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HONEY BEE : मधुमक्खियों के संकटग्रस्त होने से खाद्य सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और कृषि उत्पादकता हो रही कमजोर

डॉ. निमिष कपूर, वैज्ञानिक एवं विज्ञान संचार विशेषज्ञ Published by: Umashankar Mishra Updated Sun, 14 Sep 2025 01:22 PM IST
सार

धरती पर जीवन की जटिल संरचना में प्रत्येक प्राणी का योगदान है। मधुमक्खियों की भूमिका इनमें अहम है। मधुमक्खियां खाद्य सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और कृषि उत्पादकता की आधारशिला हैं। मधुमक्खियों का अस्तित्व संकट में होने के कारण यह आधार कमजोर हो रहा है। 

मधुमक्खियां न हों तो हमारे आहार में उपलब्ध विविधता और पोषण दोनों प्रभावित होंगे।
मधुमक्खियां न हों तो हमारे आहार में उपलब्ध विविधता और पोषण दोनों प्रभावित होंगे। - फोटो : गांव जंक्शन

विस्तार

अल्बर्ट आइंस्टाइन का प्रसिद्ध कथन है - ‘मधुमक्खियां पृथ्वी से लुप्त हो जाएं तो मानवता चार साल से अधिक जीवित नहीं रह पाएगी।' यह कथन पूरी तरह वैज्ञानिक न भी हो तो इसकी गहराई निर्विवाद है। कई वैज्ञानिक शोधों ने चेतावनी दी है कि मधुमक्खियों की घटती संख्या अंतरराष्ट्रीय संकट बन चुका है। भारत में यह संकट अधिक बड़ा है, जहां मधुमक्खी पालन केवल शहद उत्पादन का साधन नहीं है, बल्कि यह कृषि अर्थव्यवस्था, ग्रामीण आजीविका, परागण, जैव विविधता संरक्षण और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का आधार भी है। लेकिन, मधुमक्खियों के योगदान पर टिकी यह उज्ज्वल तस्वीर खतरे से घिर चुकी है, जिसके लिए छोटे छत्ते वाले भृंग कीट जिम्मेदार हैं। 

कुख्यात शिकारी कीट का हमला 
भारत का मधुमक्खी पालन उद्योग एक बड़े खतरे का सामना कर रहा है। छोटे छत्ते वाले भृंग कीट (बीटल) ने भारत के मधुमक्खी पालन पर आक्रमण कर दिया है। भारत के लिए यह गंभीर चुनौती है, क्योंकि हमारे यहां मधुमक्खी पालन का एक बड़ा औद्योगिक और कृषि-आधारित ढांचा मौजूद है। यह कीट दुनियाभर में मधुमक्खी कालोनियों के विनाशकारी शिकारी, परजीवी और अपमार्जक के रूप में जाना जाता है। यह कीट मूलतः सहारा के दक्षिणी अफ्रीका का निवासी है। अपनी अनुकूलन क्षमता और आक्रामक प्रवृत्ति के कारण यह कीट अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, एशिया और हाल ही में भारत तक फैल चुका है। 

छोटे छत्ते वाला भृंग कीट शहद, पराग और मधुमक्खियों को खाता है, जिससे शहद सड़ जाता है और कॉलोनियां नष्ट हो जाती हैं। हाल में पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, असम और कर्नाटक में इसके प्रकोप के मामले देखे गए हैं। कई इलाकों में इस कीट ने 80 प्रतिशत तक कॉलोनियों को बर्बाद कर दिया है। इससे शहद का उत्पादन प्रभावित हुआ है, और मधुमक्खी पालकों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। विशेषज्ञ छत्तों की स्वच्छता, नियमित निगरानी और संक्रमित कॉलोनियों के नष्ट करने जैसे उपाय सुझा रहे हैं, क्योंकि अभी तक इस कीट का कोई प्रभावी जैव-नियंत्रण उपलब्ध नहीं है।

कीट के प्रकोप से 98 फीसदी तक नुकसान  
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान, रायपुर के शोधकर्ता डॉ. सौरभ माहेश्वरी के अध्ययन के अनुसार, भारत में इस कीट का संक्रमण सितंबर 2022 में पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में दर्ज किया गया। इसके बाद, वर्ष 2023 में, आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी, गुंटूर और एलुरु तथा वर्ष 2024 में गोलपाड़ा, असम में भी इसका प्रकोप देखा गया। शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिलों के सभी मधुमक्खी फार्म इस कीट से प्रभावित हुए और वहां 8 से 98 फीसदी तक नुकसान दर्ज किया गया। इस अध्ययन के मुताबिक, भारत में 12.26 लाख मधुमक्खी कॉलोनियां हैं। वहीं, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की मधुमक्खी पालन विकास समिति की रिपोर्ट (2019) में करीब 35 लाख मधुमक्खी कॉलोनियां होने की बात कही है। हालांकि, कृषि क्षेत्र की वास्तविक आवश्यकताओं के हिसाब से कम से कम 200 लाख कॉलोनियों की जरूरत है। 

छोटे छत्ते वाला भृंग कीट (बीटल) मधुमक्खियों कॉलोनियों में घुसकर अंडे, लार्वा, पराग-कण, शहद और मोम सब खा जाता है। इसके लार्वा अपने मल से छत्तों को दूषित कर देते हैं, जिससे शहद और पराग किण्वित होकर सड़ जाते हैं। यही नहीं, लार्वा मिट्टी में जाकर प्यूपा अवस्था पूरी करते हैं और फिर, नए छत्तों पर धावा बोलते हैं। इनका जीवन-चक्र केवल 3 से 12 सप्ताह का होता है, जिससे इनकी आबादी तेजी से बढ़ती है। यह कीट मधुमक्खी छत्तों से निकलने वाली विशिष्ट गंध से आकर्षित होता है और अपनी सूंघने की क्षमता के कारण दूर तक छत्तों का पता लगा सकता है।

मधुमक्खियों की घटती संख्या से बढ़ी चिंता
मधुमक्खियों की संख्या तेजी से घट रही है। इंटरगवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्लेटफॉर्म ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज की रिपोर्ट बताती है कि विश्व में पराग-कण वाहक जीवों की संख्या गंभीर स्तर तक कम हो रही है। इसके पीछे कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग, उनके आवास स्थलों का विनाश, जलवायु परिवर्तन और रोग-परजीवी संक्रमण जैसे कारण जिम्मेदार हैं। अमेरिका और यूरोप में मधुमक्खी कॉलोनियों के समाप्त होने के विकार (कॉलोनी कॉलैप्स डिसऑर्डर) की समस्या इतनी गंभीर हो गई है कि पूरी मधुमक्खी कॉलोनी अचानक समाप्त हो जाती है।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के हालिया शोध यह दर्शाते हैं कि कीटनाशकों, विशेषकर नियोनिकोटिनॉइड रसायनों के प्रयोग से मधुमक्खियों की मृत्यु दर बढ़ रही है।

परागण पर निर्भर 75% खाद्य फसलें 
मधुमक्खियों का महत्वपूर्ण कार्य परागण है। फूलों से पराग-कण इकट्ठा कर इन्हें अन्य पौधों तक पहुंचाने से बीज और फल का निर्माण संभव होता है। विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार, लगभग 75 प्रतिशत प्रमुख खाद्य फसलें परागण पर निर्भर हैं। इनमें फल, सब्जियां, तिलहन और मसाले शामिल हैं। मधुमक्खियां न हों तो हमारे आहार में उपलब्ध विविधता और पोषण दोनों प्रभावित होंगे। केवल अनाजों पर आधारित भोजन से कुपोषण बढ़ेगा और प्रोटीन, विटामिन तथा खनिजों की कमी हो जाएगी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार, परागण से फसलों की उपज 20 से 200 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। यही नहीं, जंगलों और घास के मैदानों की अनेक प्रजातियां मधुमक्खियों की वजह से जीवित हैं। 

मधुमक्खितों की मौत, खेती पर खतरा 
भारत में 90 से अधिक कृषि फसलों का परागण शहद बनाने वाली मधुमक्खियों पर निर्भर है। वैश्विक स्तर पर भी 75–80% खाद्य फसलें पशु-परागण पर आधारित हैं। यह कीट व्यापक स्तर पर फैल गया तो मधुमक्खी कालोनियां ध्वस्त हो जाएंगी, शहद उत्पादन घटेगा, कृषि उत्पादकता और ग्रामीण आजीविका को गहरा आघात लगेगा। यह कीट केवल मधुमक्खियों ही नहीं, बल्कि भंवरे और बिना डंक वाली मधुमक्खियों में भी प्रजनन कर सकता है, जिससे देसी पराग-कण वाहकों पर भी संकट उत्पन्न हो जाएगा। विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन ने छोटे छत्ते वाले बीटल को ‘सूचित करने योग्य रोग’ घोषित किया है। यूरोपीय संघ के 2018 के निगरानी एवं नियंत्रण नियम के अंतर्गत यूरोपीय संघ ने इसे निगरानी सूची में रखा है।

तेज करने होंगे नियंत्रण के उपाय   
आज यह आवश्यक हो गया है कि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और मधुमक्खी पालक मिलकर निगरानी, जागरूकता और टिकाऊ नियंत्रण उपायों पर काम करें, ताकि इस उभरते संकट को समय रहते नियंत्रित किया जा सके। मधुमक्खियों के छत्तों की नियमित जांच, स्वच्छता और स्वस्थ कालोनियों का विकास भी महत्वपूर्ण है। इस कीट के नियंत्रण के लिए बीटल ट्रैप का उपयोग, मिट्टी में कीटनाशी ड्रेंचिंग और डाइएटोमेशियस अर्थ या चूना छिड़काव जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं। जैविक नियंत्रण के लिए एंटोमोपैथोजेनिक कवक और निमेटोड का प्रयोग भी एक प्रभावी उपाय साबित होता है। इसके अलावा, प्रवासी मधुमक्खी पालन और संक्रमित उपकरणों के व्यापार पर कठोर क्वारंटाइन नियम लागू करना भी बेहद आवश्यक है, ताकि इस कीट के प्रसार को रोका जा सके।

भारत की बढ़ती जनसंख्या और भोजन की मांग को देखते हुए, मधुमक्खियों के संरक्षण और प्रजनन पर राष्ट्रीय स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे। यह केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि कृषि, अर्थव्यवस्था और मानव अस्तित्व से जुड़ा हुआ प्रश्न है। यदि हमने समय रहते मधुमक्खियों के महत्व को नहीं समझा, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।