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AI की चमक में धुंधली किसानों की मुश्किलें: तकनीक-मैन्युफैक्चरिंग में चैंपियन बनने की दौड़ में पिछड़े अन्नदाता

देवेंद्र शर्मा, खाद्य एवं कृषि नीति विशेषज्ञ Published by: Snehlata Shukla Updated Mon, 02 Feb 2026 12:57 AM IST
सार

बजट 2026 मैन्युफैक्चरिंग और तकनीक के क्षेत्र में तो 'चैंपियन' बनाने का वादा करता है, लेकिन भारत का 'अन्नदाता' इस दौड़ में खुद को अकेला महसूस कर रहा है। तकनीक के शोर के बीच किसान की घटती आय और बढ़ता घाटा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा चेतावनी संकेत है।

डिजिटल खेती: क्या बढ़ेगी किसान की आय?
डिजिटल खेती: क्या बढ़ेगी किसान की आय? - फोटो : गांव जंक्शन

विस्तार

वित्त मंत्री द्वारा पेश किए गए बजट 2026 ने एक बार फिर विकास के 'मैन्युफैक्चरिंग मॉडल' और 'डिजिटल भविष्य' पर दांव लगाया है। आइए इस बजट पर जानते हैं खाद्य एवं कृषि नीति विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा की राय...

केवल तकनीक से कैसे बढ़ेगी किसानों की कमाई?
बजट में कृषि क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा कलेक्शन के उपयोग को आय बढ़ाने के बड़े रास्ते के रूप में पेश किया गया है। लेकिन, पिछले 50-60 सालों का इतिहास गवाह है कि केवल तकनीक - चाहे वो उन्नत बीज हों, रासायनिक उर्वरक हों या मशीनें- किसान की आय को 'चांद' तक नहीं पहुंचा पाई। आज भी एक किसान परिवार की खेती से होने वाली औसत आय मात्र 27 रुपये प्रतिदिन के आसपास बनी हुई है। ऐसे में AI के जरिए सब्सिडी के सटीक वितरण और डेटा के दावों को किसान की असल बदहाली पर 'डिजिटल मरहम' से ज्यादा कुछ नहीं माना जा रहा है।

हाई-वैल्यू फसलों का विरोधाभास : नारियल और चंदन बनाम सेब
सरकार ने बजट में नारियल और चंदन जैसी 'हाई-वैल्यू' और 'कैश क्रॉप्स' को बढ़ावा देने की घोषणा की है। यह कदम सुनने में सराहनीय लगता है, लेकिन इसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही संकेत दे रही है। एक तरफ सरकार नई नकदी फसलों की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ हिमाचल और जम्मू-कश्मीर की पारंपरिक नकदी फसल 'सेब' को फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTA) के जरिए विदेशी प्रतिस्पर्धा के सामने लाचार छोड़ दिया गया है। न्यूजीलैंड और यूरोपीय देशों से सस्ते आयात ने स्थानीय किसानों की कमर तोड़ दी है, जो नीतिगत विरोधाभास को स्पष्ट करता है।

रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद बदहाल किसान
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, कृषि क्षेत्र में 4.4% की वृद्धि दर्ज की गई है और देश ने 357 मिलियन टन खाद्यान्न का रिकॉर्ड उत्पादन किया है। विडंबना यह है कि इतना उत्पादन करने के बावजूद किसान आज भी पिरामिड के सबसे निचले पायदान पर खड़ा है। हॉर्टिकल्चर (बागवानी) का उत्पादन भी अनाज से अधिक है, लेकिन न तो हमारे पास इसे सहेजने का बुनियादी ढांचा है और न ही किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिल रहा है।

OECD की रिपोर्ट : 25 साल और 111 लाख करोड़ का घाटा
बजट चर्चा के दौरान सबसे चौंकाने वाले आंकड़े OECD (आर्थिक सहयोग और विकास संगठन) की रिपोर्ट से सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के किसानों को पिछले 25 वर्षों में लगभग 111 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। अगर इतना बड़ा घाटा किसी कॉर्पोरेट सेक्टर को हुआ होता, तो अब तक देशभर में हाहाकार मच गया होता। लेकिन किसानों के इस मूक घाटे को बजट में गंभीरता से संबोधित नहीं किया गया है।

भविष्य की चेतावनी : 2034 तक गेहूं का आयातक बनेगा भारत?
एक तरफ हम 'खाद्य सुरक्षा' का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ FAO और OECD की संयुक्त रिपोर्ट ने भविष्य की भयानक तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2034 तक भारत गेहूं का 'नेट इंपोर्टर' (शुद्ध आयातक) बन सकता है। यह न केवल हमारी आत्मनिर्भरता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि मौजूदा नीतियां खेती को लाभकारी बनाने के बजाय उसे खत्म करने की दिशा में ले जा रही हैं।

उनका मानना है कि बजट 2026 एक स्पष्ट संदेश दे रहा है कि सरकार का पूरा ध्यान अब कृषि के बजाय कॉर्पोरेट कंट्रोल वाले डिजिटल और AI मॉडल पर है। ग्रामीण भारत की इस अनदेखी को देखते हुए अब यह मांग उठने लगी है कि सरकार को अपने आर्थिक सलाहकारों को बदलना चाहिए, जो धरातल की सच्चाई से दूर केवल कागजी आंकड़ों और विदेशी मॉडलों के आधार पर नीतियां बना रहे हैं।

(कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा से स्नेहलता शुक्ला की बातचीत पर आधारित)