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Kolhapur The Home Of Sports From Passion For Wrestling To Hub Of Shooting
RURAL SPORTS: गांव के मैदान से ओलंपिक तक अपनी चमक बिखेर रहे इस ग्रामीण अंचल के सितारे
शिरीष खरे, कोल्हापुर
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sat, 24 Aug 2024 05:59 PM IST
सार
कोल्हापुर के एक छोटे-से गांव कंबलवाड़ी के मामूली किसान परिवार में जन्मे स्वप्निल कुसाले ने पेरिस ओलम्पिक में कांस्य पदक जीता। उनकी सफलता की पूरी यात्रा उनके पीछे इस पूरे इलाके में खेलों को प्रति युवाओं के जोश, उत्साह और परिश्रम की कहानी कहती है। कुश्ती, फुटबॉल में पहचान हासिल करने वाली यह ग्रामीण पट्टी अब अंतराष्ट्रीय स्तर के निशानेबाजों के लिए जानी जा रही है।
कोल्हापुर के युवा खिलाड़ी गांव से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं।
- फोटो : शिरीष खरे
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विस्तार
महाराष्ट्र के पश्चिम छोर पर स्थित कोल्हापुर इतिहास, संस्कृति, कला, पर्यटन और व्यापार जैसे कई क्षेत्रों के कारण दूर-दूर तक जाना जाता है। लेकिन, जो खेलों से जुड़े हैं उन खेल-प्रेमियों के लिए कोल्हापुर का नाम आते ही बहुत सारी अलग तस्वीरें भी उभरती हैं और ये तस्वीरें होती हैं अलग-अलग खेल के मैदानों कीं। आज भले निशानेबाजी के चलते कोल्हापुर को ख्याति अर्जित हो रही है, पर कुश्ती और फुटबॉल का गढ़ रहे कोल्हापुर में तीरंदाजी का खेल भी खूब फला-फूला और इन दिनों तैराकी भी मशहूर हो रही है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं की बात की जाए तो कई निशानेबाज यहीं से हैं। स्वप्निल कुसाले इन्हीं में से एक चमकता सितारा है, जिसने पेरिस ओलिंपिक-2024 में 50 मीटर निशानेबाजी की प्रतिस्पर्धा में भारत के लिए कांस्य पदक जीत कर कोल्हापुर जैसे सुदूर ग्रामीण अंचल में खेलों के प्रति बढ़ते जूनून पर सबका ध्यान खींचा। यह ध्यानाकर्षण इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रीय स्तर पर जब खेलों की बात होती है तो हरियाणा और पंजाब का नाम आता है, मगर खेलों को प्रोत्साहन देने के लिहाज से भारत के कुछ और हिस्से हैं, जहां नई खेल प्रतिभाओं के लिए अच्छी संभावनाएं हैं और ऐसे कई मौके आए जब खेलों के मामले में कोल्हापुर की तुलना पंजाब और हरियाणा जैसे अग्रणी राज्यों के प्रदर्शन से की गई।
युवाओं के जोश, उत्साह और परिश्रम की कहानी
कोल्हापुर के एक छोटे-से गांव कंबलवाड़ी के मामूली किसान परिवार में जन्मे स्वप्निल कुसाले की सफलता की पूरी यात्रा दरअसल अपने पीछे यहां पर खेलों को लेकर युवाओं के जोश, उत्साह और परिश्रम की कहानी से जुड़ी हुई है। ऐसा इसलिए कि कभी कुश्ती और फुटबाल के लिए पागल कोल्हापुर में कुछ सालों से शूटिंग के कई स्टार पैदा हो रहे हैं। यहां के लोकप्रिय दुधारी राइफल शूटिंग प्रशिक्षण केंद्र से जुड़े कुछ ग्रामीण युवा खिलाड़ी राष्ट्रीय से लेकर विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्धाओं में हिस्सा ले रहे हैं, जिसकी स्थापना 1960 में कोल्हापुर को राइफल शूटिंग का हब बनाने के मकसद से 'नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया' के वाइस-प्रसिडेंस रहे स्वर्गीय जयसिंह ने की थी। इसके बाद कोल्हापुर में कई प्रशिक्षण संस्थान खुले और तब से कोल्हापुर के 50 से ज्यादा निशानेबाज ऐसे हैं जो राष्ट्रीय से लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर तक भारत के लिए खेल चुके हैं।
स्वप्निल से पहले तेजस्विनी सावंत ने 2010 को विश्व निशानेबाजी प्रतिस्पर्धा की 50 मीटर राइफल शूटिंग में भारत के लिए स्वर्ण-पदक जीता था। बेहद साधारण परिवार से आने वाली तेजस्विनी को एक समय राइफल खरीदने के लिए कर्ज लेना पड़ा था। इसी क्रम में कोल्हापुर की ही एक और महिला निशानेबाज राही सरनोबत भी अपनी उपलब्धियों को लेकर काफी चर्चा में रहीं। तेजस्विनी को अपना आदर्श मानने वाली राही ने 2010 व 2014 के राष्ट्रमंडल खेलों में पिस्टल शूटिंग के लिए स्वर्ण-पदक और 2013 व 2019 की विश्व निशानेबाजी प्रतिस्पर्धाओं में भी पिस्टल शूटिंग के लिए स्वर्ण-पदक हासिल किए।
खेल में नई पीढ़ी अब तैयार हो रही
कोल्हापुर में निशानेबाजी की इसी क्षमता, लोकप्रियता और लगन से प्रेरित होकर इसी खेल में नई पीढ़ी अब तैयार हो रही है। राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाजी प्रतिस्पर्धा में सहभागी रहीं कोल्हापुर जिले की 16 वर्षीय खिलाड़ी वैष्णवी कोरबी कहती हैं कि शूटिंग के प्रति उनका प्यार ऐसा है कि उन्हें यह कभी काम जैसा नहीं लगता और उन्हें अभ्यास के लिए आमतौर पर छुट्टी की जरूरत नहीं होती। उनकी दिनचर्या में फिजियो सेशन, वर्कआउट, मानसिक दिनचर्या और सख्त आहार शामिल हैं। मानसिक दिनचर्या में ध्यान और विज़ुअलाइजेशन शामिल है। विज़ुअलाइजेशन का अभ्यास करते समय वे खुद को आगामी मैचों में शॉट्स पर सही निशाना लगाते हुए देखती हैं। वे बताती हैं, "ऐसा मुझे मैचों के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है। शूटिंग 90 प्रतिशत मानसिक प्रयास है।"
देखा जाए तो निशानेबाजी यहां के ग्रामीण और निम्न-मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बहुत महंगा खेल है, क्योंकि 10 मीटर श्रेणी की एयर पिस्टल किराए पर लेने की लागत लगभग 7 हजार रुपये प्रति माह हो सकती है, जबकि एयर राइफल 12 से 60 हजार रुपये में किराए पर ली जा सकती है। राइफल शूटिंग के लिए बॉडी सूट और अन्य उपकरणों की भी आवश्यकता होती है। वहीं, 25 मीटर श्रेणी में बंदूक उपयोगकर्ताओं को औपचारिक खेल लाइसेंस की आवश्यकता होती है। बंदूक का किराया भी अधिक है, जो 15 हजार रुपये प्रति माह है। बंदूक खरीदने में 80 हजार रुपये से लेकर कई लाख रुपये तक खर्च हो सकते हैं। इसके अलावा कोचिंग फीस, रेंज फीस, डाइट प्लान और प्रतियोगिताओं में भागीदारी से जुड़े खर्च भी हैं, जिनकी कुल लागत कम से कम 40 हजार रुपये प्रति माह तक हो सकती है।
मुंबई में आयोजित निशानेबाजी की राज्य स्तरीय प्रतिस्पर्धा के दौरान लक्ष्य साधते निशानेबाज।
- फोटो : शिरीष खरे
खेलों में विविधता की मिसाल
कुछ खेलों से राज्यों की पहचान होती है। उदाहरण के लिए हॉकी में पंजाब, कुश्ती में हरियाणा, कबड्डी में उत्तर-प्रदेश, फुटबॉल में पश्चिम बंगाल, बैडमिंटन में आंध्र प्रदेश, टेनिस में तमिलनाडु, तीरांदाजी में ओडिशा और झारखण्ड। लेकिन, कोल्हापुर जैसा एक जिला इस मायने में खास है कि यहां एक साथ कई खेलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी तैयार हुए हैं।
बता दें कि गणपतराव अंधलकर, शैलजा सालुंखे, तेजस्विनी सावंत, राही सरनोबत, वीरधवल खाड़े, अनिकेत जाधव, निखिल कदम, स्वप्निल पाटिल जैसे अलग-अलग खेलों से संबंध रखने वाले अर्जुन पुरस्कार विजेता खिलाड़ी इसी मिट्टी से हैं।
कुश्ती की परंपरा इस बात की गवाही देने के लिए काफी है कि कोल्हापुर की लाल मिट्टी में खेले जाने वाला यह खेल ग्रामीण इलाके में लाखों दर्शकों जुटाने में समर्थ है। दरअसल, जब आप कोल्हापुर को खेल से जोड़ते हैं तो सबसे पहली चीज जो दिमाग में आती है वह है कुश्ती। राजाश्रय ने उन्हें एक ठोस आधार दिया। यहां की स्वस्थ हवा, स्वस्थ भोजन और उचित मार्गदर्शन के कारण कुश्ती ने यहां जड़ें जमा लीं। खासबाग मैदान के मशहूर पहलवानों का एक अलग ही इतिहास है। शाहूजी महाराज ने कुश्ती मैच जीतने के बाद इमामबक्श उर्फ धक्ता गामा को चांदी की गदा से पुरस्कृत किया था और इस तरह यहां एक परंपरा शुरू हुई। हिंदकेसरी श्रीपति खंचनाले, हिंदकेसरी दीनानाथ सिंह, हिंदकेसरी गणपतराव अंडालकर, रुस्तम-ए-हिंद दादू चौगले, राष्ट्रमंडल स्वर्ण पदक विजेता राम सारंग ने कोल्हापुर कुश्ती का झंडा पूरी दुनिया में फहराया।
घर-घर कुश्ती और फुटबॉल
जिस तरह कुश्ती ने कोल्हापुर की लाल मिट्टी में जड़ें जमाईं, उसी तरह फुटबॉल के खेल ने घर-घर में जड़ें जमा लीं। द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान जर्मन आक्रमण के बाद पोलिश शरणार्थियों का एक समूह कोल्हापुर आया। जब से उन्होंने कोल्हापुर के लोगों को यह खेल खेलना सिखाया, तब से यहां के युवा आज तक फुटबॉल के पीछे भाग रहे हैं। बात 1936 की है, ब्रिटिश सैनिकों की एक टुकड़ी कोल्हापुर में रहने आई। फिर यहां की फुटबॉल टीम ने उनकी टीम का सामना किया और मैच 1-1 से बराबर कर लिया। तब से फुटबॉल के खेल को कई प्रकार के खिलाड़ियों ने गौरवान्वित किया है। यहां के कई खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। बता दें कि ईस्ट बंगाल फुटबॉल क्लब के साथ 2.5 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट साइन करने वाले अनिकेत जाधव भी कोल्हापुर के हैं।
कोल्हापुर एक ऐसा जिला है जहां कई खेलों ने जड़ें जमाईं और फले-फूले। इसीलिए कोल्हापुर खेलों का घर बन गया। यहां के खिलाड़ियों के कौशल ने न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी छाप छोड़ी है। प्रथम ओलंपिक पदक विजेता खाशाबा जाधव ने कोल्हापुर में प्रशिक्षण लिया और शहर को विश्व खेल मानचित्र पर स्थापित किया।
कोल्हापुर के खेलप्रेमी राजाओं का योगदान
कोल्हापुर में विभिन्न खेलों की शुरुआत और ग्रामीण खेल प्रतिभाओं को तलाशने-तराशने के लिए राजाश्रय को श्रेय दिया जाना चाहिए। कोल्हापुर के खेल-प्रेमी राजाओं ने न केवल खेल के प्रति जुनून को बढ़ावा दिया, बल्कि खेलों के लिए उन्होंने बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया और इसके लिए पर्याप्त वित्तीय योगदान भी दिया।
कोल्हापुर नहीं बल्कि पश्चिमी महाराष्ट्र की खेल परंपरा को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने यहां एक सरकारी खेल परिसर शुरू करने का फैसला किया था। वर्ष 2009 में पांच जिलों अर्थात् कोल्हापुर, सांगली, सतारा, रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग के लिए एक पूर्ण संभागीय खेल परिसर शुरू करने के लिए 17 एकड़ भूमि खेल विभाग को हस्तांतरित की गई थी। तुरंत काम शुरू भी हो गया था। लेकिन, जो पहल आमतौर पर सरकारी कामकाज में दिखती है वो यहां भी दिखी। हालांकि, 23 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, फिर भी कॉम्प्लेक्स पूरा नहीं कहा जा सकता।
दुखद है कि वित्तीय गड़बड़ी से परिसर बदनाम हो रहा है। वहां जो सुविधाएं हैं भी वे खिलाड़ियों के लिए सही नहीं बताई जा रही हैं। हालांकि, इसमें कबड्डी, फुटबॉल, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल, खो-खो, टेनिस, रनिंग ट्रैक, शूटिंग रेंज, स्विमिंग पूल, इनडोर ग्राउंड और विकलांगों के लिए अलग स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का प्रावधान है, साथ ही हॉकी प्लेयर हॉस्टल जैसी व्यवस्थाएं हैं, पर सवाल है कि यह कब पूरा होगा?
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