चाय की बात होती है तो लोगों के मन में दार्जिलिंग और असम का नाम सबसे पहले आता है। लेकिन अब दक्षिण भारत के चाय बागान भी अपनी खास पहचान बना रहे है। हाल ही में हुए गोल्डन लीफ इंडिया अवार्ड्स में यह साबित हुआ है कि दक्षिण भारत की चाय किसी से कम नही।
चाय की बात होती है तो लोगों के मन में दार्जिलिंग और असम का नाम सबसे पहले आता है। लेकिन अब दक्षिण भारत के चाय बागान भी अपनी खास पहचान बना रहे है। हाल ही में हुए गोल्डन लीफ इंडिया अवार्ड्स में यह साबित हुआ है कि दक्षिण भारत की चाय किसी से कम नही।
गुमनाम हीरो को मिली एक नई पहचान
यूनाइटेड प्लांटर्स एसोसिएशन आफ साउथ इंडिया द्वारा आयोजित यह पुरस्कार समारोह अब अपने 20वें साल में है। जानकारों का कहना है कि इन अवार्ड्स से पहले दक्षिण भारत की चाय की विविधताओं पर किसी का ध्यान नही जाता था। लेकिन गोल्डन लीफ इंडिया अवार्ड्स ने दक्षिण भारत के अलग अलग चाय क्षेत्रों की अनूठी खासियत को दुनिया के सामने लाने में एक अहम भूमिका निभाई है।
पश्चिमी घाट में छिपा है स्वाद का खजाना
भारत के कुल चाय उत्पादन का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा दक्षिण से आता है। यहा के ज्यादातर चाय क्षेत्र पश्चिमी घाट में फैले हुए है। इसमें नीलगिरि, केरल के वायनाड और त्रावणकोर, हाई रेंज, तमिलनाडु के अनामल्लाई और कर्नाटक के कुछ हिस्से शामिल है।
नीलगिरि और हाई रेंज दुनिया के सबसे उंचाई वाले चाय क्षेत्रों में से है, जहा चाय के बागान 7,000 फीट की उंचाई पर स्थित है। दुनिया का सबसे उंचा चाय बागान कोल्लुकुमलाई भी यही है, जो लगभग 8,000 फीट की उंचाई पर है। माना जाता है कि अधिक उंचाई पर उगने वाली चाय का स्वाद खास होता है। जहा नीलगिरि की चाय अपनी सुगंध के लिए जानी जाती है, वही हाई रेंज की चाय में फलों का स्वाद मिलता है।
दक्षिण की चाय को पुरस्कार
गोल्डन लीफ इंडिया अवार्ड्स में विजेता बनना आसान नही होता। चाय को कई दौर की जाच परक से गुजरना पडता है। आखिर में एक अंतरराष्ट्रीय पैनल आखों पर पट्टी बाधकर चाय का स्वाद चखता है और फिर विजेता चाय का फैसला होता है। इस साल के जजों ने भी दक्षिण भारतीय चाय की विविधता और हर क्षेत्र के अनूठे स्वाद की जमकर तारीफ की। पुरस्कारों में दक्षिण भारत की दो प्रमुख चाय उत्पादक कंपनियों - वुडब्रियार और एचएमएल ने आठ-आठ पुरस्कार जीतकर दक्षिण की चाय की श्रेष्टता साबित की।