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बजट 2026: व्यापक आर्थिक बदलाव की कड़ी बन रहा कृषि क्षेत्र, खेती से मैन्यूफैक्चरिंग और एमएसएमई की ओर बढ़े कदम

डॉ. प्रमोद कुमार जोशी, कृषि अर्थशास्त्री Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 02 Feb 2026 11:22 AM IST
सार

कृषि को अलग क्षेत्र की बजाय अब देश के व्यापक आर्थिक विकास की अहम कड़ी के रूप में देखा जा रहा है, जो सरकार की रणनीति में एक धीमे, मगर साफ बदलाव की ओर संकेत करता है। यह बजट खेती के लिए पिछले साल जितना मजबूत नहीं है, लेकिन सरकार का रुझान लोगों को धीरे-धीरे खेती से मैन्युफैक्चरिंग और एमएसएमई की ओर ले जाने का दिखता है। अगर इसे सही ढंग से लागू किया गया, तो इसका अप्रत्यक्ष लाभ कृषि को मिल सकता है। 

खेती से आगे बढ़कर मैन्युफैक्चरिंग और एमएसएमई की ओर कदम।
खेती से आगे बढ़कर मैन्युफैक्चरिंग और एमएसएमई की ओर कदम। - फोटो : गांव जंक्शन

विस्तार

बजट 2026 का फोकस सीधे किसानों पर कम और पूरी अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन पर अधिक केंद्रित है। खेती-बाड़ी को सीधे नकद सहायता और सब्सिडी देने के बजाय, नवाचार, मैन्युफैक्चरिंग और रोजगार से जोड़कर बढ़ावा देने पर केंद्रीय बजट 2026 में जोर दिया गया है। सरकार का फोकस खेती से ज्यादा उत्पादन और एमएसएमई को मजबूत करने पर है, जिससे संकेत मिलता है कि अब कृषि को स्वतंत्र क्षेत्र नहीं, बल्कि बड़े आर्थिक बदलाव का हिस्सा माना जा रहा है। 

कृषि को अलग क्षेत्र की बजाय अब देश के व्यापक आर्थिक विकास की अहम कड़ी के रूप में देखा जा रहा है, जो सरकार की रणनीति में एक धीमे, मगर साफ बदलाव की ओर संकेत करता है। यह बजट खेती के लिए पिछले साल जितना मजबूत नहीं है, लेकिन सरकार का रुझान लोगों को धीरे-धीरे खेती से मैन्युफैक्चरिंग और एमएसएमई की ओर ले जाने का दिखता है। अगर इसे सही ढंग से लागू किया गया, तो इसका अप्रत्यक्ष लाभ कृषि को मिल सकता है। 

वर्ष 2025 के बजट में किसानों की समस्याओं को सीधे संबोधित किया गया था। खेती पर सरकार का फोकस अधिक था और उत्पादन बढ़ाने एवं आयात पर निर्भरता घटाने की बात कही गई थी। खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से पिछले बजट में दलहन मिशन, तिलहन मिशन, धन-धान्य योजना, जैविक खेती और मोटे अनाजों को बढ़ावा देने से जुड़े बड़े एलान किए गए थे। लेकिन, इस साल के बजट में रणनीति में स्पष्ट बदलाव झलकता है।

बजट 2026 में खेती-बाड़ी को मजबूत बनाने के लिए उसे तकनीक, उत्पादन और रोजगार से जोड़ा गया है। सरकार खेती को सिर्फ उत्पादन तक सीमित न रखकर अब कृषि उद्यमिता में परिवर्तित करना चाहती है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) मूल्य संवर्धन बढ़ेगा तो रोजगार और किसानों की आमदनी - दोनों में इजाफा होगा। सरकार खेती को केवल जीवनयापन के साधन बढ़कर अब छोटे उद्योगों, प्रसंस्करण और सेवाओं पर आधारित मजबूत तंत्र के रूप में विकसित करना चाहती है।  

बजट 2026 की कृषि से संबंधित प्रमुख बड़ी पहल - ‘भारत विस्तार’ है। एआई आधारित इस बहुभाषी डिजिटल टूल को आईसीएआर स्थानीय जरूरतों के हिसाब से तैयार करेगा। यह टूल किसानों को फसल कैलेंडर, मौसम की जानकारी, कीट व रोग नियंत्रण, मिट्टी से जुड़ा डेटा और बाजार भाव जैसी जानकारियां देगा। यह टूल खेती के वैज्ञानिक तौर-तरीकों को किसानों तक पहुंचाएगा। सही जानकारी मिलेगी तो किसान खेती से जुड़े सटीक फैसले ले सकेंगे और फसलों में मौसम, रोग या कीमतों से जुड़े जोखिम कम होंगे। 

दूसरा अहम फोकस फसल विविधीकरण और उच्च मूल्य वाली खेती पर है। तटीय इलाकों में नारियल, चंदन और काजू, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में अखरोट को बढ़ावा दिया जाएगा। उच्च मूल्य वाली इन फसलों की दिशा उत्साहजनक तो है, मगर यह अभी सीमित दायरे में है। इसे बड़े स्तर पर लागू करना होगा। साथ ही, किसानों की आय बढ़ाने के लिए इन फसलों को व्यापक स्तर पर बाजारों और निर्यात से जोड़ने की जरूरत होगी।

तीसरा क्षेत्र पशुपालन और ग्रामीण आजीविका का है। छोटे किसानों और भूमिहीन परिवारों के लिए एफपीओ (किसान उत्पादक संगठन) और डेयरी, बकरी, भेड़ व पोल्ट्री जैसे सेक्टर की मूल्य शृंखला को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। पशुपालन छोटे व कमजोर किसानों के लिए मुश्किल समय में सुरक्षा कवच का काम करता है, जिसे मजबूत करने का लाभ गामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा। 

इस बजट में कुछ कमियों की बात करें तो सब्सिडी ढांचे में सुधार की उम्मीदों को झटका लगा है। उर्वरक सब्सिडी का सरकार के खजाने पर भारी बोझ पड़ता है। साथ ही, रासायनिक खाद मिट्टी व जल संसाधनों को भी नुकसान पहुंचाती है। सटीक और पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा देकर किसानों को कम  उर्वरकों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करके सब्सिडी का बोझ घटाया जा सकता था। आर्थिक सर्वेक्षण में यह मुद्दा उठा था, लेकिन बजट में इस पर ठोस कदम नहीं दिखते।

फलों की मूल्य शृंखला और प्रसंस्करण को बढ़ावा देकर यूरोप, यूके और आसियान देशों में बड़े पैमाने पर निर्यात किया जा सकता था। उत्पादन बढ़ाने के साथ ही प्रसंस्करण भी जरूरी है। फल उत्पादन एक बड़ा अवसर हो सकता था, जो छूट गया। इसके अलावा, मूल्य संरक्षण और सामूहिक विपणन पर भी ध्यान देने की जरूरत है। उत्पादन बढ़ता है तो कीमतें गिर जाती हैं, जिससे किसानों को नुकसान होता है। मूल्य संरक्षण किसानों के लिए ढाल बन सकता है। साथ ही, अगर किसान मिलकर अपनी उपज को सामूहिक रूप से बेचें, तो बेहतर दाम मिल सकते हैं, लेकिन इस पर बजट में बहुत कम ध्यान दिया गया है।

भारतीय कृषि को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए आने वाले बजटों में टिकाऊ खेती, मूल्य सुरक्षा और मूल्य संवर्धन को सबसे ऊपर रखना होगा।