IIT बॉम्बे और हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन किया है। इस अध्ययन में पाया गया है कि भारत के अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता केवल खेत के आकार पर निर्भर नहीं करती है, बल्कि इनपुट, क्रेडिट और बाजारों तक पहुंच का भी इसमें बड़ा योगदान है। 1975 से 2014 तक के डाटा का विश्लेषण करके और परिवर्तनों की जांच करके यह निष्कर्ष निकाला गया है।
IIT बॉम्बे और हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन किया है। इस अध्ययन में पाया गया है कि भारत के अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता केवल खेत के आकार पर निर्भर नहीं करती है, बल्कि इनपुट, क्रेडिट और बाजारों तक पहुंच का भी इसमें बड़ा योगदान है। 1975 से 2014 तक के डाटा का विश्लेषण करके और परिवर्तनों की जांच करके यह निष्कर्ष निकाला गया है।
छोटे खेत शुरू में अधिक उत्पादक थे, लेकिन...
शोधकर्ताओं ने पाया कि छोटे खेत वास्तव में अधिक उत्पादक थे, खासकर शुरुआती सालों (1975-84) में। इसका कारण यह था कि छोटे खेतों में पारिवारिक श्रम अधिक होता था, ध्यान अधिक दिया जाता था, और बड़े खेतों की तुलना में प्रति यूनिट अधिक उर्वरक डाला जाता था। 1960 के दशक में भी यह देखा गया था कि छोटे खेत आम तौर पर प्रति एकड़ उपज के मामले में बड़े खेतों से अधिक उत्पादक होते हैं। हालांकि, नए अध्ययन से पता चलता है कि उन शुरुआती वर्षों में भी, उत्पादकता का पैमाना छोटे खेतों की ओर उतना झुका हुआ नहीं था जितना पहले सोचा गया था।
किसानों की परेशानी बढ़ी, तो छोटे खेतों का फायदा कम हुआ
अध्ययन से यह भी पता चला है कि भारत के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में खेतों के आकार और उत्पादकता के बीच संबंध उतना मजबूत नहीं है जितना माना जाता था। जैसे-जैसे इन क्षेत्रों में कृषि संकट बढ़ता गया, बाद के वर्षों (2009-2014) में छोटे खेतों का उत्पादकता लाभ कम होता गया।
छोटे किसानों को मदद की जरूरत
IIT बॉम्बे के शैलेश जे. मेहता स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के प्रोफेसर और अध्ययन के सह-लेखक सार्थक गौरव का कहना है, "खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण स्थिरता के लिए छोटे किसान अभी भी बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे मोनोकल्चर (एक ही फसल उगाना) और उच्च इनपुट लागत के कारण तेजी से कमजोर हो रहे हैं। छोटे किसानों की क्षमता को मजबूत करने के लिए, उन्हें उपयुक्त तकनीकों, सस्ती क्रेडिट और विश्वसनीय विस्तार सेवाओं तक बेहतर पहुंच की आवश्यकता है।"
शोधकर्ताओं ने 1975 से 2014 तक चार दशकों से अधिक के ICRISAT डाटासेट से गांव-स्तरीय अध्ययनों पर भरोसा किया। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह डेटाबेस अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से दुनिया के सबसे लंबे समय तक चलने वाले कृषि पैनल अध्ययनों में से एक माना जाता है। यह क्षेत्र हरित क्रांति के शुरुआती लाभों से चूक गया, क्योंकि यह कई दशकों तक कृषि परिवारों को ट्रैक करता है।
ICRISAT का डेटा मुख्य रूप से तीन प्रतिनिधि क्षेत्रों - अकोला, सोलापुर और महबूबनगर से है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यहां की अनूठी कृषि-पारिस्थितिक और संस्थागत परिस्थितियां यह समझने के लिए एक आदर्श सेटिंग बनाती हैं कि कृषि में देरी से हुए लेकिन महत्वपूर्ण परिवर्तनों के जवाब में उत्पादकता पैटर्न कैसे बदले।
किसानों के लिए सलाह
शोधकर्ताओं ने छोटे किसानों की बाजारों और इनपुट तक सामूहिक पहुंच में सुधार को प्राथमिकता देने की सिफारिश की है। दूसरी सिफारिश छोटे किसानों को सामूहिक या उत्पादक समूहों में संगठित करने में मदद करना है ताकि वे संसाधनों को जमा कर सकें, कृषि-पारिस्थितिक प्रथाओं को अपना सकें और बेहतर कीमतों पर बातचीत कर सकें।