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बजट 2026: खर्च में कटौती से कृषि - ग्रामीण विकास पर पड़ेगा असर, आमदनी बढ़ेगी तभी बाजार भी होंगे गुलजार

प्रो. अरुण कुमार, अर्थशास्त्री Published by: Snehlata Shukla Updated Mon, 02 Feb 2026 12:57 AM IST
सार

जीडीपी के अनुपात में खर्च कम हो रहा है। दो साल पहले यह 14.3% था, पिछले साल यह 14.2% रहा। इस साल यह घटकर 13.6% पर आ गया है। जब खर्च ही कम होगा, तो अर्थव्यवस्था में मांग कैसे पैदा होगी? यह कटौती अंततः कृषि और ग्रामीण विकास को प्रभावित करती है। मांग बढ़ाने के लिए आमदनी भी बढ़नी चाहिए। 

बजट में खर्च कम होगा तो मांग भी कम बढ़ेगी। मांग बढ़ाने के लिए रोजगार और आमदनी भी बढ़नी चाहिए।
बजट में खर्च कम होगा तो मांग भी कम बढ़ेगी। मांग बढ़ाने के लिए रोजगार और आमदनी भी बढ़नी चाहिए। - फोटो : गांव जंक्शन

विस्तार

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजट 2026 बजट में ग्रामीण भारत के लिए किए गए प्रावधान 'ऊंट के मुंह में जीरा' साबित हो सकते हैं और वास्तविक खर्चों में लगातार हो रही कटौती गांवों की कमर तोड़ सकती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या 'मांग में कमी' है। जब तक लोगों की आमदनी नहीं बढ़ेगी, तब तक बाजार में रौनक नहीं आएगी। सरकार द्वारा पेश किए गए 7.5% विकास दर के आंकड़े केवल संगठित क्षेत्र की तस्वीर पेश करते हैं, जबकि कृषि और असंगठित क्षेत्र, जो देश की बड़ी आबादी का आधार हैं, इसमें नजर नहीं आते। कृषि क्षेत्र में खुशहाली लानी है, तो वहां रोजगार और आमदनी को बढ़ाना अनिवार्य होगा।

जीडीपी के अनुपात में घटता खर्च
बजट के विश्लेषण से पता चलता है कि कुल खर्च जीडीपी के प्रतिशत के रूप में लगातार कम हो रहा है। दो साल पहले यह 14.3% था, पिछले साल यह 14.2% रहा। इस साल यह घटकर 13.6% पर आ गया है। जब खर्च ही कम होगा, तो अर्थव्यवस्था में मांग कैसे पैदा होगी? यह कटौती अंततः कृषि और ग्रामीण विकास को प्रभावित करती है।

बजट बनाम वास्तविक खर्च
बजट का एक चिंताजनक पहलू यह है कि सरकार प्रावधान तो बड़ा दिखाती है, लेकिन वास्तव में उतना पैसा खर्च नहीं किया जाता। इसे 'बजट की ट्रिक' कहा जा रहा है।

ग्रामीण विकास : पिछले साल 2.65 लाख करोड़ का प्रावधान था, लेकिन खर्च केवल 2.12 लाख करोड़ हुआ (53,000 करोड़ की कटौती)।
पीएम आवास योजना (ग्रामीण) : 54,800 करोड़ के प्रावधान के मुकाबले केवल 32,500 करोड़ ही खर्च किए गए, जो लगभग 40% की कटौती है।
कृषि और संबद्ध गतिविधियां : इसमें भी वास्तविक खर्च आवंटित बजट से 7,000 करोड़ रुपये कम रहा।

किसानों के लिए जीवनरेखा मानी जाने वाली कई योजनाओं के बजट में भी गिरावट देखी गई है। 
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना : 8,500 करोड़ आवंटित हुए थे, लेकिन खर्च केवल 7,000 करोड़ हुआ। अगले साल का लक्ष्य भी मुद्रास्फीति (Inflation) को देखते हुए पर्याप्त नहीं है।
कृषि सिंचाई योजना: 8,260 करोड़ के मुकाबले केवल 6,300 करोड़ खर्च हुए।
मत्स्य संपदा योजना : इसमें लगभग 25% की भारी कटौती की गई।

एआई (AI) और बढ़ती बेरोजगारी का डर
बजट में तकनीक और एआई (Artificial Intelligence) पर जोर दिया गया है, लेकिन ग्रामीण भारत के संदर्भ में यह एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है। एआई और मशीनीकरण से गांवों में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ सकती है क्योंकि यह मानवीय श्रम को विस्थापित कर देगा। पहले से ही कृषि में मशीनीकरण की वजह से मजदूरों का पलायन जारी है, ऐसे में गैर-कृषि रोजगार (Non-farm employment) पैदा करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होनी चाहिए थी, जिसकी बजट में कमी दिखती है।

मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा का बुरा हाल
ग्रामीण भारत में काम करने वाले श्रमिकों की स्थिति चिंताजनक है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में मिड-डे मील (पीएम पोषण) बनाने वाले रसोइयों को मात्र 66 रुपये प्रतिदिन (2000 रुपये प्रति माह) मिल रहे हैं। सामाजिक सुरक्षा और जन कल्याण योजनाओं के बजट में भी लगभग 10,000 करोड़ रुपये की कमी की गई है।

(प्रोफेसर अरुण कुमार से स्नेहलता शुक्ला की बातचीत पर आधारित)