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हरिता अमोनिया: उर्वरक आयात का खर्च घटाने, कृषि लागत कम करने और पर्यावरण-पोषण सुरक्षा का एक भरोसेमंद अस्त्र

प्रो. एन. रघुराम , हेड-सतत नाइट्रोजन और पोषक तत्व प्रबंधन केंद्र, गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 17 Mar 2026 08:52 PM IST
सार

हरित अमोनिया (Green Amonia) का उपयोग उर्वरक आयात का खर्च घटाने के साथ कृषि लागत कम करके पर्यावरण व पोषण सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है। यह आत्मनिर्भर भारत और खुशहाल किसान की नई पहचान बन सकता है।

हरित अमोनिया का विवेकपूर्ण उपयोग खेतों के नाइट्रोजन प्रदूषण को कम कर सकता है।
हरित अमोनिया का विवेकपूर्ण उपयोग खेतों के नाइट्रोजन प्रदूषण को कम कर सकता है। - फोटो : AI

विस्तार

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और खाद्य प्रणालियों पर बढ़ते बोझ के ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य से समझौता किए बिना बढ़ती आबादी की मांग को पूरा करना है। इस दोराहे पर हरित अमोनिया ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकता है। सौर ऊर्जा और जल के मेल से बनने वाला यह ईंधन भारतीय कृषि और कोल्ड स्टोरेज सेक्टर के लिए एक नई सुबह की तरह है।

उर्वरक आयात के चक्रव्यूह से मुक्ति
भारत दुनिया में नाइट्रोजन उर्वरकों का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। यूरिया और अन्य खाद बनाने के लिए हम प्राकृतिक गैस पर निर्भर हैं, जिसका 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात होता है, जिस पर देश सालाना लगभग 9 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च करता है। किसानों को सस्ती खाद देने के लिए सरकार पर सालाना 17 अरब डॉलर की सब्सिडी का बोझ भी पड़ता है। पारंपरिक उर्वरक कारखानों में प्राकृतिक गैस जलाने से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड गैस निकलती है। इसके विपरीत, हरित अमोनिया तकनीक प्राकृतिक संसाधनों (धूप और पानी) से खाद बनाने का अवसर देती है। यह विदेशी मुद्रा बचाने और कार्बन उत्सर्जन कम करके पर्यावरण को सुरक्षित रखने में सहायक है।

जनस्वास्थ्य की रक्षा और प्रदूषण नियंत्रण
हरित अमोनिया का विवेकपूर्ण उपयोग खेतों के नाइट्रोजन प्रदूषण को कम कर सकता है। उर्वरकों और पशु अपशिष्ट से निकली अमोनिया गैस वायु प्रदूषण का कारण बनती है। जब रासायनिक उर्वरकों और पशुओं के गोबर से निकलने वाली अमोनिया गैस हवा में मौजूद नाइट्रोजन ऑक्साइड (जो वाहनों और उद्योगों से निकलती है) के साथ मिलती है, तो यह सूक्ष्म ठोस कणों (पीएम 2.5) में बदल जाती है। विश्व बैंक के अनुसार, दुनिया के तीन-चौथाई से अधिक प्रदूषित शहर भारत में हैं, जिनमें इस प्रदूषण से सालाना 15 लाख से अधिक मौतें और कई बीमारियां होती हैं। हरित अमोनिया का संतुलित प्रयोग इस जनस्वास्थ्य संकट को टाल सकता है।

ग्रामीण बुनियादी ढांचे का कायाकल्प
अक्सर ग्रीन हाइड्रोजन की भी चर्चा खूब होती है, लेकिन ग्रामीण भारत की जमीनी हकीकत के लिए हरित अमोनिया अधिक व्यावहारिक है। इसका सबसे बड़ा कारण परिवहन की सुगमता है। हाइड्रोजन गैस अत्यंत हल्की होती है, जिसे स्टोर करने के लिए भारी दबाव और बेहद ठंडा तापमान जरूरी है, जो बहुत खर्चीला है। इसके विपरीत, अमोनिया को सामान्य तापमान पर आसानी से तरल बनाकर लंबी दूरी तक भेज सकते हैं। यही विशेषता इसे विकेंद्रीकृत ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आदर्श बनाती है।

भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कोल्ड स्टोरेज की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन बिजली की कमी और उच्च लागत एक बड़ी बाधा है। अमोनिया का उपयोग पहले से ही प्रशीतक (रिफ्रिजरेंट) के रूप में होता है। चूंकि भारत में सौर ऊर्जा की प्रचुरता है, इसलिए गांवों के स्तर पर ही हरित अमोनिया का उत्पादन कर कोल्ड स्टोरेज और कृषि-प्रसंस्करण केंद्रों को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। इससे न केवल फसलों की बर्बादी रुकेगी, बल्कि कृषि क्षेत्र का कार्बन फुटप्रिंट भी कम होगा।

आत्मनिर्भरता की ओर कदम
हरित अमोनिया का प्रभाव केवल खेतों तक सीमित नहीं है। यह तकनीक माइकोप्रोटीन (कवक प्रोटीन) बनाने वाले किण्वन रिएक्टरों के लिए भोजन का काम करती है। इससे तैयार प्रोटीन युक्त आटा मधुमेह जैसी समस्याओं से लड़ने और पोषण की कमी दूर करने में सहायक हो सकता है। साथ ही, इसका पशु आहार के रूप में उपयोग होने से चारे की फसलों पर नाइट्रोजन का दबाव कम होगा, जिससे भूमि की उर्वरता बनी रहेगी।

भारत ने इस दिशा में ठोस कदम बढ़ा दिए हैं। साल 2021 में, राजस्थान के बीकानेर में दुनिया का पहला ऐसा संयंत्र शुरू हुआ, जो सालाना 1000 मीट्रिक टन से अधिक हरित अमोनिया का उत्पादन कर रहा है। स्टील मंत्रालय ने भविष्य की सरकारी खरीद में 37% वरीयता हरित इस्पात को देने का प्रस्ताव रखा है, जिसमें हरित अमोनिया और हाइड्रोजन की मुख्य भूमिका होगी।

(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के मार्च 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)