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Marine Research: समुद्री जीवों की निगरानी के लिए ध्वनि आधारित तकनीक पर जोर, मिलेंगे कई बड़े फायदे

गांव जंक्शन डेस्क, नोएडा Published by: Himanshu Mishra Updated Fri, 07 Nov 2025 10:37 AM IST
सार

भारत की 7,500 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा और समृद्ध समुद्री जैवविविधता को देखते हुए, वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया कि देश में स्वदेशी ध्वनि-आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किए जाएं। 

आईसीएआर–सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CMFRI) में आयोजित किया जा रहा है।
आईसीएआर–सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CMFRI) में आयोजित किया जा रहा है। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भारत में समुद्री जीवों, खासकर व्हेल और डॉल्फिन की निगरानी और संरक्षण के लिए अब ध्वनि-आधारित तकनीक (Sound-Based Technology) के उपयोग पर जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्र में ध्वनि प्रकाश की तुलना में बहुत तेज और दूर तक यात्रा करती है, इसलिए पैसिव अकॉस्टिक मॉनिटरिंग (Passive Acoustic Monitoring - PAM) जैसी तकनीक समुद्री स्तनधारियों की पहचान और अध्ययन के लिए एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकती है।

यह विचार आईसीएआर–सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CMFRI) में आयोजित चौथे अंतरराष्ट्रीय समुद्री पारिस्थितिकी संगोष्ठी (MECOS-4) के दौरान समुद्री स्तनधारी अनुसंधान पर आयोजित सत्र में सामने आया। विशेषज्ञों ने कहा कि यह तकनीक भारत के समुद्री जैवविविधता संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा दे सकती है।

ध्वनि से समुद्री जीवन की पहचान संभव
विशेषज्ञों ने बताया कि पैसिव अकॉस्टिक मॉनिटरिंग (PAM) के माध्यम से समुद्र के भीतर कई किलोमीटर दूर से भी जीवों द्वारा उत्पन्न ध्वनियों को रिकॉर्ड किया जा सकता है। अशोका विश्वविद्यालय की दिव्या पनिक्कर ने कहा कि इस तकनीक में कई तरह के उपकरणों का उपयोग किया जाता है, जैसे —
  • समुद्र तल पर लगाए गए बॉटम-माउंटेड मूरिंग्स
  • सतह पर स्थित बॉयज़ (Surface Buoys)
  • ड्रिफ्टिंग बॉयज़ और टोइड एरेज़ (Towed Arrays)
  • कुछ मामलों में जीवों के शरीर पर लगाए जाने वाले अकॉस्टिक टैग्स
इन उपकरणों से प्राप्त ध्वनियों के विश्लेषण से वैज्ञानिक यह पता लगा सकते हैं कि समुद्री स्तनधारी किस क्षेत्र में हैं, उनकी संख्या कितनी है और वे किन मार्गों से प्रवास करते हैं।

एआई और मशीन लर्निंग से मिलेगी सटीकता
दिव्या पनिक्कर ने कहा कि यदि इस तकनीक को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग (ML) से जोड़ा जाए, तो यह तकनीक और अधिक प्रभावी हो सकती है। इससे प्रजातियों की पहचान और उनके व्यवहारिक पैटर्न को समझने में अत्यधिक सटीकता प्राप्त होगी। विशेषज्ञों ने बताया कि जहां पारंपरिक सर्वेक्षण (visual surveys) साफ मौसम और दिन के उजाले पर निर्भर रहते हैं, वहीं PAM तकनीक दिन-रात और सभी परिस्थितियों में 24 घंटे निगरानी की सुविधा देती है।

देश में स्वदेशी तकनीक विकसित करने की जरूरत
भारत की 7,500 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा और समृद्ध समुद्री जैवविविधता को देखते हुए, वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया कि देश में स्वदेशी ध्वनि-आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किए जाएं। यह न केवल समुद्री स्तनधारियों के संरक्षण में मदद करेगा, बल्कि समुद्री पारिस्थितिकी पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने में भी अहम भूमिका निभाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत इस तकनीक को अपने तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों में सफलतापूर्वक लागू करता है, तो यह देश को वैश्विक स्तर पर समुद्री अनुसंधान में अग्रणी बना सकता है।