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Study Floods Not Drought Are Now Ravaging Rice Cultivation New Report Reveals These Indian States At Risk
Study: सूखे से नहीं, अब बाढ़ से तबाह हो रही धान की खेती, नई रिपोर्ट में खुलासा - भारत के ये राज्य जोखिम में...
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Devesh Saraswat
Updated Mon, 17 Nov 2025 04:35 PM IST
सार
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के नए अध्ययन में सामने आया है कि हाल के दशकों में बाढ़ की वजह से चावल के वैश्विक उत्पादन में भारी गिरावट आई है। इस अध्ययन के अनुसार, 1980 से 2015 के बीच, बाढ़ के कारण वैश्विक चावल उत्पादन का लगभग 4.3 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो गया। जानिए अध्ययन ने भारत के बारे में क्या कहा?
बाढ़ से चावल की पैदावार पर भारी असर पड़ रहा है।
- फोटो : gq
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विस्तार
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के नए अध्ययन में सामने आया है कि हाल के दशकों में बाढ़ की वजह से चावल के वैश्विक उत्पादन में भारी गिरावट आई है। यह अध्ययन वैश्विक खाद्य सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों को रेखांकित कर रहा है।
हर साल 1.8 करोड़ टन चावल बाढ़ में बर्बाद
साइंस एडवांसेज पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, 1980 से 2015 के बीच, बाढ़ के कारण वैश्विक चावल उत्पादन का लगभग 4.3 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो गया। यह मात्रा सालाना करीब 1.8 करोड़ टन है। वैज्ञानिक लंबे समय से सूखे के खतरों के बारे में चेतावनी देते आए हैं। लेकिन यह नया शोध सिक्के के दूसरे पहलू यानी बहुत ज्यादा पानी के प्रभाव पर बात कर रह है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाया संकट
अध्ययन में पाया गया कि अगर धान की फसल केवल एक हफ्ते तक पूरी तरह से पानी में डूबी रहती है, तो वह अक्सर बर्बाद हो जाती है। चिंता की बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण, साल 2000 के बाद से इस तरह कीबाढ़ की घटनाएं आम हो चली हैं। वो भी प्रमुख चावल उत्पादक क्षेत्रों में। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन बारिश के पैटर्न पर असर डालेगा, ये घटनाएं और भी गंभीर होंगी।
गुजरात, राजस्थान और पश्चिम बंगाल पर सबसे ज्यादा खतरा
यह अध्ययन भारत के लिए भी काफी अहम। रिपोर्ट में उन क्षेत्रों को जिक्र किया गया है जहां बाढ़ से धान की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान होता है। इसमें भारत के साबरमती बेसिन मुख्य रूप से गुजरात और राजस्थान का नाम प्रमुखता से लिया गया है। इसके अलावा, पूर्वी एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और दक्षिण एशिया के दूसरे हिस्सों के साथ-साथ भारत में पश्चिम बंगाल को भी उच्च जोखिम वाले स्थानों में गिना गया है।
आगामी समय में बारिश ज्यादा होगी
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि आगामी दशकों में, इन प्रमुख क्षेत्रों में एक हफ्ते की सबसे तेज बारिश 1980 से 2015 के औसत की तुलना में 13 प्रतिशत तक अधिक हो सकती है।
लचीली किस्मों में समाधान?
निराश करने वाली इस तस्वीर के बीच एक उम्मीद की किरण भी है। ये उम्मीद की किरण बाढ़-सहिष्णु धान की किस्में है। अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि साबरमती बेसिन जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में इन लचीली किस्मों को अपनाना अहम समाधान हो सकता है।
विशेषज्ञ अब खेती के तरीकों पर विचार करने का आह्वान कर रहे हैं, जिसमें जलवायु-लचीली फसलों को बढ़ावा देना और फसलों में विविधता लाना शामिल है।
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