में रख देतीं थीं। खौलाने से तेल की गंध नहीं बदलती। हांडी में कोइया का तेल घी की तरह जम जाता, जिसे रोटी पर लगाकर खाया जाता।

महुआ के दर्जनों औषधीय उपयोग
महुआ के पत्ते, छाल, फूल, बीज की गिरी सभी का औषधीय उपयोग होता है। कोइया के तेल का उपयोग उद्योगों में साबुन बनाने में होता है। जनजातीय क्षेत्रों में महुए से देसी शराब बनाई जाती है। महुआ में प्रोटीन, कैल्शियम, फॉस्फोरस भरपूर होता है। इसके पत्ते से दोना- पत्तल बनाए जाते हैं। आयुर्वेद में इसका उपयोगी गठिया व बवासीर की दवा के रूप में होता है। कोइया के तेल का उपयोग भी कफ और पित्त विकारों को दूर करने में होता है।