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Samvad 2013 Para Archer Sheetal Kumari Rakesh Kumar Former Cricketer Irfan And Suresh Raina Expressed Thei
संवाद 2013 : पैरा आर्चर शीतल कुमारी, राकेश कुमार, पूर्व क्रिकेटर इरफान और सुरेश रैना ने रखे विचार
गांव जंक्शन डेस्क, जम्मू
Published by: Manish Mishra
Updated Thu, 30 Nov 2023 03:05 PM IST
सार
अमर उजाला संवाद 2023 में खेल जगत से भारत के पैरा तीरंदाज शीतल देवी, और राकेश कुमार; पूर्व क्रिकेटर इरफान पठान और सुरेश रैना ने अपने विचार रखे। पैरा आर्चर शीतल के दोनों हाथ नहीं हैं, जबकि राकेश को हादसे में पैर गंवाने पड़े थे।
अमर उजाला संवाद में पैरा आर्चर खिलाड़ियों ने साझा किए अनुभव।
- फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
कार्यक्रम में बात करते हुए विश्व की नंबर वन पैरा आर्चर शीतल देवी और राकेश कुमार ने कहा, किसी भी इंसान में कोई कमी नहीं होती है, बस मेहनत करने की जरूरत होती है और आप सब कुछ हासिल कर सकते हैं। वहीं, कार्यक्रम के दौरान सुरेश रैना ने कहा, भारतीय टीम अभी अच्छा प्रदर्शन कर रही है। आने वाले समय में हम चाहते हैं कि जम्मू का कोई बच्चा भारतीय टीम में खेले। इरफान पठान ने कहा, हमने 60 हजार बच्चों को क्रिकेट खिलाया था। फिर कुछ नतीजे मिले। यहां 24 जिले हैं। वहां सभी को क्रिकेट खेलने का मौका मिले, हम यही चाहते थे।
शीतल देवी ने कहा, मुझे एहसास नहीं है कि मैं नंबर एक हूं और मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता। शीतल ने आगे बताया कि वह सिर्फ पैर से ही पेड़ पर चढ़ जाती हैं। मैंने जो मशीन पैरों में लगाई, तो मुझे पैर भारी लगने लगे। फिर मैंने खोलकर रख दिए। मैं शुरू से ही पैर से ही काम करती थी। पढ़ती, लिखती, खेलती यहां तक की पैर की मदद से पैड़ पर भी चढ़ जाती थी।
पैरा तीरंदाज शीतल देवी देश के सबसे बेहतरीन पैरा तीरंदाजों में से एक हैं। हाल ही में शीतल ने दो स्वर्ण सहित तीन पदक जीते थे। बिना बाजुओं की तीरंदाज शीतल देवी को साल 2023 में एशिया की सर्वश्रेष्ठ युवा एथलीट चुना गया।
शीतल बचपन में लकड़ी से धनुष बनाती थीं और अपने भाई-बहनों के साथ खेलती थीं। हालांकि, वह काफी हल्का होता था और उसे पैर से उठाने में परेशानी नहीं होती थी। अब पैर से काफी वजनी धनुष उठाना पड़ता है।
शीतल ने आगे कहा कि पहले मेरा निशाना नहीं लगता था तो बहुत बुरा लगता था। ऐसे में कोच ने कहा कि अगर हिम्मत हार गए तो नहीं कर पाओगे। ऐसे में मैने ठान लिया कि मुझे यह करना है। मैंने कोच की बात मानी और मेरे तीर निशाने पर लगने लगे। यहां से हौसला बढ़ा। इसके बाद वह राष्ट्रीय स्तर पर सामान्य तीरंदाजों के साथ प्रतियोगिता में रजत पदक जीतने पर सफल रहीं। यहां से उनका हौसला बढ़ा और इससे उन्हें और भी ज्यादा मेहनत करने की प्रेरणा मिली। माता-पिता से मिले साथ पर शीतल ने कहा, हमारे माता-पिता ने कभी भी ऐसा नहीं सोचा कि शीतल कुछ नहीं कर पाएगी। अगर दूसरे दिव्यांग लड़के भी कोशिश करेंगे तो एक न एक दिन सफल होंगे।
पैरा आर्चर खिलाड़ियों को कार्यक्रम के दौरान किया गया सम्मानित।
- फोटो : गांव जंक्शन
राकेश कुमार ने अपनी तीरंदाजी को लेकर कहा कि जब आप स्वर्ण पदक जीतते हैं और तिरंगा लेकर आप वहां पहुंचते हैं। ऐसे में राष्ट्रगान बजता है तो यह सबसे ज्यादा गर्व की बात होती है। श्री माता देवी वैष्णो श्राइन बोर्ड पहला ऐसा ट्रस्ट है, जिसने खेलों को इतना बढ़ावा दिया है। इस ट्रस्ट के खिलाड़ी 200 से ज्यादा पदक जीत चुके हैं। हमारे कोच न को छुट्टी लेते हैं और न ही लेने देते हैं। साल में 365 दिन अभ्यास करने का नतीजा है कि हम लगातार अच्छा कर रहे हैं।
राकेश कुमार ने बताया कि 2017 में उनका एक्सिडेंट हुआ था। उससे पहले तक वह प्लंबर थे। यहां उनकी मुलाकात कोच से हुई और यहां से उनकी कहानी शुरू हुई। एक साल बाद उन्होंने देश के लिए पहला स्वर्ण जीता। बचपन में क्रिकेट खेलने वाले राकेश ने कहा कि जात से लुहार हूं और अपने पहले पैरा नेशनल में वह 17वें स्थान पर थे। उन्होंने 33 साल की उम्र में तीरंदाज बनने का सपना देखा और 38 साल की उम्र में 14 पदक जीत चुके हैं।
राकेश ने कहा कि जम्मू कश्मीर में प्रतिभा की कमी नहीं हैं। उसको सामने लाने और निखारने के लिए सरकार को काम करना चाहिए। ऐसा हुआ तो हमारा प्रदर्शन और आगे बढ़ेगा।
राकेश ने पैरा खिलाड़ियों की चुनौतियों को लेकर कहा कि शुरुआत में लगता था कि हमारे सामने मुश्किलें हैं। हालांकि, बाद में हमने यह मान लिया कि यही हमारी जिंदगी है। अगर आपने यह मान लिया कि कुछ भी मुश्किल नहीं है तो आप कुछ भी कर सकते हैं, कोई चुनौती नहीं होती है।
पूर्व क्रिकेटर इरफान पठान और सुरेश रैना ने क्रिकेट पर खुल कर की बात।
- फोटो : गांव जंक्शन
युवा खिलाड़ियों के सामने चुनौती ये है उनकी प्राथमिकता क्या है?
कार्यक्रम के दौरान पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी इरफान पठान और सुरेश रैना ने भारत में मौजूदा क्रिकेट को लेकर विस्तार से बात की। रैना ने कहा कि पैसा एक बार में नहीं मिल जाता। पंद्रह साल अच्छा प्रदर्शन करना पड़ेगा। वहीं, इरफान पठान ने कहा, वर्ष 2003 में मैंने डेब्यू किया था, 2012 में आखिरी बार खेला था। जब तक लीग नहीं आई थी, तब तक एक ही टीम थी। तब बड़ा प्यार मिलता था, तवज्जो मिलती थी। चीजें अब थोड़ी बंट गई हैं। युवाओं के सामने यह चुनने की चुनौती कि उनकी प्राथमिकता क्या है। लंबे समय तक कहां टिक सकते हैं, यह उन्हें तय करना है। पूरी जिंदगी कई खिलाड़ियों ने कमाया नहीं होगा, उतना एक सीजन खेलकर मिल जा रहा है। मेरी प्राथमिकता हमेशा मुल्क रहा है। अगर आप अच्छा क्रिकेट खेलकर परिवार की मदद करना चाहते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है।
जम्मू कश्मीर से दो लड़के आए। उमरान मलिक और अब्दुल समद। ये सिर्फ यहां के हीरो ही नहीं बने, उनका पारिवारिक जीवन बेहतर हो गया। उनकी आंखों में खुशी, जबान पर दुआएं थीं। देखकर सुकून मिल रहा था। आज एक रिक्शा चलाने वाले का लड़का आईसीसी का नंबर वन रैंक होल्ड बना है, नाम है मोहम्मद सिराज। पहले 60 ओवर का क्रिकेट था। फिर बदलाव हुआ। तब भी कहा गया कि यह तमाशा है। हम दो बार चैंपियन बने। 2011 में हम जीते, चीजें बदल गईं।
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