बेंगलुरु में आयोजित कृषि मेला 2025 में एक मशीन सभी किसानों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस मशीन का नाम कृषि बॉट है। यह बॉट स्वचालित बीज और उर्वरक ड्रिल मशीन का काम करता है।
बुवाई और खाद डालने का काम साथ में
यह कृषि बॉट को खासकर मोटे अनाज, दलहन, तिलहन और मक्का जैसी फसलों के लिए डिजाइन किया गया है। किसान इसका उपयोग अंतर-फसल (Intercropping) के लिए भी कर सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बीज बोने के साथ-साथ उसी समय उर्वरक भी डालती है, जिससे किसानों का समय और मेहनत दोनों बचते हैं। इस मशीन को बनाने वाली संस्था के संस्थापक वैभव कहते हैं कि मशीन में किसान अलग-अलग फसलों के लिए बीज की दर को एडजस्ट कर सकते हैं और इसके एक फुट के फरो ओपनर से बुवाई की गहराई भी एक समान रहती है।
इस बॉट के डेमो के दौरान दिखाया गया कि फसल और खेत की परिस्थितियों के अनुसार बॉट की रफ्तार को धीमा या तेज किया जा सकता है, जिससे इसे अलग-अलग तरह के खेतों में चलाना आसान हो जाता है।
बीज और मजदूरी में भारी बचत
इस मशीन की क्षमताओं का ओडिशा के आदिवासी क्षेत्रों में रागी की खेती पर सफलता से परीक्षण किया जा चुका है। वैभव ठक्कर के अनुसार, किसानों को पहले प्रति एकड़ 15 किलो रागी के बीज की आवश्यकता होती थी, उन्होंने कृषि बॉट का उपयोग करके केवल 3 किलो बीज में समान पैदावार हासिल की।
इतना ही नहीं, इससे मजदूरों की आवश्यकता में भी भारी कमी आई। जिस काम के लिए पहले तीन से चार लोगों की जरूरत पड़ती थी, अब उसे सिर्फ एक प्रशिक्षित ऑपरेटर कर सकता है।
बैटरी से चलती है मशीन, 6 घंटे का बैकअप
यह कृषि बॉट बैटरी पर चलता है। इसमें एक मुख्य बैटरी और इसके पहियों में चार छोटी बैटरियां लगी हैं, जिन्हें आसानी से बदला जा सकता है। एक बार फुल चार्ज करने पर यह बॉट 6 घंटे तक काम कर सकता है और इस दौरान 6 से 8 एकड़ खेत को कवर कर सकता है। इसे एक रिमोट कंट्रोल से चलाया जाता है, जिससे ऑपरेटर इसकी रफ्तार, दिशा, बीज और उर्वरक दालने को नियंत्रित कर सकता है। ये ऐसी खासियतें हैं जो आमतौर पर ट्रैक्टर जैसी पारंपरिक मशीनरी में उपलब्ध नहीं होती हैं।
कितनी है कीमत
किसानों के लिए यह मशीन किराए पर भी उपलब्ध है, जिसका किराया 1,000 रुपये प्रति घंटा है। अगर कोई किसान इसे खरीदना चाहता है, तो इसकी बाजार कीमत लगभग 10 लाख रुपये है, जिस पर 2.5 से 3 लाख रुपये तक की सब्सिडी मिल सकती है। इस मशीन का निर्माण बेंगलुरु के जलाहल्ली में होता है और किसान उत्पादक संगठनों के सहयोग से इसे डिप्लॉयमेंट साइट्स पर असेंबल किया जाता है।