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बंजर भूमि सुधार के माध्यम से प्राकृतिक खेती: सिकुड़ती कृषि भूमि के लिए टिकाऊ समाधान
गांव जंक्शन डेस्क, लखनऊ
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sat, 20 Sep 2025 08:31 PM IST
सार
रसायनों के उपयोग एवं मृदा प्रदूषण के कारण भूमि का क्षरण बढ़ा है। बड़े पैमाने पर निर्माण कार्यों से भी खेती की जमीन कम हो रही रही है। सिकुड़ती कृषि भूमि की चुनौती को देखते हुए, बंजर जमीन को सुधार कर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना एक टिकाऊ विकल्प हो सकता है।
बंजर भूमि पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देकर टिकाऊ भविष्य की मजबूत नींव रख सकते हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
भारत में खेती की जमीन को लेकर दो तरह की बातें हो रही हैं। एक वर्ग का मानना है कि देश में खेती की जमीन बढ़ रही है। हालांकि, जिस तरह शहरीकरण बढ़ रहा है, खासकर उपजाऊ जमीनों पर शहरों का निर्माण हो रहा है, उससे लगता तो नहीं कि खेती की जमीन बढ़ रही है।
कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा लोकसभा में पेश एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2018-19 में जहां 1806.24 लाख हेक्टेयर जमीन पर खेती होती थी, वह साल 2021-22 में बढ़कर 2191.58 लाख हेक्टेयर हो गई। इससे तो हमें खुश होना चाहिए, क्योंकि चीन जैसे देश जहां अपने यहां खेती योग्य जमीन की कमी को लेकर चिंतित हैं, वहीं हमारे यहां खेती का रकबा बढ़ रहा है। लेकिन, एक अन्य रिपोर्ट - लैंड यूज स्टैटिस्टिक्स एट ए ग्लैंस (2012-13 टू 2021-22) कहती है, वर्ष 2018-19 से 2021-22 तक खेती योग्य जमीन का दायरा 1806.24 लाख हेक्टेयर से घटकर 1801.1 लाख हेक्टेयर रह गया। यह रिपोर्ट राज्यों को सुझाती है कि औद्योगिक और निर्माण गतिविधियों के लिए वे बंजर भूमि का उपयोग करें।
प्रदूषित होती मिट्टी, सिकुड़ती कृषि भूमि
भारत में भूमि राज्य सूची का विषय है और राज्यों पर इसके उपयोग लिए दबाव नहीं बना सकते। लेकिन, दिल्ली, हरियाणा, यूपी जैसे राज्यों के विकास और निर्माण कार्यों को देखें तो पता चलता है कि बड़ी मात्रा में खेती योग्य और उपजाऊ जमीन कंक्रीट के जंगल में बदल रही है। ऐसे में, बंजर भूमि को खेती योग्य बनाकर उस पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना टिकाऊ विकल्प हो सकता है। भारत में कुल 14 करोड़ हेक्टेयर पर नियमित खेती होती है।
आज जिस तरह कीटनाशकों और रासायनिक खादों का इस्तेमाल बढ़ा है, उसकी वजह से खेती की मिट्टी खराब हो रही है। कैंसर, ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों के लिए विशेषज्ञ रासायनिक खाद और कीटनाशक युक्त खेती को भी जिम्मेदार बता रहे हैं। पंजाब के बठिंडा से राजस्थान के बीकानेर के लिए चलने वाली विशेष ट्रेन को कैंसर ट्रेन इसीलिए कहा जाने लगा, क्योंकि इसमें ज्यादातर यात्री बीकानेर के कैंसर अस्पताल में अपना इलाज कराने जाते हैं। इलाज के लिए जाने वाले अधिकतर मरीज अपनी कृषि उपज के लिए मशहूर पंजाब के होते हैं, जहां रासायनिक खेती से मिट्टी और मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा पैदा हो गया है। इस खतरे को देखते हुए, अब प्राकृतिक या जैविक खेती की मांग बढ़ रही है। रसायनों से मुक्त इस खेती से पैदा होने वाली उपज स्वास्थ्यवर्धक होती है।
50 फीसदी बंजर भूमि बन सकती है उपजाऊ
प्रदूषित और क्षरण का शिकार खेती की जमीन को सुधारने में बहुत वक्त लगेगा। इसलिए, अब भारत में बंजर जमीन को तैयार करके उस पर प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देना टिकाऊ विकल्प हो सकता है। वैसे देश की करीब 40 फीसदी आबादी आजीविका के लिए बंजर भूमि पर निर्भर है। यह आबादी मुख्यतः ग्रामीण है, अशिक्षित भी है और इसमें हाशिए के लोग शामिल हैं।
इस सिलसिले में दिल्ली में पांच अगस्त को पूरे दिनभर का सेमिनार भी हुआ, जिसमें राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता और कृषि उत्पादक और कारोबारी भी शामिल हुए। हर वर्ग का मानना था कि ऐसा किया जाना भारत के स्वास्थ्य, हाशिए पर पड़े लोगों की हैसियत सुधारने और स्वास्थ्यवर्धक खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी है।
ग्रामीण विकास मंत्रालय के 'बंजर भूमि एटलस' (2019) के अनुसार, देश में लगभग 557.6 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि है, जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 16.96 प्रतिशत है। खाली या अनुत्पादक जमीन या जिस भूमि का पूरी क्षमता से उपयोग न हो रहा हो, जिसकी उत्पादकता कम हो, आमतौर पर उसे ही बंजर माना जाता है। एटलस के अनुसार, राजस्थान, बिहार, यूपी, आंध्र प्रदेश, मिजोरम, एमपी, जम्मू-कश्मीर और पश्चिम बंगाल की बंजर भूमि में सकारात्मक बदलाव आया है, जिसमें अधिकांश हिस्से को कृषि भूमि, वृक्षारोपण और औद्योगिक क्षेत्र बनाने के लिए बदला जा रहा है। बंजर भूमि में क्षरण का शिकार वन, जलभराव वाली दलदली भूमि, पहाड़ी ढलान, अपरदन वाली घाटी, अतिचारित और सूखाग्रस्त चारागाह शामिल होते हैं। सही उपचार करें तो लगभग 50 फीसदी बंजर भूमि उपजाऊ बन सकती है।
कृषक समुदायों के लिए खतरा
भारत में 61.5% ग्रामीण आबादी है, जो कृषि पर निर्भर है। देश में 57.8% परिवार कृषि से जुड़े हैं। भूमि क्षरण कृषक समुदायों की स्थाई आजीविका सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। भूमि संसाधन सीमित हैं और क्षरण का शिकार व बंजर भूमि में सुधार के लिए उपाय आवश्यक हैं, ताकि सामाजिक और आर्थिक कारणों से अनुपयोगी क्षेत्रों को पुनः प्राप्त करके उत्पादन क्षमता के नुकसान को रोका जा सके। इसके लिए, विशेष कार्यक्रम 1989-90 से चल रहा है। इसे 1995 से जलग्रहण विकास के लिए जारी नए दिशा-निर्देशों के आधार पर लागू किया जा रहा है, जिसमें सामुदायिक भागीदारी की परिकल्पना की गई है। इसकी ताकत स्थानीय पंचायती राज संस्थाओं, गैर-सरकारी संगठनों, सरकारी विभागों और स्थानीय समुदायों को शामिल करके निर्णय लेने की प्रक्रिया के विकेंद्रीकरण में निहित है।
नए दिशा-निर्देश जलग्रहण विकास निधि की स्थापना करके और समता संबंधी मुद्दों और उपभोक्ता अधिकार तंत्रों के निर्णय में लोगों को शामिल करके स्थाई परियोजनाओं को सुनिश्चित करने का भी प्रयास करते हैं। वैसे बंजर भूमि को उपजाऊ और विकसित बनाने के लिए सरकारी स्तर पर कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना ऐसी ही योजना है। इसके तहत मृदा अपरदन रोकने, वनस्पतियों को पुनर्जीवित करने, वर्षा जल संचयन और भूजल स्तर सुधारने के लिए मिट्टी, वनस्पति आवरण जैसे संसाधनों का दोहन, संरक्षण व विकास के जरिए पारिस्थितिकीय संतुलन बहाल करने की तैयारी की जा रही है।
पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अंतर्गत 1992 में स्थापित राष्ट्रीय वनरोपण एवं पारिस्थितिकी विकास बोर्ड (एनएईबी) भी बंजर भूमि के विकास के लिए योजनाएं चला रहा है। इसके तहत वनरोपण को बढ़ावा दिया जाता है। ये वनरोपण स्थानीय पारिस्थितिकीय स्थिति पर केंद्रित होते हैं। साथ ही, एकीकृत वनरोपण और पारिस्थितिकी विकास परियोजना योजना, क्षेत्रोन्मुख ईंधन लकड़ी व चारा परियोजना योजना, औषधीय पौधों सहित गैर-काष्ठीय वन संरक्षण एवं विकास योजना, वृक्ष एवं चारागाह बीज विकास योजना भी चल रही है।
भारत की अधिकांश बंजर और अत्यधिक क्षरित भूमि पर सीमांत व छोटे किसान और आदिवासी आबादी का निवास करती है, जिनकी आजीविका इसी जमीन पर टिकी हुई है। इसे उपजाऊ बनाकर उनकी आय बढ़ा सकते हैं। बंजर भूमि का विकास करके उसे उपजाऊ बनाना और उस पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना फायदेमंद हो सकता है। इससे शुद्ध और रसायन-मुक्त खाद्यान्न का उत्पादन होगा और कृषि वानिकी का भी विकास होगा। यह बदलाव हमें प्रकृति के करीब लेकर जाएगा, जहां भविष्य टिकाऊ और स्वास्थ्यवर्धक होगा।
क्या होती बंजर भूमि कितनी हैं इसकी श्रेणियां?
वर्ष 1985 में, स्थापित राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड (एनडब्ल्यूडीबी) के अनुसार, बंजर भूमि को क्षरण की सीमा के आधार पर कई समूहों में बांटा गया है। इसमें पहली श्रेणी में सांस्कृतिक बंजर भूमि की आती है, जिसका कई वजहों से उपयोग नहीं हो रहा। यह भूमि उपचार के बाद उपजाऊ हो सकती है। जैसे झूम खेती वाली भूमि, क्षरण से ग्रस्त चारागाह, क्षरित वन भूमि, क्षरित गैर-वनीय वृक्षारोपण भूमि, पट्टेदार भूमि, रेतीले क्षेत्र, खनन व औद्योगिक बंजर भूमि, नाले एवं बीहड़ भूमि, जलभराव व दलदली भूमि, और लवण से प्रभावित भूमि इस दायरे में आती है। दूसरी श्रेणी कृषि के लिए अयोग्य बंजर भूमि कही जाती है। इस बंजर भूमि के अंतर्गत वह जमीन आती है, जिसका अभी उपयोग नहीं हो रहा है और किसी भी हालत में यह उपजाऊ नहीं हो सकती या यहां पेड़-पौधे नहीं उग सकते। इस श्रेणी के अंतर्गत पथरीली, तेज ढलान वाली और बर्फ से ढकी जमीन आती है।
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