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Poultry Farming Big Increase In The Production Of Poultry Meat Know How It Can Be Made A Source Of Income
मुर्गी पालन: पोल्ट्री मांस के उत्पादन में बड़ा इजाफा, जानें कैसे बना सकते हैं इसे कमाई का जरिया
डॉ. अशोक कुमार तिवारी, निदेशक, केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान
Published by: Himanshu Mishra
Updated Tue, 19 Dec 2023 09:13 AM IST
सार
मुर्गी पालन आमदनी का एक मुख्य साधन है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान कर रहा है। पिछले कुछ दशकों में, भारत ने मुर्गी पालन के क्षेत्र में लगातार प्रगति की है।
मुर्गी पालन
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
आधारभूत पशुपालन सांख्यिकी (बीएएचएस)-2022 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में इस वर्ष लगभग 129.60 अरब अंडों का उत्पादन हुआ। इसमें वाणिज्यिक कुक्कुट पालन से वार्षिक रूप से 109.93 अरब और घरेलू कुक्कुट पालन से सालाना 19.67 अरब अंडे उत्पन्न हुए हैं। पिछले साल की तुलना में अंडा उत्पादन में 6.19% की भारी वृद्धि दर्ज की गई। इसी के चलते भारत अब सर्वाधिक अंडा उत्पादक देशों में तीसरे स्थान पर आ चुका है।
इसके अलावा, भारत में वर्षिक रूप से करीब 93 लाख टन मांस उत्पन्न होता है, जिसमें लगभग 50 लाख टन पोल्ट्री मांस शामिल है। ये कुल मांस उत्पादन का 50 प्रतिशत से अधिक भाग है। इसी के साथ भारत सर्वाधिक पोल्ट्री मांस उत्पादक देशों में पांचवे स्थान पर है। पोल्ट्री मांस के उत्पादन में पिछले साल की तुलना में 6.86% की वृद्धि दर्ज की गई है। तथ्यों के आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि मुर्गी पालन भारत की अर्थव्यवस्था में एक अभिन्न सहयोग प्रदान कर रहा है।
बैक्यार्ड मुर्गी पालन
बैक्यार्ड मुर्गी पालन, जो कई भारतीय घरों में एक पारंपरिक प्रथा है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को सशक्त बनाने के एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में पुनर्जीवित हो रही है। इसमें अपने घर के पिछले भाग या घर से सटे जमीन के एक छोटे टुकड़े में मुर्गियों, बत्तखों या अन्य कुक्कुट पक्षियों का एक छोटा झुंड पाला जाता है।
बैक्यार्ड मुर्गी पालन ग्रामीण परिवारों को आय का एक स्थायी और लागत प्रभावी एवं अतिरिक्त स्रोत प्रदान करता है। इससे उन्हें अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलती है। इस अतिरिक्त आय का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और उनके जीवन स्तर में सुधार सहित विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।
कम निवेश, अधिक रिटर्न
बैक्यार्ड मुर्गी पालन की विशेषता इसकी कम निवेश आवश्यकताएं हैं। किसान छोटी संख्या में मुर्गी पालन की शुरुआत कर सकते हैं और धीरे-धीरे अपने झुंड का विस्तार कर सकते हैं। यह संसाधन की कमी वाले ऐसे किसानों के लिए एक टिकाऊ उद्यम है, जिनकी बड़े पैमाने पर व्यावसायिक खेती तक पहुंच नहीं होती है। हालांकि, बैक्यार्ड मुर्गी पालन पारंपरिक कृषि पद्धतियों में निहित है, फिर भी इसमें आधुनिक पद्धतियों का उपयोग कर अधिक लाभान्वित हुआ जा सकता है। किसान अपनी मुर्गी पालन की उत्पादकता में सुधार के लिए बेहतर रोग नियंत्रण, पोषण प्रबंधन और ब्रीडिंग पालिसी के लिए वैज्ञानिक तरीकों को शामिल कर सकते हैं।
सीएआरआई ने शोध को दिया बढ़ावा
मुर्गी पालन के क्षेत्र में शोध कार्य भी तेजी से हो रहे हैं। ऐसा इसलिए ताकि कम संसाधनों में मुर्गी पालक को अच्छा मुनाफा मिल सके। इसके लिए उत्तर प्रदेश के बरेली में स्थित आईसीएआर-केन्द्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (सीएआरआई), कुक्कट विज्ञान में अनुसंधान और विकास कार्य काफी हो रहे हैं। यहां स्थानीय पर्यावरण के लिए उपयुक्त स्वदेशी पोल्ट्री नस्लों को विकसित किया जा रहा है।
ये नस्लें अधिक रोग-प्रतिरोधी हैं और इनमें बेहतर प्रजनन क्षमताएं हैं, जो उन्हें बैकयार्ड मुर्गी-पालकों के लिए एक उत्कृष्ट विकल्प बनाती हैं। वैज्ञानिकों के शोध के चलते पिछले कुछ दशकों में बैक्यार्ड मुर्गी पालन को करोड़ों रुपये के उद्योग में परिवर्तित करने में सफलता मिली है।
तैयार की गईं कई नस्लें
सीएआरआई में विभिन्न नस्लें उत्पन्न की गई हैं, जिनमे अंडे देने वाली मुर्गियों में कैरी प्रिया, कैरी सोनाली, द्विउद्देशीय कैरी देबेन्द्र, ब्रायलर में कैरीब्रो विशाल, कैरीब्रो धनराजा, कैरी ट्रोपिकाना, कैरी मृत्युंजय शामिल हैं। इसके साथ ही, देसी नस्लों को कैरी रेड के साथ क्रॉस कराकर विकसित देसी वैरायटी - कैरी निर्भीक, कैरी श्यामा, कैरी उपकारी एवं हितकारी आदि तैयार की गई हंै। इनका उपयोग बैकयार्ड मुर्गी पालन को उन्नत रूप में अपनाने के लिए फायदे का साधन माना जा सकता है। मुर्गियों के अलावा, बटेर की उन्नत नस्लें जैसे - कैरी पर्ल, कैरी उत्तम, कैरी उज्ज्वल, कैरी सुनहरी, कैरी ब्राउन, कैरी श्वेता एवं टर्की की कैरी विराट आदि नस्लें भी विकसित की गई हैं।
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