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डेयरी में बड़ी क्रांति: जीनोमिक सेलेक्शन से देश के पहले सुपर बुल वृषभ का जन्म, खासियत जानकर चौंक जाएंगे

गांव जंक्शन डेस्क, नोएडा Published by: Himanshu Mishra Updated Mon, 15 Sep 2025 09:32 AM IST
सार

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) ने घोषणा की है कि देश का पहला सुपर बुल ‘वृषभ’ जीनोमिक चयन (Genomic Selection) और इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन–एंब्रियो ट्रांसफर (IVF-ET) तकनीक से पैदा हुआ है। यह सफलता राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत पायलट परियोजना का हिस्सा है।

सुपर बुल ‘वृषभ’
सुपर बुल ‘वृषभ’ - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भारतीय डेयरी क्षेत्र में एक नई क्रांति की शुरुआत हो चुकी है। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) ने घोषणा की है कि देश का पहला सुपर बुल ‘वृषभ’ जीनोमिक चयन (Genomic Selection) और इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन–एंब्रियो ट्रांसफर (IVF-ET) तकनीक के जरिए पैदा हुआ है। यह सफलता राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत चल रहे पायलट प्रोजेक्ट का हिस्सा है।

कैसे बनी यह ऐतिहासिक सफलता?
एनडीडीबी ने केवल 9 उच्च नस्लीय गायों (elite cows) से शुरुआत की थी। इनसे अब तक 124 गर्भधारण (pregnancies) स्थापित हो चुके हैं। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप गुजरात के साबर डेयरी में ‘वृषभ’ नामक पहला बछड़ा जन्मा है।

‘वृषभ’ क्यों खास है?
  1. इस बछड़े का जीनोमिक ब्रीडिंग वैल्यू (GBV) 932.5 किलोग्राम है।
  2. यह औसत जीबीवी से चार गुना ज्यादा है।
तुलना करें तो...
  1. HFCB प्रोजेक्ट में पैदा हुए नर बछड़ों का औसत GBV: 461.34 किग्रा
  2. देशभर के सीमन स्टेशनों पर औसत GBV: 227 किग्रा
क्या है इसका मतलब?
उच्च GBV का अर्थ है कि यह बैल भविष्य में ऐसे मादा गोवंश को जन्म देने में सक्षम होगा, जो अधिक दूध उत्पादन करेंगी। यानी ‘वृषभ’ भारतीय डेयरी किसानों, खासकर छोटे पशुपालकों के लिए दूध उत्पादन बढ़ाने की कुंजी साबित होगा।

डेयरी क्षेत्र के लिए क्या बदलाव आएगा?
  • छोटे किसानों की आय में वृद्धि होगी।
  • देश को दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भरता (Atmanirbhar Bharat) की दिशा में मजबूती मिलेगी।
  • भारत वैश्विक स्तर पर डेयरी ब्रांडिंग और जेनेटिक एडवांसमेंट में अग्रणी बन सकेगा।
  • पशुपालन क्षेत्र में तेज, सटीक और आधुनिक जेनेटिक सुधार संभव होगा।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
एनडीडीबी का मानना है कि यह तकनीक भारतीय डेयरी सिस्टम को “जेनेटिक्स, फास्टर, स्मार्टर, बेटर” दिशा में ले जाएगी। यानी भविष्य में दूध उत्पादन के लिए वर्षों का इंतजार नहीं, बल्कि कुछ ही पीढ़ियों में बड़ा सुधार देखने को मिलेगा।