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भारत की पशुपालन और डेयरी अर्थव्यवस्था लंबे समय तक पशु कल्याण को केवल एक नैतिक या भावनात्मक विषय मानती रही। बाजार, मुनाफा, जोखिम और आपूर्ति श्रृंखला से इसे अलग रखा गया। लेकिन अब यह सोच तेजी से बदल रही है। उपभोक्ता व्यवहार, रोग प्रबंधन, नियामक सख्ती और ब्रांड वैल्यू हर स्तर पर पशु कल्याण एक निर्णायक आर्थिक कारक बन चुका है। जो कंपनियां अब भी इसे ‘बाहरी मुद्दा’ समझ रही हैं, वे केवल नैतिक नहीं, बल्कि भारी वित्तीय जोखिम भी उठा रही हैं।
बाजार से जुड़ा नया सच
पशुपालन उद्योग में “लाइवस्टॉक कमोडिटी” जैसे शब्द आम हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि पशु संवेदनशील जीव हैं, न कि केवल उत्पादन इकाइयां। बीते कुछ वर्षों में अदालतों के आदेश, बीमारी के प्रकोप, उत्पाद रिकॉल और अचानक बाजार से बाहर हुई कंपनियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पशु कल्याण अब रणनीति का हिस्सा बन चुका है, न कि सिर्फ भावना का।
प्रीमियम सेगमेंट में इसका असर और भी साफ दिखता है। जो कंपनियां पहले ही बेहतर कल्याण मानकों में निवेश कर चुकी हैं, वे आज अधिक मार्जिन, स्थिर मांग और दीर्घकालिक उपभोक्ता विश्वास हासिल कर रही हैं।
उपभोक्ता बदल रहे हैं बाजार की दिशा
2024–25 के आंकड़े बताते हैं कि 40 वर्ष से कम उम्र के लगभग 70 प्रतिशत भारतीय उपभोक्ता टिकाऊ और जिम्मेदार उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं। करीब 80 प्रतिशत लोग नैतिक ब्रांड्स के समर्थन में अपनी खरीद आदत बदलने को तैयार हैं। जेन Z उपभोक्ताओं के लिए पशु कल्याण, पर्यावरणीय प्रभाव के बराबर अहम खरीद मानक बन चुका है।
डेयरी और अंडा बाजार से संकेत
भारत का डेयरी बाजार 2024 में 135.3 अरब डॉलर का रहा और 2032 तक इसके 274 अरब डॉलर पार करने का अनुमान है। इस वृद्धि का सबसे बड़ा हिस्सा प्रीमियम सेगमेंट से आ रहा है। जैविक और देसी नस्ल से जुड़े डेयरी उत्पाद 50 प्रतिशत तक अधिक कीमत पर बिक रहे हैं, वह भी महंगाई के दौर में।
इसी तरह केज-फ्री अंडों का बाजार 2024 में 441 मिलियन डॉलर का रहा, जो 2033 तक 632 मिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। ये उत्पाद 40 से 100 प्रतिशत तक प्रीमियम पर बिकते हैं और शहरी क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर “क्रूरता-मुक्त” श्रेणी में हावी हैं। उपभोक्ता प्रीमियम पशु उत्पाद खरीदते समय तीन बातों को सबसे अहम मानते हैं स्वास्थ्य लाभ, बेहतर स्वाद और यह भरोसा कि उत्पादन प्रक्रिया नैतिक है। यानी पशु कल्याण अब मूल्य प्रस्ताव का मूल हिस्सा बन चुका है।
सस्ता नहीं, महंगा पड़ रहा है कल्याण की अनदेखी
यह धारणा कि पशु कल्याण मानकों की अनदेखी से लागत बचती है, बार-बार गलत साबित हुई है। भारत में इससे होने वाले आर्थिक नुकसान तीन रास्तों से सामने आते हैं उत्पादन बाधा, रोग प्रकोप और नियामक कार्रवाई।
अफ्रीकन स्वाइन फीवर का उदाहरण
मिजोरम में 2021 से 2025 के बीच अफ्रीकन स्वाइन फीवर से ₹963 से ₹1,000 करोड़ तक का नुकसान हुआ। 72 हजार से अधिक सूअरों की मौत हुई और 53 हजार से ज्यादा को मारना पड़ा। असम में 2025 के प्रकोप ने पूर्वोत्तर के ₹8,000–10,000 करोड़ के पोर्क उद्योग को और अस्थिर किया।
विशेषज्ञों के अनुसार ये प्रकोप अचानक नहीं थे। अधिक घनत्व, भीड़भाड़, खराब वेंटिलेशन और कमजोर बायोसिक्योरिटी जैसी स्थितियां इसकी मुख्य वजह रहीं। साफ है—पशु कल्याण ही बायोसिक्योरिटी है।
डेयरी में छिपा नुकसान
भारत का डेयरी उद्योग हर साल मास्टाइटिस के कारण ₹13,000–16,700 करोड़ का नुकसान झेल रहा है। लगभग आधी दुग्धारू गायें इससे प्रभावित होती हैं। खराब आवास, गीली फर्श, भीड़ और वेंटिलेशन की कमी इस बीमारी को बढ़ावा देती है। बुनियादी कल्याण सुधार से इन नुकसानों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कानून तो पुराने हैं, सख्ती नई है
भारत में पशु कल्याण कानून नए नहीं हैं, लेकिन उनके लागू होने की रफ्तार तेज हो गई है। एफएसएसएआई की कार्रवाई, लाइसेंस निलंबन, उत्पाद जब्ती और रिकॉल की घटनाएं बढ़ी हैं। पशु कल्याण बोर्ड की 2021 की लॉ एनफोर्समेंट हैंडबुक ने उल्लंघनों को संज्ञेय अपराध की श्रेणी में लाकर प्रवर्तन को और मजबूत किया है। सुप्रीम कोर्ट भी कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि सुविधा या लागत के नाम पर पशु कल्याण से समझौता नहीं हो सकता।
2017 के लाइवस्टॉक मार्केट नियम इसका उदाहरण हैं, जब अचानक लागू नियमों ने मांस, चमड़ा और डेयरी आपूर्ति श्रृंखला को झटका दिया। सबक साफ है—देर से और दबाव में लागू सुधार सबसे महंगे साबित होते हैं।
अवसर या खतरा, चुनाव उद्योग का
पशु कल्याण कोई दान या केवल ब्रांडिंग नहीं है। यह एक ठोस बाजार अवसर, जोखिम प्रबंधन का औजार और भविष्य की रणनीति है। जो कंपनियां अभी निवेश करेंगी, वे कानूनी जोखिम घटाएंगी, बीमारी से होने वाले झटकों से बचेंगी और अपनी साख मजबूत करेंगी। जो पीछे रहीं, उन्हें मजबूरी में महंगे और प्रतिक्रियात्मक सुधार करने पड़ेंगे।