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Girls Coming From Villages To Learn Boxing An Army Of Women Boxers Is Being Prepared In This Rural Area
गांवों से बॉक्सिंग सीखने आ रही लड़कियां : यूपी के ग्रामीण इलाके में तैयार हो रही महिला बॉक्सर्स की फौज
शैलेश अरोड़ा, लखनऊ
Published by: Shailesh Arora
Updated Tue, 12 Dec 2023 01:46 PM IST
सार
कोई दस किलोमीटर साइकिल से आता है, तो कोई बीस किलोमीटर दूर से। किसी को भाई का साथ मिला, तो किसी को पिता का। आज गांव की बेटियां घरों से अकेले निकलकर ग्लव्स पहन बॉक्सिंग रिंग में उतर रही हैं। आंखों में ओलंपिक का सपना संजोए ये बेटियां मनचलों के छक्के छुड़ाने का भी दम रखती हैं।
मनचलों को पंच मारकर चित्त करने के लिए तैयार रहती हैं गांव की ये बेटियां।
- फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
लखनऊ के मलिहाबाद में आम के बगीचे में बने बॉक्सिंग रिंग में मुक्केबाजी करती बेटियों के पंच की आवाज दूर तक गूंज रही है। बॉक्सिंग करती ये बेटियां अब मनचलों से डरती नहीं हैं, बल्कि पंच मारकर उन्हें चित करने का हौसला रखती हैं। महिलहाबाद में चल रही जोश बॉक्सिंग एकेडमी ने पिछले सात साल में कई महिला बॉक्सर दिए हैं। यहां आने वाली कई गांवों की बेटियों ने राज्य स्तर पर बॉक्सिंग में गोल्ड मेडल तक जीते हैं।
मलिहाबाद से अब राष्ट्रीय स्तर तक की महिला बॉक्सर भी निकल रही हैं। इतने वर्षों में यह बदलाव जरूर आया कि जो लड़कियां पहले आम के पेड़ों पर लटके पंचिंग बैग पर प्रैक्टिस करती थीं, आज वो यहां पर बने बॉक्सिंग रिंग में अपने पंच चलाते नजर आती हैं। जोश बॉक्सिंग एकेडमी में इस समय 87 लड़कियां बॉक्सिंग का निःशुल्क प्रशिक्षण ले रही हैं। इनमें कई बेटियां पिछले 4-5 साल से आ रही हैं।
आम के बागों के बीच बने रिंग में बॉक्सिंग करती लड़कियां
- फोटो : गांव जंक्शन
पेड़ों पर पंचिंग बैग, चप्पल के ग्लव्स
इन बेटियों का एक ही सपना है कि वो ओलंपिक में मेडल जीतकर देश का नाम रोशन करें। इनके सपनों को पंख दिए हैं इसी क्षेत्र में रहने वाले 49 साल के मो. सैफ खान ने। कुछ साल पहले जब सैफ ने लड़कियों को बॉक्सिंग सिखाना शुरु किया तो उनके पास कोई बॉक्सिंग रिंग नहीं था। इसीलिए, अपने आम के बाग में पेड़ों पर पंचिंग बैग लटकाकर वह प्रशिक्षण देते थे। ग्लव्स नहीं थे, तो लड़कियों ने चप्पल को ही हाथ में ग्लव्स की तरह पहन लिया।
जब लड़कियों ने राज्य स्तर पर परचम लहराया तो कुछ संस्थाओं ने सहयोग दिया। इसी साल यहां एक बॉक्सिंग रिंग बनाया गया है। अब तो आसपास के स्कूलों की लड़कियां आते-जाते खुद ही यहां रुक जाती हैं और देर तक बॉक्सिंग करने वाली बेटियों को देखती रहती है। बॉक्सर बेटियों को देखकर दूसरी लड़कियां भी इस खेल की ओर अब आकर्षित हो रही हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।
रेप की घटना के बाद सैफ ने गांव की लड़कियों को सेल्फ डिफेंस के लिए बॉक्सिंग सिखाना शुरू किया
- फोटो : गांव जंक्शन
ऐसे बनता गया कारवां
राष्ट्रीय स्तर पर बॉक्सिंग कर चुके सैफ बताते हैं, मेरी उम्र 17 साल थी जब माइक टाइसन से प्रभावित होकर बॉक्सिंग की दुनिया में प्रवेश किया। अपने 13 साल के बॉक्सिंग कॅरियर में जिला, मंडल, राज्य स्तर तक बॉक्सिंग प्रतियोगिताओं में मेडल जीते। हल्द्वानी में आरएस बिष्ट नेशनल बॉक्सिंग चैंपियनशिप तक खेलने गए। लेकिन, हालात कुछ ऐसे बने कि बॉक्सिंग छोड़कर अपने आम के बागों और घर की खेती में जुटना पड़ा। सैफ बताते हैं, मुक्केबाजी छूटने के बाद कभी सोचा नहीं था कि फिर से बॉक्सिंग ग्लव्स पहनूंगा।
साल 2007-08 के दौरान कुछ ऐसी घटना हुई कि एक बार फिर मो. सैफ खान ने बॉक्सिंग ग्लव्स उठा लिए और लड़कियों को बॉक्सिंग सिखाने का प्रण लिया। उन दिनों कच्छा-बनियान गिरोह का काफी आतंक था। अखबार में डकैती और रेप की खबरें आम हो गईं थीं। एक दिन उनके पड़ोस में रहने वाले एक परिवार के यहां डकैती हुई।
सैफ उस परिवार से मिले तो पता चला की लुटेरों ने उस परिवार की बेटी का रेप भी किया। जब सैफ ने उस परिवार से एफआईआर कराने को कहा, तो उन्होंने बदनामी के डर से ऐसा नहीं किया। इस घटना ने सैफ को अंदर तक झकझोर दिया। तभी सैफ ने लड़कियों को सेल्फ डिफेंस के लिए बॉक्सिंग सिखाने का फैसला लिया।
आसपास के स्कूल की लड़कियां भी आते-जाते बॉक्सिंग रिंग में पहुंच जाती हैं
- फोटो : गांव जंक्शन
आसान नहीं था यह सफर
सैफ बताते हैं, लड़कियों को बॉक्सिंग सिखाने का फैसला तो ले लिया, लेकिन यह राह आसान नहीं थी। शुरू में कई साल जब आसपास के गांवों में लोगों के घर जाकर कहते कि उनकी बेटी को बॉक्सिंग सिखाना चाहते हैं, तो लोग राजी नहीं होते थे। कई साल इसी तरह बीत गए। साल 2016 में फिरोजपुर गांव की 14 साल की लड़की बीनू रावत बॉक्सिंग सीखने आई। वो इस बॉक्सिंग एकेडमी की पहली लड़की थी। इसके बाद दूसरे गांवों से भी कुछ अन्य लड़कियां आने लगीं। इस समय यहां कुल 87 लड़कियां बॉक्सिंग सीखने आती हैं।
एकेडमी में निःशुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है। इसका खर्च सैफ अपने आम के बाग और खेती से होने वाली आमदनी से उठाते हैं। अब कुछ संस्थाएं भी सहयोग कर रही हैं, जिससे बॉक्सिंग रिंग, दस्ताने, पैड, हेडगार्ड जैसी चीजें आ गई हैं। लड़कियों के लिए चेंजिंग रूम, वॉशरूम, कसरत के कुछ सामान की व्यवस्था हुई है।
यहां बॉक्सिंग सीखने वाली कई लड़कियां मेडल जीत चुकी हैं
- फोटो : गांव जंक्शन
जीते गोल्ड और सिल्वर मेडल
पास के ही भुलसी गांव की शिवानी चार साल से बॉक्सिंग सीखने आ रही है। उन्होंने राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में सिल्वर मेडल जीता है और अब नेशनल की तैयारी कर रही है। बॉक्सिंग के साथ वह बीए की पढ़ाई भी कर रही है। शिवानी ने बताया, हमारा गांव आठ किलोमीटर दूर है, हम रोज सुबह और शाम साइकिल से प्रैक्टिस करने आते हैं। इतना आत्मविश्वास आ गया है कि अब किसी की हिम्मत नहीं पड़ती कि छेड़ने की सोचे भी। एक बार तो छेड़खानी करने पर मनचले को मुक्का मार चुकी हूं।
रोहतक में ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाली कसमंडी कलां गांव निवासी मोनिका इंटर की छात्रा है। वह चार साल से यहां बॉक्सिंग सीख रही है। इस दौरान 5 बार जिलास्तर पर खेला और दो बेस्ट बॉक्सर के पुरस्कार जीते। दो बार वह राज्य में तीसरे स्थान पर रही है। मोनिका बताती हैं, पहले अकेले जाने में डर लगता था, पर अब डर नहीं लगता। कोई बोलेगा तो जवाब दे सकते हैं, उन्हें मार भी सकते हैं।
बीएससी की छात्रा प्रीति पाल तो 15 किलोमीटर दूर माल के बांझी गांव से यहां बॉक्सिंग सीखने आती हैं। एक साल से प्रैक्टिस कर रही प्रतिभा बताती हैं, उनके लिए यहां आना आसान नहीं है। मां और पिताजी रोज रोकते हैं। कहते हैं, हाथ-पैर टूट जाएंगे। लेकिन, बड़े भाई का सपोर्ट है, जिसके चलते यहां आ पाती हूं।
बेटियों को सक्षम बनाने का लक्ष्य
ट्रेनिंग फ्री होने से राहत जरूर है। लेकिन, गांव की लड़कियों के लिए घर से निकलना मुश्किल होता है। बॉक्सिंग जैसे खेल के लिए परिजनों को समझाना और भी कठिन है। सैफ कहते हैं, मेरा लक्ष्य यही है कि हर लड़की आत्मनिर्भर बने। ये लड़कियां ओलंपिक में मेडल जीतें और देश का नाम रोशन करें।
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