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Cotton Prices: कपास पर शून्य आयात शुल्क से बढ़ेगी किसानों की मुश्किल

विजय जावंधिया, कृषि विशेषज्ञ Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 08 Sep 2025 03:52 PM IST
सार

केंद्र सरकार द्वारा कपास पर आयात शुल्क खत्म करने का फैसला उत्पादक किसानों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। किसानों को राहत प्रदान करने के लिए वर्ष 2025-26 में घोषित एमएसपी पर कपास खरीदने की जिम्मेदारी सरकार को सुनिश्चित करनी चाहिए।

कपास पर आयात शुल्क 11 फीसदी से घटाकर शून्य किया जाना किसानों के हित में नहीं है।
कपास पर आयात शुल्क 11 फीसदी से घटाकर शून्य किया जाना किसानों के हित में नहीं है। - फोटो : क्रिएटिव कॉमन्स

विस्तार

कपास पर आयात शुल्क शून्य किए जाने का निर्णय को कपास उत्पादक किसानों के हित में नहीं है। शेतकरी संगठन ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर इस खतरे के प्रति आगाह किया है। कपास पर आयात शुल्क खत्म करने का फैसला इस सफेद रेशे को पैदा करने वाले किसानों की कमर तोड़ सकता है। इस खतरे को देखते हुए, पीएम नरेंद्र मोदी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान को लिखे पत्र में संगठन की ओर से वर्ष 2025-26 में घोषित एमएसपी पर कपास खरीद सुनिश्चित करने की मांग सरकार से की गई है।

11 फीसदी आयात शुल्क घटाकर शून्य
यह कहानी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ वार की नीति से शुरू होती है, जिसके तहत भारत से कपास के आयात पर अमेरिका ने 50 फीसदी शुल्क लगाया है। ट्रंप के इस फैसले को देखते हुए, केंद्र सरकार ने देश के कपड़ा निर्यातकों को राहत प्रदान करने के लिए भारत में आयात किए जाने वाले कपास के 11 फीसदी शुल्क को घटाकर शून्य करने की घोषणा कर दी है। भारत में कपास पर आयात शुल्क पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। भारत के कपड़ा मिल मालिकों को तो मानो इस फैसले से मन-मांगी मुराद मिल गई। अमेरिकी टैरिफ के पहले ही वो शुल्क कम करने की मांग करते रहे हैं। वह भी तब दुनिया के कपास बाजार में मंदी बनी हुई थी। 

कपास के दामों में गिरावट 
दो साल पहले जब दुनिया के बाजार में एक लाख रुपये प्रति खण्डी (354 किलो रुई) कपास के दाम थे, तब भी भारत के किसानों को 10000 से 12000 रुपये प्रति क्विंटल की दर से कपास के भाव मिल रहे थे। पिछले साल से किसान को एमएसपी 7550 रुपये भी नहीं मिल रही। रुई का जो भाव एक लाख रुपये खण्डी था, वो देश में लुढ़क कर 50000 से 55000 रुपये प्रति खण्डी रह गया। दुनिया के बाजार में रुई (लिंट) का जो भाव 1 डॉलर 70 सेंट था, वो आज गिरकर 70-80 सेंट रह गया है। हमारा सवाल ये है कि रुई, जो कपड़ा उद्योग का कच्चा माल है, उसके दाम आधे हो गए हैं। फिर, कपड़े के दाम आधे क्यों नहीं हुए? कांग्रेस के शासनकाल में भी हम यही सवाल पूछते थे कि यह मुनाफा आखिर जाता कहां है? आज भी यह सवाल बना हुआ है।

कपास उत्पादक किसानों के लिए 5एफ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 में दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के सामने भाषण में कपास उत्पादक किसानों के लिए 5एफ – फार्म (खेत), फाइबर (धागा), फैब्रिक (कपड़ा), फैशन (वस्त्र) और फॉरेन (विदेशी निर्यात) का उल्लेख किया था। पिछले 11 साल से इसका भी लाभ किसान को नहीं मिल रहा है। अमेरिका के किसानों को अरबों रुपये की सब्सिडी मिलती है। लेकिन, भारत के किसानों के साथ ऐसी स्थिति नहीं है और सरकारी सहायता की बाट देखते रहते हैं। लेकिन, मौजूदा सरकार भी पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की तरह किसानों के बजाय कपड़ा मिल मालिकों की मदद करती हुई दिखाी देती है।

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल और उसके बाद के वर्षों (1997 से 2003 तक) में 110 लाख गांठ कपास आयात की गई थी। किसानों को एमएसपी भी नहीं मिली, जिसके दुष्परिणाम देखने को मिले और किसानों की आत्महत्याएं बढ़ गईं। 

इन बातों की पृष्ठभूमि पर विचार करने की जरूरत है। साथ ही, यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि किसान को कपास की घोषित एमएसपी 8110 रुपये क्विंटल की सुरक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है।