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Mission 100 Players Are Being Trained In The Villages Of Assam The Unique Journey Of Volleyball
मिशन-100 : असम के गांवों में तराशे जा रहे खिलाड़ी, सौ गेंदों से शुरू हुआ वॉलीबॉल का अनूठा सफर
उमाशंकर मिश्र, गुवाहाटी
Published by: Umashankar Mishra
Updated Thu, 16 Nov 2023 11:57 AM IST
सार
अपनी प्रतिभाओं को तराशने में गांव अक्सर चूक जाते हैं। उपेक्षा की इस धुंध को हटाने की एक कोशिश ब्रह्मपुत्र घाटी के गांवों में हो रही है, जहां उभर रहे हैं नए वॉलीबॉल सितारे।
इस साल बीवीएल के चौथे संस्करण में 160 गांवों की करीब 400 टीमें शामिल हुईं।
- फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
अपनी प्रतिभाओं को सही मंच और जरूरी सुविधाएं दिलाने के मामले में गांव आज भी पिछड़े हुए हैं। निराशा और उपेक्षा से भरे इस कुहासे को हटाने का काम असम के गांवों में शुरू हुआ है, जहां असम वॉलीबॉल मिशन-100 शुरू होने के बाद ग्रामीण खिलाड़ियों को खुलकर खेलने का मौका मिला है। इस पहल के तहत ब्रह्मपुत्र वॉलीबॉल लीग (बीवीएल) की स्थापना की गई है। लीग का उद्देश्य असम के दूरदराज के इलाकों में वॉलीबॉल को बढ़ावा देना है। देश में वॉलीबॉल के खेल को बढ़ावा देने और ग्रामीण प्रतिभाओं को सामने लाने के लिए यह एक अनूठी पहल है।
वह कौन सूत्रधार है!
यह लीग भारतीय वॉलीबॉल टीम के पूर्व कप्तान अभिजीत भट्टाचार्य के दिमाग की उपज है। उन्होंने 1988 में वॉलीबॉल खेलना शुरू किया और फिर 2003 से 2005 तक राष्ट्रीय टीम का नेतृत्व किया। संन्यास के बाद भट्टाचार्य इस खेल को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे हैं। भट्टाचार्य बताते हैं, अब खिलाड़ियों की कोचिंग की व्यवस्था गांवों में ही करा दी गई है। इससे गांव के दूसरे बच्चे भी खेलों से जुड़ने के लिए प्रेरित होते हैं। वॉलीबॉल को बढ़ावा देने वाली इस प्रतियोगिता के पिछले संस्करण में पांच हजार से अधिक बच्चों ने हिस्सा लिया था। जब कोरोना वायरस ने दुनिया को बेड़ियों में जकड़ लिया तो कोचिंग पर असर पड़ा। भट्टाचार्य यहां भी नहीं रुके, और वर्चुअल वॉलीबॉल अकादमी शुरू कर दी, जहां असम के चाय बागानों के बच्चे खेल की बारीकियां सीख रहे थे।
यह लीग भारतीय वॉलीबॉल टीम के पूर्व कप्तान अभिजीत भट्टाचार्य के दिमाग की उपज है।
- फोटो : गांव जंक्शन
फैल रही वॉलीबॉल क्रांति
ओएनजीसी में कार्यरत 44 वर्षीय भट्टाचार्य ने वर्ष 2020 में 35 गांवों की सिर्फ 50 टीमों के साथ अपने गृह राज्य असम में बीवीएल की शुरुआत की थी। लीग में टीमों की संख्या बढ़ती जा रही है। भट्टाचार्य बताते हैं, इस साल बीवीएल के चौथे संस्करण में 160 गांवों की करीब 400 टीमें शामिल हुईं। शुरुआत में, अंडर-16 स्तर पर खेलने वाले 33 लड़के और 17 लड़कियां इसमें शामिल थीं। अब इसे दो आयु वर्गों - अंडर-16 और अंडर-12 में बांट दिया गया है। स्पोर्ट्स किट से लेकर मैच के दौरान खिलाड़ियों के रहने और खाने तक की व्यवस्था की जाती है। लीग के पिछले संस्करण में मैचों की लाइव स्ट्रीमिंग भी की गई थी।
बनता गया कारवां
शून्य से शुरू हुए इस सफर के पहले चरण में सवाल बहुत थे, पर जवाब कहीं नहीं था। हर तरफ अनिश्चितता, अस्पष्टता और भ्रम की स्थिति थी। तभी सोचा गया कि एक गांव दूसरे गांव के खिलाफ खेलेगा तो चुनौतियों का समाधान समुदाय अपने आप खोज लेगा। इस सोच ने तस्वीर को पलटकर रख दिया। धीरे-धीरे लोग जुड़ते गए। वह समझने लगे कि लीग उनके गांवों में बदलाव ला सकती है। लोग टीमों को गोद लेने के लिए भी आगे आने लगे।
खेल नहीं आसान
लीग की हर टीम को दुनियाभर में फैले इस खेल के शुभचिंतकों द्वारा गोद लिया जाता है। वे एक टोकन राशि के जरिये योगदान देते हैं। इससे खिलाड़ियों की किट, परिवहन और उपकरणों की व्यवस्था होती है। अभिजीत भट्टाचार्य कहते हैं- कम टीमें थीं तो टीमों और उनके प्रायोजकों के साथ संपर्क करना आसान था। अब टीमों के साथ-साथ उनके प्रायोजकों की संख्या बढ़ गई है। भट्टाचार्य कहते हैं, भारतीय खिलाड़ी यूरोपीय या एशियाई देशों से कम नहीं हैं। ओलंपिक में क्वालीफाई करना हमारे खिलाड़ियों के लिए बहुत दूर का सपना नहीं रह गया है।
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