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Feed Inflation Emerges As Biggest Challenge For Dairy Farmers Small Producers Under Severe Pressure Nova Dairy Director
Dairy: डेयरी किसानों के लिए पशु आहार महंगाई का बड़ा संकट, छोटे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित
गांव जंक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: Himanshu Mishra
Updated Tue, 06 Jan 2026 02:17 PM IST
सार
पिछले एक साल में 4-6 पशुओं वाले छोटे किसानों के लिए उत्पादकता बनाए रखना बेहद मुश्किल हो गया है। इस स्थिति से निपटने के लिए बेहतर चारा योजना, साइलिज का व्यापक उपयोग और महंगाई के दौर में समय पर सरकारी हस्तक्षेप जरूरी है।
पशु चारा
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
देश के डेयरी सेक्टर में किसानों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। मक्का, सोयाबीन मील, कपास खली और हरे चारे जैसी सभी प्रमुख इनपुट लागतों में तेज़ बढ़ोतरी ने पशु आहार को महंगा कर दिया है। इस बढ़ती महंगाई का सबसे ज्यादा असर छोटे और सीमांत डेयरी किसानों पर पड़ रहा है, जो लागत के इस झटके को झेलने में असमर्थ हैं। नोवा डेयरी (स्टर्लिंग एग्रो प्रोडक्ट्स) के निदेशक रविन सलूजा के अनुसार, फीड महंगाई आज डेयरी किसानों के लिए सबसे बड़ा तनाव बन चुकी है और इससे पूरी डेयरी वैल्यू चेन पर दबाव बढ़ गया है।
दूध की कीमतें नहीं बढ़तीं, लेकिन लागत बढ़ जाती है
मीडिया से बातचीत में रविन सलूजा ने कहा कि पशु आहार की कीमतें बढ़ने के बावजूद दूध की खरीद कीमतें तुरंत नहीं बढ़तीं। उन्होंने कहा, “दूध के दाम फीड लागत के साथ-साथ नहीं बढ़ते। जब गणित बिगड़ता है तो किसान गुणवत्ता वाला चारा कम करने लगते हैं। इसका सीधा असर दूध में फैट और एसएनएफ (सॉलिड्स-नॉट-फैट्स) पर पड़ता है और किसानों को कम भुगतान मिलता है। इस तरह किसान दोहरी मार झेलते हैं।”
पिछले एक साल में 4-6 पशुओं वाले छोटे किसानों के लिए उत्पादकता बनाए रखना बेहद मुश्किल हो गया है। सलूजा का मानना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए बेहतर चारा योजना, साइलिज़ का व्यापक उपयोग और महंगाई के दौर में समय पर सरकारी हस्तक्षेप जरूरी है।
मौसम और मिलावट भी बड़े जोखिम
सलूजा ने कहा कि फीड महंगाई के बाद दूसरा बड़ा खतरा अनियमित मौसम है, जो सीधे चारा उपलब्धता और दुग्ध उत्पादन को प्रभावित करता है। तीसरी बड़ी चुनौती असंगठित क्षेत्र से होने वाली मिलावट है, जो उपभोक्ताओं के भरोसे को कमजोर कर रही है। उनका कहना है कि दूध में मिलावट सिर्फ गुणवत्ता का ही नहीं, बल्कि पूरे उद्योग की साख का सवाल बन चुकी है।
दूध की कीमतों पर नियंत्रण से बिगड़ता है संतुलन
सरकार द्वारा उपभोक्ताओं के लिए दूध की कीमतें सीमित करने के सवाल पर सलूजा ने कहा कि यह कदम राजनीतिक रूप से आकर्षक हो सकता है, लेकिन इससे डेयरी वैल्यू चेन बिगड़ जाती है। उन्होंने कहा, “अगर एमआरपी तय कर दी जाती है, तो दबाव प्रोसेसरों और अंततः किसानों पर आता है। दूध बेहद लागत-संवेदनशील उत्पाद है, जिसमें चारा, श्रम, परिवहन, पैकेजिंग और ऊर्जा सभी लागत को प्रभावित करते हैं।” उनका मानना है कि यदि सरकार को उपभोक्ताओं की मदद करनी है, तो सीधे कम आय वाले वर्ग को सहायता देना ज्यादा बेहतर होगा। कीमतों पर नियंत्रण से न तो गुणवत्ता टिकती है और न ही निवेश को बढ़ावा मिलता है।
अस्थायी सब्सिडी नहीं, स्थायी समाधान जरूरी
सलूजा के अनुसार, फीड की कीमतों में अचानक उछाल आने पर सरकार द्वारा दी जाने वाली राहत कुछ हद तक मददगार हो सकती है, लेकिन इससे मूल समस्या हल नहीं होती। उन्होंने कहा कि निर्यात प्रतिबंध घरेलू आपूर्ति को स्थिर कर सकते हैं, लेकिन इससे वैश्विक बाजार में अवसर चूक जाते हैं। उनका कहना है कि किसानों को सबसे ज्यादा ज़रूरत है-
पशु आहार की स्थिर उपलब्धता
मजबूत पशु चिकित्सा सहायता
गुणवत्ता आधारित और पारदर्शी खरीद प्रणाली
एकमुश्त सब्सिडी के बजाय चारा उत्पादन बढ़ाने, गांव स्तर पर ढांचे को मजबूत करने और कीमतों में पारदर्शिता लाने से किसानों को ज्यादा सुरक्षा मिलेगी।
वैल्यू-एडेड डेयरी उत्पादों में अवसर
सलूजा ने बताया कि पनीर, दही, फ्लेवर्ड मिल्क, घी और स्पेशलाइज्ड मिल्क पाउडर जैसे वैल्यू-एडेड उत्पादों में तेज़ वृद्धि हो रही है। निर्यात के क्षेत्र में भी संभावनाएं मजबूत हैं, बशर्ते वैश्विक कीमतें स्थिर रहें। उनका कहना है कि तकनीक आधारित खरीद, गुणवत्ता परीक्षण और ट्रेसबिलिटी से पूरी सप्लाई चेन की दक्षता बढ़ सकती है।
डेयरी सेक्टर में जरूरी संरचनात्मक सुधार
रविन सलूजा के अनुसार, डेयरी उद्योग में तीन बड़े सुधार अनिवार्य हैं-
गांव स्तर पर एक समान गुणवत्ता आधारित भुगतान प्रणाली, जिसमें फैट और एसएनएफ की सटीक जांच हो।
खरीद और शीतलन ढांचे को मजबूत करना ताकि नुकसान और बिचौलियों की भूमिका घटे।
अधिशेष उत्पादन वाले क्षेत्रों में प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाना, ताकि फ्लश सीजन में किसानों को औने-पौने दाम न मिलें।
मिलावट से उद्योग को भारी नुकसान
सलूजा ने कहा कि दूध में मिलावट जितनी दिखाई देती है, उससे कहीं ज्यादा है। पानी मिलाना सबसे आम तरीका है, लेकिन कई जगह स्टार्च, यूरिया, डिटर्जेंट और न्यूट्रलाइज़र तक मिलाए जाते हैं। इससे ईमानदार प्रोसेसरों को अनुचित प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ती है और किसानों की खरीद कीमतें भी गिरती हैं। सबसे बड़ा नुकसान उपभोक्ता विश्वास को होता है।
‘दूध सरप्लस’ की हकीकत
उन्होंने कहा कि भारत का “दूध सरप्लस” होना केवल आंकड़ों की कहानी है। उत्पादन कुछ राज्यों में केंद्रित है, जबकि मांग बड़े शहरों में। इस क्षेत्रीय असंतुलन के कारण उत्पादन वाले इलाकों में किसानों को कम दाम मिलते हैं और मांग वाले क्षेत्रों में उपभोक्ताओं को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है।
स्थिरता अब विकल्प नहीं, जरूरत
सलूजा ने कहा कि डेयरी उद्योग में सस्टेनेबिलिटी अब अलग परियोजना नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के काम का हिस्सा बन चुकी है। पानी की रीसाइक्लिंग, ऊर्जा बचत, आधुनिक बॉयलर, हीट रिकवरी और बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन से लागत नियंत्रण के साथ दीर्घकालिक उत्पादकता भी बढ़ रही है।
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