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BASMATI RICE: बासमती की सुगंध बचानी होगी, ग्रीष्मकालीन साठी धान की 15 सितंबर से पहले बिक्री पर लगे रोक

डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर, पूर्व प्रधान वैज्ञानिक, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Wed, 20 Aug 2025 01:23 PM IST
सार

BASMATI RICE: भारतीय बासमती चावल की गुणवत्ता बनाए रखने और भूजल की बर्बादी रोकने के लिए विशेषज्ञ 15 सितंबर से पहले बासमती धान की बिक्री पर प्रतिबंध लगाना कारगर कदम हो सकता है। इससे बासमती में मिलावट को रोकने और वैश्विक बाजारों के लिए इस चावल की अनूठी सुगंध और गुणवत्ता सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है।

बासमती की गुणवत्ता को बनाए रखने और भूजल संकट से निपटने के लिए सरकार को तुरंत कदम उठाने होंगे।
बासमती की गुणवत्ता को बनाए रखने और भूजल संकट से निपटने के लिए सरकार को तुरंत कदम उठाने होंगे। - फोटो : गांव जंक्शन

विस्तार

भारत का बासमती चावल अपनी लंबे व पतले दानों और अनूठी सुगंध के लिए दुनियाभर में मशहूर है। हिमालय की तलहटी में उगने वाला यह चावल न केवल स्वाद में लाजवाब है, बल्कि पकने पर अपने आकार को दोगुना कर लेता है, जो इसे अन्य चावल की किस्मों से अलग बनाता है। इसकी खेती मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली जैसे सात राज्यों में होती है, जिन्हें भौगोलिक संकेत (जीआई) क्षेत्र के रूप में मान्यता प्राप्त है। 
अग्रणी बासमती उत्पादक राज्य
एपीडा की 2023-24 की फसल सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बासमती धान का कुल क्षेत्रफल 25 लाख हेक्टेयर है, जिसमें से 8.12 लाख हेक्टेयर पंजाब, 7.87 लाख हेक्टेयर हरियाणा और 4.61 लाख हेक्टेयर उत्तर प्रदेश में है। उत्पादन की बात करें तो पंजाब 3.84 मिलियन मीट्रिक टन के साथ पहले स्थान पर है, इसके बाद हरियाणा में 3.67 मिलियन मीट्रिक टन बासमती चावल का उत्पादन होता है। उत्तर प्रदेश में 2.0 मिलियन मीट्रिक टन बासमती चावल का उत्पादन होता है। 

निर्यात में बासमती चावल की धूम
वैश्विक स्तर पर, बासमती चावल का 70% उत्पादन भारत और 30% पाकिस्तान में होता है। बासमती चावल की मांग अमेरिका, यूरोप और खाड़ी देशों में जबरदस्त है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 50,312 करोड़ रुपये का 5.24 मिलियन टन बासमती चावल निर्यात किया। इसकी अनूठी सुगंध, नरम बनावट और स्वाद इसे वैश्विक बाजार में खास बनाते हैं। लेकिन, बासमती चावल की गुणवत्ता को बनाए रखना अब एक बड़ी चुनौती बन गया है।

बासमती की सुगंध का रहस्य 
बासमती की खास सुगंध का राज है इसका BADH2 जीन है, जो 2-एसिटाइल-1-पाइरोलाइन (2-AP) नामक रासायनिक यौगिक का उत्पादन करता है। यह यौगिक बासमती की सुगंध के लिए जिम्मेदार है। जब दिन-रात का औसत तापमान 25 डिग्री सेल्सियस से कम होता है, तब यह जीन सबसे अच्छा काम करता है, जिससे चावल के दानों में 2-AP की मात्रा बढ़ती है। सितंबर से नवंबर के बीच उत्तर-पश्चिम भारत के जीआई क्षेत्रों में ऐसा तापमान मिलता है, जो बासमती की सुगंध को चरम पर ले जाता है। अगर धान की कटाई इस अवधि से पहले होती है, तो 2-AP की मात्रा कम रहती है, जिससे चावल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। बता दें कि बीज अधिनियम 1966 के तहत बासमती धान की गुणवत्ता सुगंध, दाने की लंबाई-चौड़ाई जैसे मानकों पर निर्धारित की जाती है।

साठी बासमती से पैदा हुई समस्या 
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ किसान जल्दी मुनाफे के चक्कर में अप्रैल-मई में ग्रीष्मकालीन साठी बासमती धान की बुवाई कर जुलाई-अगस्त में इसे मंडियों में बेचने ले आते हैं। इस समय तापमान अधिक होने के कारण धान में 2-AP की मात्रा अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाती, जिसके चलते यह तकनीकी रूप से बासमती की श्रेणी में नहीं आता। फिर भी, आढ़ती और व्यापारी इसे सस्ते दामों में खरीदकर असली बासमती धान में मिलावट कर देते हैं। इससे निर्यात होने वाले चावल की गुणवत्ता में कमी आती है, जो भारत की साख को नुकसान पहुंचा रही है। 

राष्ट्रीय पोर्टल एगमार्कनेट के अनुसार, इस खरीफ सीजन में 18 अगस्त 2025 तक उत्तर प्रदेश और हरियाणा की मंडियों में 76 हजार टन से ज्यादा बासमती धान की बिक्री हो चुका है, जो उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उत्पादित बासमती का लगभग 20% हिस्सा है। 

ग्रीष्मकालीन साठी बासमती की खेती से संकट
धान की जल्दी बुवाई का एक और बड़ा नुकसान है भूजल की बर्बादी। ग्रीष्मकालीन साठी धान की खेती में भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है, जो पहले से ही कम हो रहे भूजल स्तर को और नीचे ले जा रही है। पंजाब और हरियाणा में प्रिजर्वेशन ऑफ सबसॉयल ग्राउंड वाटर एक्ट-2009 के तहत ग्रीष्मकालीन धान की खेती पर पूरी तरह रोक है। लेकिन, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में ऐसे कानूनों की कमी के कारण किसान बेरोकटोक जल्दी बुवाई कर रहे हैं। 

ग्रीष्मकालीन साठी बासमती पर लगे प्रतिबंध
बासमती की गुणवत्ता और भूजल दोनों को बचाने के लिए उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी ग्रीष्मकालीन साठी धान पर कानूनी प्रतिबंध लगना चाहिए। साथ ही, 15 सितंबर से पहले मंडियों में बासमती धान की बिक्री पर पूरी तरह रोक लगाई जानी चाहिए। इससे न केवल बासमती की शुद्धता बनी रहेगी, बल्कि भूजल संरक्षण में भी मदद मिलेगी। 

बासमती चावल सांस्कृतिक और आर्थिक विरासत 
बासमती चावल भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक विरासत का हिस्सा है। इसकी गुणवत्ता को बनाए रखने और भूजल संकट से निपटने के लिए सरकार को तुरंत कदम उठाने होंगे। 15 सितंबर से पहले बासमती धान की बिक्री पर प्रतिबंध और सख्त नियमों का पालन सुनिश्चित करना इस दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। इससे न केवल भारतीय बासमती की वैश्विक साख बचेगी, बल्कि पर्यावरण को भी सहारा मिलेगा।