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असम के गांवों में जाने, वहां रहने और स्थानीय सामाजिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल होने का अवसर मुझे अक्सर मिलता रहा है। असम की संस्कृति में मौजूद अनेक अनूठी परंपराओं में यौवन का सार्वजनिक उत्सव ‘तुलोनी बिया’ शामिल है। यह उत्सव विवाह का प्रतीक है, जो लड़की के यौवन प्राप्त करने अर्थात उसके पहले मासिक धर्म के सात दिन बाद मनाया जाता है।
गोलाघाट जिले के बेटियनी और बोकोलाई समेत अनेक गांवों में असमिया परिवारों के साथ अलग-अलग समय में रहना हुआ है। इसी दौरान, मुझे वहां ‘तुलोनी बिया’ के उत्सव को करीब से देखने और इसके महत्व को समझने का अवसर मिला। ‘तुलोनी बिया’ लड़की के यौवन या उसके मासिक धर्म की शुरुआत का जश्न मनाने की अनोखी प्रथा है, जो अधिकांश हिंदू असमिया समुदायों के बीच व्यापक रूप से देखने को मिलती है।
मंगल-ध्वनि की गूंज देती है संदेश
जब नौ से बारह साल की उम्र की किसी लड़की को पहली बार मासिक धर्म का अनुभव होता है, तो उसकी मां पड़ोस की कुछ उम्रदराज महिलाओं के साथ मिलकर लड़की को सूती शॉल से ढंकती है और उसके रहने की व्यवस्था घर के एक शांत कोने में की जाती है, जहां पुरुषों को जाने की मनाही होती है। नियमित कपड़ों की जगह बेटी को ‘पारंपरिक मेखला सडोर’ पहनाया जाता है। महिलाएं उरुली (मंगल-ध्वनि) के माध्यम से आसपास के लोगों तक इसका संदेश पहुंचाती हैं।
महिलाएं, बिटिया को इस प्रक्रिया के महत्व और इससे जुड़ी सावधानियों, मासिक धर्म चक्र और उन प्रतिबंधों के सम्बन्ध में मार्गदर्शन और सलाह देती हैं, जिनका उसे मासिक धर्म के दौरान पालन करना होता है। पहले तीन दिन ठोस पका हुआ भोजन वर्जित होता है। इन दिनों में फल और कच्चे चने, दालें, दूध और उससे बने उत्पाद आदि दिए जाते हैं। चौथे दिन के बाद वह उबला हुआ खाना खा सकती है।
केले का पत्ता, चाकू और सरसों के बीज
अगले सात से दस दिनों तक बेटी को घर में घूमने, यहां तक कि अपने सामान को छूने और अपनी इच्छानुसार कहीं जाने या खाने की अनुमति नहीं होती। उसे घर के जिस कोने में रखा जाता है, वहां फर्श पर पुआल से बना बिस्तर या चटाई (आजकल गद्दे का प्रयोग होने लगा है) का एक अस्थायी बिस्तर बनाया जाता है।
बिस्तर के नीचे केले का पत्ता, चाकू और कुछ सरसों के बीज रखे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि चाकू और सरसों के बीज लड़की को बुरे सपने से दूर रखने में मदद करते हैं। बिस्तर के बगल में एक मिट्टी का दीपक, चावल से भरा कलश और उसके ऊपर गामुसा में तीन जुड़े हुए तामुल (कच्ची सुपारी), अंगूठी अथवा सोने का कोई आभूषण, झरे हुए बालों का गुच्छा आदि गांठ बांधकर रखते हैं, जिसे ‘कोनाई’ कहते हैं।
पुरोहित बताते हैं उपवास की अवधि
लड़की का परिवार किसी पुरोहित से सलाह लेता है, पूजा एवं कीर्तन आदि का आयोजन होता है। पुरोहित उसके उपवास की अवधि निर्धारित करने के लिए ज्योतिषीय अथवा खगोलीय गणना करता है। उसी के अनुसार, उपवास के लिए सात अलग-अलग समय अवधि होती हैं। पुरोहित की गणना में पतिहिता, कांता, सुभगा होने पर सात दिन का उपवास, बैश्य होने पर 16 दिन का उपवास, दुवागा होने पर 12 दिन का उपवास, पतिहिना होने से 3 महीने का उपवास, दुशीला होने पर 44 दिन के उपवास की व्यवस्था है।
चार दिनों तक कई तरह के प्रतिबंध
मासिक धर्म की शुरुआत के बाद अगले चार दिनों के लिए लड़की को नियमित स्नान से वंचित कर दिया जाता है। उसे अपने बालों में कंघी करने, बालों में तेल लगाने और यहां तक कि दर्पण में देखने की भी अनुमति नहीं होती। सभी दर्पणों, यहां तक कि खिड़कियों और वेंटिलेटरों को भी सावधानी से काले और भारी कपड़ों से ढंक दिया जाता है।
यह माना जाता है कि भोजन और स्नान से अब उसके परिपक्व हो चुके गर्भाशय में बाधा आ सकती है और कंघी, तेल, या कोई अन्य सौंदर्य उपकरण उसकी कामुकता और कामेच्छा को बढ़ा सकते हैं। चौथे दिन, लड़की को औपचारिक स्नान कराया जाता है, जहां उसको हल्दी और तिल का लेप लगाया जाता है। उसके बाद, लड़की और उसकी और पारिवार की महिलाएं कोनाई का आदान-प्रदान करती हैं, जो उसके होने वाले बच्चे का प्रतीक होता है। हास्य-विनोद के कई करतब भी होते हैं।
सातवें दिन का उत्सव और भोज
सातवां दिन आने से पहले ही रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों को उत्सव अथवा अनुष्ठान में भाग लेने के लिए निमंत्रण भेजा जाता है। उस दिन लड़की को मह-हलौदी (उड़द दाल और हल्दी का लेप) आदि से स्नान कराया जाता है। उसकी अस्थाई चटाई हटा दी जाती है और पुरोहित घर का 'शुद्धिकरण' करता है। फिर लड़की को शुद्ध रेशम का मेखला साडोर पहनाया जाता है और आभूषणों से सजाया जाता है, जो आमतौर पर दुल्हनें अपने विवाह के दौरान पहनती हैं। माथे पर सिन्दूर लगाया जाता है और उसे 'केले के पेड़' का आशीर्वाद लेने के लिए कहा जाता है, जो उसके भावी पति का प्रतीक है।
मेहमान उस पर महंगे उपहारों की बरसात करते हैं। परिवार द्वारा पूरे समुदाय के लिए एक भव्य दावत का आयोजन किया जाता है ताकि यह घोषणा की जा सके कि उनकी बेटी अब यौवन से युक्त है और वह प्रजनन की क्षमता रखती है। इसके बाद, उसे सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से एक स्त्री के रूप में देखा जाने लगता है। इस तरह, ‘तुलोनी बिया’ अपने आप में एक अनूठी परंपरा है। हालांकि, इससे मिलती-जुलती परंपरा देश के दूसरे हिस्सों में भी देखी जा सकती है। किन्तु, असम में इसका विशेष स्वरुप दिखाई देता है।
कामख्या देवी का अम्बुबाची मेला
असम में, आम महिलाओं के साथ-साथ देवी के मासिक धर्म का भी उत्सव मनाया जाता है। यहां अभिप्राय मुख्य रूप से ‘अम्बुबाची मेला उत्सव’ से है, जो देवी कामाख्या के वार्षिक मासिक धर्म का उत्सव है। यह उत्सव हर साल जून में मनाया जाता है। यह माना जाता है कि इस दौरान देवी कामाख्या रजस्वला होती हैं। इसीलिए, उनका मंदिर भक्तों के लिए सात दिनों तक बंद रहता है। इस अवधि के दौरान सभी जुताई, बुवाई और अन्य कृषि कार्यों पर भी पूर्ण रोक होती है।
यह संभव है कि असम में ‘तुलोनी बिया’ की परंपरा का सिरा मां कामाख्या के रजस्वला होने की मान्यता से ही जुड़ी हुई हो, या इसी से इसकी शुरुआत हुई हो। जो भी हो, यह उल्लेखनीय है कि जब भारत के दूसरे हिस्सों में मासिक धर्म को एक वर्जित विषय माना जाता रहा है और कोई इस पर चर्चा तक नहीं करना चाहता था, ऐसे में, असम में ‘तुलोनी बिया’ मनाने की एक अनूठी प्रथा थी।
बदल रही प्रथा और उत्सव की परंपरा
वैसे तो यह परंपरा असम के सभी क्षेत्रों में आज भी कायम है। लेकिन, अब आधुनिक सोच और विचारों के साथ ही बदली हुई परिस्थितियों के मध्य इसमें लगातार गिरावट देखी जा सकती है। युवावस्था का जश्न अब धीरे-धीरे सार्वजनिक उत्सव से सिमटकर पारिवारिक मामला बनता जा रहा है। हालांकि, सांस्कृतिक विरासत के सम्मान के प्रतीक के रूप में मूल अनुष्ठान अभी भी प्रचलित हैं।
असम के गोलाघाट में स्कूल प्राध्यापिका जाह्नवी मौसम हजारिका कहती हैं, लोग अब ‘तुलोनी बिया’ पहले की तरह नहीं मनाते। इसका स्वरूप काफी बदल गया है। पहली माहवारी की घटना अब किसी उत्सव के बिना पारिवारिक समारोह में तब्दील होती जा रही है। वह यह भी कहती हैं, इस प्रथा के नाम पर प्रथम रजस्वला लड़की को एकांत में छोड़ देना, उसके पोषण का ध्यान न रखना और उत्सव के नाम पर बेवजह का तामझाम और अत्यधिक खर्च गैर-जरूरी हैं।
गोलघाट के बोकोलाई गांव में रहने वाली 15 साल की बेटी की मां वासंती हजारिका ने कहा, हमने बेटी की पहली माहवारी पर ‘तुलोनी बिया’ उत्सव नहीं मनाया। हालांकि, मैंने यह सुनिश्चित किया कि वह सभी अनुष्ठानों और प्रक्रियाओं का पालन करे। उसे सात दिनों के लिए एकांतवास में भी रखा गया। वो सारे संस्कार, जो हमारी परंपरा में रहे हैं, मैंने अपनी बेटी को भी उनका अनुसरण करने को कहा। बस हमने इसकी उत्सव के रूप में घोषणा नहीं की।
वासंती कहती हैं, सात दिन के बाद बड़ा उत्सव, दावत आदि के लिए न तो समय है और न ही फिजूलखर्ची का कोई लाभ है।